जान बची तो लाखों पाएं

स्मार्ट बनने के चक्कर में जान पर आ पड़ी जी। साहब जिस इमारत में बैठकर शहर को स्मार्ट बनाने का खाका तैयार कर रहे थे, वही अब जवाब देने लगी है। बिल्ंिडग का मिजाज देखकर उनके चेले सिर पर पैर रखकर भाग खड़े हुए। कह दिया, ऐसी नौकरी नहीं करनी जी। जानते-बूझते दूध में पड़ी मक्खी नहीं निगल सकते। छप्पड़ फाड़ कर कमाई हो या नहीं लेकिन छत जरूर सिर पर आ टपकेगी। अब साहब करें तो क्या करें। स्मार्ट सिटी का जिम्मा है तो खुद भी तो स्मार्ट दिखना होगा। जरा सी लापरवाही भारी पड़ सकती है। बाबा गुस्सा गए तो समझो गए। सो साहब सडक़ पर ही बैठ गए और लगे स्मार्ट सिटी का खाका तैयार करने।

यहां पूरे कुएं में पड़ी है भांग
चिकित्सा सेवाओं को दुरूस्त करने का जिम्मा संभाल रहे साहब की हालत पतली हो गई है। तमाम कोशिश कर ली, लेकिन उनके मातहत सुधरने का नाम नहीं ले रहे हैं। पूरे कुएं में ही भांग पड़ी है। एक दो हो तो सुधार भी ले यहां तो मामला ही सारा उलटा है। जिसको टोक दो वहीं नाक-भौं चढ़ाने लगता है। कोई नियम कानून काम नहीं आ रहा है। बेचारे मरीज परेशान होते हैं तो होते रहे। उल्टा अब तो साहब के निरीक्षण पर भी सवाल उठाए जाने लगे हैं। दिलजले बताते हैं, साहब बड़ी ऊंची चीज है। आम के आम गुठलियों के दाम की नीति पर चलते हैं। निरीक्षण के नाम पर वसूली कर रहे हैं और हमें नियम कानून समझा रहे हैं। अब कर लो क्या करते हो।

उल्टा पड़ा पासा

पंजा पार्टी के शहंशाह परेशान है। अभी तक खुद से भी परेशान थे अब तो अपनों ने भी परेशान करना शुरू कर दिया है। पता नहीं किस कुघड़ी में समुद्र किनारे ताल ठोकने चले गए थे। किसी ने बताया तक नहीं सामने पुराना अखाड़ची है। एक झटके में चलता कर देगा। अपनों ने पूरी फजीहत करा दी। जनेऊ पहनाया ही नहीं दिखा भी दिया। अरे भाई ये निजी मामला है। इसको कहने की क्या जरूरत। बात संभलती तब तक कमल दल वालों को एक और मुद्दा पकड़ा दिया। उन्हीं के एक सहयोगी ने उनको बादशाह बता दिया। किसी तरह पासा पलटने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन अब पासा ही उल्टा पड़ता दिख रहा है। अब तो सेल्फ गोल कर रहे हैं जी। जो होगा देखा जाएगा।

परेशान क्यूं हैं नेताजी

नेताजी अपने पुत्तर से बेहद नाराज चल रहे हैं। हालांकि यह नाराजगी बहुत दिनों से है। वैसे वे अपने पुत्तर को प्यार भी बहुत करते हैं। वे इसका बाकायदा प्रदर्शन भी करते हैं। आशीर्वाद तो वे जब-तब देते ही रहते हैं। लेकिन उनको लगता है उनके प्यार-दुलार के बावजूद उनका पुत्तर राजनीति का ककहरा कायदे से समझ नहीं पा रहा है। आम की जगह इमली कर देता है। साइकिल दे दी तब भी मानने को राजी नहीं है। पता नहीं कब समझेगा। लुटिया डूबा कर ही मानेगा। अरे पहले घर का साम्राज्य संभालो फिर दूसरे राज्य में पेड़ लगाने जाओ। अब नेताजी को कौन समझाए। राष्टï्रीय पार्टी ऐसे नहीं बनती जी। इसके लिए पूरे देश में साइकिल चलानी होगी। अब साइकिल बिना पैडल मारे तो चलेगी नहीं। सो वह गुजरात भी जाएगी और बंगाल भी।
साहब की कलाकारी
राजधानी के उत्तरी क्षेत्र में तैनात एक इंस्पेक्टर साहब मगन है। अपनी कला पर तालियां बजा रहे हैं। जो मिल जाता है उसे पकड़ कर अपने रुतबे का बखान करने लगते हैं। सामने वाले की कुशलक्षेम पूछने की जगह अपना मुखारबिंद खोल देते हैं। फिर आवाज की वाल्यूम सेट करते हैं। तो भइया, क्या बताएं। जब से मैंने यहां का चार्ज संभाला है, बदमाशों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई है। मजाल कोई यहां वारदात को अंजाम दे दे। साहब की राग दरबारी सुन सामने वाला भी बस मुस्कुरा देता है। लेकिन उनकी तीसमार खां बनने की पोल एक दिलजले ने खोल दी है। पता चला है कि साहब के दावे के पीछे उनकी घाघ कला काम कर रही है। उनके क्षेत्र में बदमाश सक्रिय हैं। वारदातें हो रही हंै, लेकिन मजाल साहब की मर्जी के बिना मामला दर्ज हो जाए। सो इस तरह साहब अपने क्षेत्र को अपराधमुक्त करने का बीड़ा उठाए हुए हैं। पता चला साहब जब टू स्टार थे तब भी ऐसी ही कलाकारी दिखाते थे।

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