राहुल के सामने तीन जातिवादी नेताओं की चुनौती

यह हास्य-विनोद का विषय कतई नहीं, बल्कि एक राष्ट्रीय दल के राष्ट्रीय नेता के बौना होने की घटना समझाने का प्रयास भर है कि एक बार हरियाणवी ताऊ गाड़ी में बैठ कर कहीं जा रहे थे। पैसेंजर गाड़ी थी बहुत धीरे-धीरे चल रही थी, यात्री खिझे हुए थे। एक जगह बीच रास्ते में गाड़ी रुकी तो किसी ने बताया इंजन के आगे भैंस का कटड़ा आ गया। गाड़ी चली तो कुछ ही मील की दूरी पर एक अन्य भैंस का कटड़ा इंजन के नीचे आकर कट गया और थोड़ी ही देर बाद यही दुर्घटना तीसरी बार घटी। इस बार ताऊ से बोले बिना रहा नहीं गया और हरियाणवी फुलझड़ी छोड़ दी कि इंजन तै आच्छा तो कटड़ा सै जो हर टेशन पे पहले पहुंचता है। ससुरे इंजन नै हटा कै गाड्डी में कटड़े नै जोड़ क्यूं नहीं देते। आज गुजरात कांग्रेस की हालत इसी गाड़ी जैसी दिखने लगी है जिसके इंजन तो राहुल गांधी हैं परंतु चर्चा ज्यादा हार्दिक पटेल व दूसरे जातिवादी नेताओं की है। इंजन समेत कांग्रेसी गाड़ी तीन जातिवादी नेताओं के पीछे-पीछे रेंगती दिख रही है। कांग्रेस के ही रणनीतिकारों ने अपने राष्ट्रीय नेता को दो-तीन जातिवादी नेताओं के समकक्ष लाकर खड़ा कर दिया है, ऐसा महसूस होने लगा है।
राज्य में पिछले कई सालों से चल रहे जातिवादी आंदोलनों के बीच हार्दिक पटेल, जिग्नेश मवानी, अल्पेश ठाकोर आदि युवा पाटीदार, दलित वंचित व पिछड़ा वर्ग के नेताओं के रूप में उभर कर सामने आए हैं। तीनों के आरक्षण को लेकर परस्पर विपरीत हित हैं इसके बावजूद ये कांग्रेस के साथ एक मंच पर खड़े दिखते हैं। इन्हें एक साथ साधने पर कांग्रेस के रणनीतिकार इसे बड़ी उपलब्धि मान रहे हैं जो गलत भी नहीं है। परंतु अपनी इस सफलता को बड़ा करके दिखाने के चक्कर में इन स्थानीय नेताओं का इतना गुणगान कर चुके हैं कि आज उनके खुद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल ही इनके सामने बौने नजर आने लगे हैं। तभी तो हार्दिक पटेल कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल को समय देते हैं, राजनीतिक समझौते की रूपरेखा तय करने का अल्टीमेटम देते हैं। कांग्रेस के रणनीतिकार हार्दिक एंड पार्टी के कार्यक्रम के अनुसार राहुल का कार्यक्रम तय करते हैं। यहां तक कि कांग्रेस के टिकट वितरण में राष्ट्रीय नेताओं की भी इतनी नहीं चली जितनी कि इस त्रिमूर्ति की।
इन जाति पंचायत के नेताओं को लेकर कांग्रेस के रणनीतिकार इतने अतिउत्साह में हैं कि कांग्रेस के प्रादेशिक नेता तो बिलकुल पर्दे से गायब हो चुके हैं। पर्दे के पीछे रहने वाले अहमद पटेल को छोड़ कर आखिर कितने लोगों ने सुन है गुजरात कांग्रेस कमेटी के वरिष्ठतम नेता शक्ति सिंह गोहिल, माधव सिंह सोलंकी, अर्जुन मोडवानी और सिद्धार्थ पटेल का नाम। जातिवादी नेताओं पर कांग्रेस इतना आसक्त हो चुकी है कि उसने अपने परंपरागत साथी व संयुक्त प्रगतिशील मोर्चा के सहयोगी राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) तक को घास नहीं डाली। पार्टी के कितने ही विधायक कांग्रेस को छोड़ चुके हैं और प्रदेश अध्यक्ष रहे शंकर सिंह वघेला भी अलग रास्ता चुन चुके हैं। जब प्रदेश स्तर के नेताओं की इतनी बेकद्री हो रही है तो जिला व मंडल स्तर के तो कहने ही क्या। ये जातिवादी नेता भी सीधे राहुल गांधी से बात करते हैं और राहुल अपने नेताओं से ज्यादा इस तिकड़ी पर न केवल विश्वास करते दिख रहे हैं बल्कि कहीं न कहीं निर्भर भी नजर आने लगे हैं। कांग्रेस यहां लगभग वही गलती कर रही है जो भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली विधानसभा चुनाव में ऐन मौके पर किरण बेदी को पार्टी की कमान सौंप कर की थी। किरण बेदी से स्थानीय भाजपाईयों में ऐसी निराशा व हताशा ऊपजी कि सत्ता की सशक्त दावेदार भाजपा उसी दिल्ली में तीन सीटों पर सिमट गई जहां कुछ समय पहले ही लोकसभा की सभी सातों की सातों सीटें जीती थीं। कांग्रेस को भाजपा के दिल्ली प्रकरण से सीख लेने की जरूरत है।
हाल ही में पाकिस्तानी अदालत द्वारा कुख्यात आतंकी हाफिज सईद के रिहा होने पर न जाने किस सलाहकार ने राहुल गांधी को हगप्लोमेसी फेल होने का ट्वीट करने की सलाह दी। ट्वीट से राहुल ने यह संदेश दिया कि मोदी अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप से गले मिलते आए हैं, अंग्रेजी में कहें तो हग करते रह गए और पाकिस्तान ने आतंकी को रिहा कर दिया। कोई पूछे कि पाकिस्तानी अदालत की पुश्तैनी कमजोरी मोदी सरकार की असफलता कैसे हो गई ? सईद को संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकी घोषित किए जाने के बाद गिरफ्तार किया गया था। उसकी रिहाई को किसी की असफलता कहें तो यह संयुक्त राष्ट्र यानि विश्व समुदाय की असफलता है न कि केवल भारत की।
दुनिया भर के देशों की सरकारों में सत्तारूढ़ व विपक्षी दलों ने इस रिहाई की निंदा की है और आतंकवाद से सर्वाधिक पीडि़त भारत ही है जहां विपक्ष इस अंतरराष्ट्रीय असफलता का प्रयोग एक राज्य के चुनाव में अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए करता दिखाई दे रहा है।

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