सीआरपीएफ कैंप पर आतंकी हमले के निहितार्थ

सवाल यह है कि आतंकियों से निपटने के लिए सीआरपीएफ के जिस कैंप में जवानों को प्रशिक्षण दिया जाता है, वहां आतंकी घुस कैसे आए? कैंप की सुरक्षा में खामियां कहां थीं? क्या हमला ऑपरेशन ऑल आउट का परिणाम है? क्या कश्मीर के स्थानीय युवा भी फिदायीन बनने के रास्ते पर चल निकले हैं? क्या हमले के तार सीमापार बैठे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं?
जम्मू-कश्मीर के पुलमावा स्थित सीआरपीएफ कैंप पर आतंकवादियों ने हमला किया। इस हमले में पांच जवान शहीद हो गए। मुठभेड़ के दौरान तीनों आतंकियों को भी मार गिराया गया। हमले की जिम्मेदारी जैश-ए-मोहम्मद ने ली है। सवाल यह है कि आतंकियों से निपटने के लिए सीआरपीएफ के जिस कैंप में जवानों को प्रशिक्षण दिया जाता है, वहां आतंकी घुस कैसे आए? कैंप की सुरक्षा में खामियां कहां थीं? क्या हमला ऑपरेशन ऑल आउट का परिणाम है? क्या कश्मीर के स्थानीय युवा भी फिदायीन बनने के रास्ते पर चल निकले हैं? क्या हमले के तार सीमापार बैठे आतंकी संगठनों से जुड़े हैं? क्या आतंकियों का मनोबल अभी टूटा नहीं है? आखिर हमारे सैनिक कब तक आतंकी हमले में शहीद होते रहेंगे? क्या आतंकियों से निपटने के लिए अब नई रणनीति बनाने की जरूरत है? दरअसल, जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान की शह पर आतंकी गतिविधियां संचालित हो रही हैं। यहां के अलगाववादी भी पाक के हाथ की कठपुतली बन चुके हैं। ये अलगाववादी स्थानीय युवाओं को भडक़ा कर आतंकी गतिविधियों में शामिल कर रहे हैं। यही नहीं ये पत्थरबाजों की फौज भी तैयार करते रहे हैं। ये पत्थरबाज कुछ पैसों के लालच में पुलिस बल पर पथराव करते हैं और आतंकियों के खिलाफ हो रही कार्रवाई में बाधक बनते हैं। केंद्र की नयी रणनीति से इनके हौसले टूटे हैं। सेना ने यहां आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन ऑल आउट चला रखा है। ऑपरेशन में अब तक दो सौ से अधिक आतंकवादी मारे जा चुके हैं। मारे जाने वालों में कई शीर्ष आतंकी कमांडर भी शामिल हैं। इसके अलावा अलगाववादियों के खिलाफ भी शिकंजा कसा गया। जांच से साफ हो चुका है कि इन अलगाववादियों को कश्मीर में आतंकी गतिविधियों को संचालित करने के लिए हवाला के जरिए पाक समेत कई अन्य मुस्लिम देशों से पैसा भेजा जा रहा है। सेना ने सीमा पर भी चौकसी बढ़ा दी है। पाकिस्तान की ओर से आतंकी घुसपैठ काफी कम हो चुकी है। लिहाजा आतंकी संगठनों ने अब स्थानीय स्तर पर फिदायीन हमलावरों को तैयार करना शुरू कर दिया है। यह हमला कुछ ऐसा ही था। सरकार और सेना दोनों को ऐसे प्रशिक्षण कैंपों और सेना के शिविरों की सुरक्षा पर एक बार फिर विचार करना होगा। जवानों को सुरक्षा देना सरकार की जिम्मेदारी है। यदि ऐसा नहीं हुआ तो आतंकियों से लडऩे के हौसले पर इसका विपरीत असर पड़ सकता है। साथ ही कश्मीर में चल रहे फिदायीन प्रशिक्षण कैंपों और इनका संचालन करने वाले लोगों को चिंहित कर इनका खात्मा भी करना होगा।

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