स्वच्छता अभियान की हकीकत और सवाल

अहम सवाल यह है कि आखिर क्यों प्रदेश में स्वच्छता अभियान परवान नहीं चढ़ पा रहा है? राजधानी समेत प्रदेश के तमाम बड़े शहरों में सडक़ से लेकर गलियों तक में गंदगी का अंबार क्यों नजर आ रहा है? कूड़ा निस्तारण की कोई समुचित व्यवस्था अभी तक क्यों नहीं हो सकी है? क्या सफाई व्यवस्था का जिम्मा संभाल रही नगर पालिकाएं और नगर निगम केवल शो पीस बन चुके हंै?

प्रदेश सरकार का पूरा फोकस स्वच्छता अभियान पर है। साफ-सफाई को लेकर राजधानी समेत हर जिले में जारूकता अभियान चलाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कई मौकों पर खुद सफाई अभियान का नेतृत्व कर लोगों को स्वच्छता का संदेश दिया। सरकार के मंत्री से लेकर अफसर तक इस मुहिम को सफल बनाने में जुटे हैं। बावजूद स्थितियों में कोई खास तब्दीली नजर नहीं आ रही है। अहम सवाल यह है कि आखिर क्यों प्रदेश में स्वच्छता अभियान परवान नहीं चढ़ पा रहा है? राजधानी समेत प्रदेश के तमाम बड़े शहरों में सडक़ से लेकर गलियों तक में गंदगी का अंबार क्यों नजर आ रहा है? कूड़ा निस्तारण की कोई समुचित व्यवस्था अभी तक क्यों नहीं हो सकी है? क्या सफाई व्यवस्था का जिम्मा संभाल रही नगर पालिकाएं और नगर निगम केवल शो पीस बन चुके हंै? सफाई के नाम पर हर वर्ष जारी होने वाला करोड़ों का बजट कहां जा रहा है? शहर को चमकाने के लिए नियुक्त सफाई कर्मियों और अफसरों के भारी भरकम अमले की क्या जरूरत है? क्या ऐसे ही स्वच्छ सर्वेक्षण में प्रदेश के शहर पास हो जाएंगे? क्या इसी व्यवस्था पर राजधानी को स्मार्ट सिटी का सपना देखा जा सकता है?
दरअसल, पूरे प्रदेश के शहर गंदगी का पर्याय बन चुके हैं। जहां तक राजधानी का सवाल है, यहां की तमाम सडक़ों पर कूड़े के अंबार लगे रहते हैं। कूड़ा उठान और निस्तारण के नाम पर महज खानापूर्ति की जाती है। सफाई कर्मी एक स्थान से कूड़ा उठाकर दूसरी जगह उसको जमा कर देते हैं। रेलवे स्टेशन और बस अड्डों के बाहर गंदगी बिखरी रहती है। पॉश इलाकों को छोड़ दिया जाए तो गलियों और मोहल्लों में शायद ही कभी सफाई कर्मी पहुंचते हैं। इस मामले में पुराने लखनऊ की हालत तो और भी बदतर है। यहां के कुछ इलाकों में नाले और नालियां तक चोक पड़े हैं। इनका पानी सडक़ों और गलियों में बहता रहता है। यह स्थिति तब है जब शहर की सफाई व्यवस्था को दुरुस्त करने के लिए मुख्यमंत्री तक कड़े निर्देश दे चुके हैं। यही हाल पूरे प्रदेश के अन्य शहरों का है। हकीकत यह है कि नगर पालिकाएं और नगर निगम भ्रष्टïाचार और राजनीति का अखाड़ा बन चुके हैं। ये शहरों को साफ-सुथरा रखने में पूरी तरह नाकाम साबित हो चुके हैं। जाहिर यदि इस व्यवस्था में सुधार नहीं किया गया तो तमाम स्वच्छता अभियान भी शहरों को साफ-सुथरा नहीं रख पाएंगे और सफाई व्यवस्था को लेकर सरकार की मंशा कभी सफल नहीं हो पाएगी।

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