यूपी में बिना स्वेटर वाली सर्दी का सितम

अजय कुमार

सरकार अपने जिन अधिकारियों के बल पर देश व प्रदेश को विकास और सामाजिक समरसता की ऊंचाई पर ले जाना चाहती है, सुशासन का दावा करती है उन्हीं ं अधिकारियों की वजह से कई बार सरकार को किरकिरी भी झेलनी पड़ती है। सरकार गरीबों को उनका अधिकार दिलाने के लिए तानाबाना बुनती है, स्कूल में पढऩे वाले बच्चों के लिए मिड-डे-मिल, फीस माफी, ड्रेस, बैग, कापी, किताबों के नि:शुल्क वितरण जैसी तमाम योजनाएं चलाती है। इसके अलावा समाज का गरीब तबका मूलभूत सुविधाओं से वंचित न रह जाये इसलिये सरकारी खजाना खोल दिया जाता है, तब भी गरीबों की स्थिति में सुधार नहीं नजर आता है।
सरकार की ऐसी तमाम महत्वाकांक्षी योजनाओं में सरकारी मशीनरी पलीता लगा देती है। प्रदेश के विकास और जनमानस के हितों की पूर्ति की बजाये जब मोटी-मोटी तनख्वाह लेकर अधिकारी अपने ‘विकास’ में लग जाते हैं तो वह न केवल समाज का बल्कि सरकार और लोकतांत्रिक मूल्यों का भी नुकसान करते हैं, जिसकी नई बानगी है हाड़ कंपाती ठंड में सरकारी मशीनरी द्वारा परिषदीय स्कूलों के बच्चों को स्वटेर नहीं उपलब्ध करा पाना। पूरा जाड़ा निकल गया,सर्दी का सितम भी हफ्ते-पन्द्रह दिन में कम हो जायेगा,लेकिन जाड़ा शुरू होने से पहले सरकार ने स्कूली बच्चों को स्वेटर देने की जो योजना बनाई थी,वह जाड़ा खत्म होने के बाद भी परवान नहीं चढ़ पाई। दरअसल इसके लिए निश्चित रूप से सरकारी मशीनरी जिम्मेदार है,जिसने इसके लिए सही तरीका ही अख्तियार नहीं किया । ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पूर्ववर्ती सरकारों के समय में भी तमाम सरकारों की महत्वाकांक्षी और प्राथमिकताओं वाली योजनाओं में बिना सोच-विचार करके फैसले किए जाने की प्रवृत्ति से तमाम सरकारों की किरकिरी होती रही है। स्वेटर वितरण के मामले में भी ऐसा ही हो रहा है। बेसिक शिक्षा मंत्री अनुपमा जायसवाल तो इतनी शर्मिदा दिखीं की उन्होंने यहां तक घोषणा कर दी कि जब तक बच्चों को स्वेटर नहीं मिलेंगे,वह भी स्वेटर नहीं पहनेंगी,तमाम मौकों पर देखने में आया कि वह ऐसा कर भी रहीं हैं, परंतु इसके बाद भी नौकरशाही पर जूं नहीं रेंगी। लापरवाही का आलम यह है कि जो रास्ता पहले चुना जाना चाहिए था,उसे अधिकारियों ने बाद में चुना। बेसिक शिक्षा विभाग ने अब स्कूलों को ही स्वेटर वितरण की जिम्मेदारी सौंप दी है, लेकिन यह फैसला शुरुआत में ही ले लिया गया होता तो योगी सरकार विपक्ष के निशाने से भी बचती और स्कूल के बच्चों का भी भला हो जाता। अब तक बच्चों को स्वेटर मिल भी गए होते। सरकार ने प्रति स्वेटर कीमत दो सौ रुपये ही निर्धारित की है। इसे किसी भी तरीके से कम नहीं कहा जा सकता है, लेकिन सरकारी पैसे की बंदरबांट और सरकारी कमीशनखोरी के चलते ही शायद बड़ी कंपनियां इतनी कम कीमत में स्वेटर देने के लिये आनाकानी कर रही होंगी। बच्चों के स्वेटर की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। इसकी बानगी हाल ही में तब दिखी जब साल के अंत में खोले गए टेंडर में दो फर्में टेक्निकल बिड की शर्तें पूरी करने में तो सफल रहीं लेकिन दाम पर पेंच फंस गया। जहां सरकार प्रति स्वेटर 200 रुपये खर्च करना चाहती है, वहीं फर्मों का प्रस्ताव इससे डेढ़ गुना तक ज्यादा है। फिलहाल आधिकारिक तौर पर कोई भी अधिकारी इस पर बोलने को तैयार नहीं है। अब देखना यह है कि गांव की समितियां इतने पैसे में बच्चों के लिये कैसे स्वेटर की व्यवस्था करा पाएंगी। वहीं शिक्षक संगठनों ने जिलाधिकारियों को पत्र लिखकर असमर्थता जता दी है कि इतने कम समय और सरकारी तय कीमत 200 रुपये में स्वेटर बांटना उनके लिए काफी मुश्किल है।
लब्बोलुआब यह है कि विभागीय अधिकारियों की मंशा साफ नहीं दिख रही है। स्वेटर बांटने के लिये टेंडर डाले जाते रहे और उन्हें खारिज किया जाता रहा,लेकिन कोई नहीं जानता है कि इसके खारिज करने के पीछे वजहें क्या थीं। स्वेटर के नाम पर परिषदीय स्कूल के बच्चों के साथ सिर्फ खिलवाड़ ही किया गया। सरकार को भी बेगुनाही का हक नहीं है। इतना बड़ा विभाग होने के बाद भी स्वेटर वितरण की योजना में कहां चूक हुई और इस चूक के लिये कौन जिम्मेदार था? इस बात का खुलासा होना जरूरी है।

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