क्या सच में यह सोने का शहर है!

जगदीश रतनानी

यह मुंबई में नववर्ष की मूक शुरुआत रही है। पार्टिर्यों के हॉट स्पॉट्स और उनके विस्तार, अतिक्रमण तथा कब्जे जांच के दायरे में आ गये है। उल्लंघनों की ओर से आंख मूंद लेने के लिए नागरिक अधिकारी निलंबित कर दिये गये हैं, जिसके कारण दिसंबर के आखिरी हफ्ते में एक पब में 14 व्यक्तियों की मौत हो गयी। नया साल एक उदास धुन के साथ लुढक़ रहा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या यह सच में ‘सोने का शहर’ है, जो सपनों को साकार करता है या यह महज खाये-अघाये ऐसे महानगरवासियों का शहर है, जहां कि हर कोई दूध चाहता है। इस अर्थ में क्या मुंबई मर रही है और क्या कुछ ठोस किया जाना चाहिए, इसका निर्णय करना बहुत जरूरी है।
घटनास्थल वह जगह है, जहां कभी कपड़ा मिल थी, जो कभी सरकार के बाद दूसरी सबसे बड़ी नियोक्ता थी। उसी जगह, जहां लोग चलनों का अनुसरण करते हंै और मिजाज में विलीन होकर अपने गमों से पीछा छुड़ाते हैं, मिल मजदूरों ने पहली बार कृत्रिम प्रकाश के बूते बढ़ायी गयी श्रम-अवधि के विरोध में रोशनी के बल्बों को तोडक़र विद्रोह का झंडा बुलंद किया था। लेकिन, हाल में जिस तरह की सफाई दी गयी कि- इन हादसों में आग लगने तथा मौतों का कारण अधिक जनसमूह का होना है। यह विचार नया नहीं है, हमेशा से कहा जाता है कि मुुंबई में प्रवसन नियंत्रित होना चाहिए। शिवसेना ने 1985 में, तत्कालीन बांबे म्युनिसिपल कॉरपोरेशन में सत्ता में आने के कुछ घंटों के भीतर ही इसे उछाला था। हेमा मालिनी ने भी मुद्दा उठाया था। उन्होंने कहा था कि वित्तीय केंद्र मुंबई में अधिक लोगों के घुसने की गुंजाइश नहीं है। जबकि वास्तविक तस्वीर बहुत अलग है। अनुकूलनीयता, औद्योगिकता तथा उद्यम के साथ आयी है, और शत-प्रतिशत सफलता के अवसरों वाला एक ऐसा परिवेश निर्मित किया, जिसमें कारोबारों को बढ़ावा मिला। यह सुव्यवस्थित तो है लेकिन उतना नहीं, जितना समझा जाता है। उद्यम सिर्फ धीरूभाई अंबानी निर्मित साम्राज्य अथवा फिल्मी सितारों की गरीबी से अमीरी वाली कहानियों में नहीं है, बल्कि लोगों के कठोर परिश्रम से तैयार लाखों लघुतर उद्यमों की सफलताओं में भी होता है, जिनके पास खोने को कुछ नहीं होता और जो अपना सब कुछ दांव पर लगा देते हैं। कारोबारी पटुता की कहानियां और उद्यम, हर जगह पाये जा सकते हैं। फुटपाथी दुकानों, ढाबों, बड़ापाव के स्टालों तथा उनके स्टोर्स में बेचनेवाले उनके मैकडोनाल्डी संस्करणों में। और हां, हुक्का बारों तथा उन भडक़ीले मायावी पबों में, जो इसे कभी न सोने वाले शहर का रुतबा सौंपते हैं। लेकिन कारोबार का एक बड़ा हिस्सा, किसी भी तरह किसी कीमत पर व्यवस्था के साथ खेलता दिख रहा है।
पंजीकृत प्रतिष्ठानों और वेंडरों की तुलना अवैध अधिक है; लगभग 60 फीसदी लोग मलिन बस्तियों में गुजर करते हैं; एक ही स्थान पर सडक़ की पटरी पर कलाकार चित्र बनाते हैं, तो दूसरी पटरी की ओर कोई स्कूल चलता है। यह शहर जिस प्रकार के अवसर पेश करता है, कुछ अन्य शहर ही कर सकते हैं। इसका अर्थ एक गुप्त अर्थव्यवस्था भी है, जिसमें हर कोई सौदा करने को तैयार है। कीमत अगर सही है, तो कोई भी हर्जाना चलता है।
रपटों के मुताबिक, जिस पब में आग लगी थी, उसने हादसे से कुछ ही दिन पहले अग्निशमन विभाग की मंजूरी प्राप्त की थी। इससे बदतर कुछ नहीं हो सकता। वस्तुत: अग्निशमन विभाग खुद ही संकट में रहा है। एक तरफ, जहां निरीक्षण के ढेरों प्रशासनिक कार्य हैं, जिनके लिए वह तैयार नहीं है तो दूसरी ओर, पर्याप्त प्रशिक्षण, बुनियादी ढांचे और उपकरणों की कमी भी है। स्पष्टतया, यदि इस शहर को अपना आकर्षण नहीं खोना है, तो तय करने के लिए काफी कुछ है। लेकिन ऐसा करने का एक तरीका ‘बाहरी लागों’ के बारे में बोलना नहीं है, जो यहां के लिए झुंड हैं। ये वे लोग है जो मुंबई को क्रियाशील रखतेे तथा आगे बढ़ाते हैं।
दरबान, जो आपके होटल में घुसते ही सलाम ठोंकता है, डिस्क जॉकी, जो डांस फ्लोर को और बारटेंडर जो काउंटर को जीवंत बनाए रखता है, ये लोग भी नायक हैं, जितनी हेमा मालिनी एक नायिका हैं। वह मुंबई से नहीं हैं और न ही वे। लेकिन, एक साथ वे मुंबईकर हैं, जो मुंबई का जादू रचते हैं।

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