योगी सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी पर कसा शिकंजा

उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने आखिरकार निजी स्कूलों की मनमानी पर रोक लगाने के लिये कानून बना ही लिया। उम्मीद है कि यह 2018-2019 के सत्र से लागू भी हो जायेगा। सरकार ने जो मसौदा तैयार किया है,वह ठीक ठाक लग रहा है। इसको कैसे और मजबूत बनाया जा सकता है, इसको लेकर अभिभावकों सहित आमजन से भी राय मांगी गई है। अगर योगी सरकार निजी स्कूलों की मनमानी पर अंकुश लगाने में कामयाब हो जाती है तो खासकर उन अभिभावकों के लिये काफी अच्छा रहेगा,जो सीमित संसाधनों के सहारे अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने का ख्वाब मन में पाले रहते हैं,लेकिन निजी स्कूलों की मनमानी उनके सपनों पर ग्रहण लगा देती है। योगी सरकार का यह फैसला इसलिये भी स्वागत योग्य है क्योंकि अधिकांश स्कूल मालिक पहुंच वाले हैं। शिक्षा के क्षेत्र में तमाम सफेदपोशों, पंूजीपतियों, ब्यूरोक्रेट्स और यहां तक कि कुछ धर्मगुरुओं की प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष भागीदारी ने सरकार के हाथ बांध रखे थे, जिसके चलते कई वर्षों से स्कूलों पर नियंत्रण के लिये डंडा नहीं चल पा रहा था, जबकि चुनाव के समय सस्ती और अच्छी शिक्षा के लिये सभी दलों द्वारा खूब ढिंढोरा पीटा जाता है। इससे अनाप-शनाप मदों के नाम पर अभिभावकों से अवैध वसूली का धंधा भी थमेगा।
योगी सरकार ने निजी स्कूलों पर लगाम लगाने के लिये विधेयक का ड्राफ्ट तैयार कर लिया है। विधेयक में प्रावधान है कि निजी स्कूल अब हर साल एडमीशन फीस नहीं ले पाएंगे। प्रस्तावित विधेयक यूपी बोर्ड, सीबीएसई, आइसीएसई सहित प्रदेश में संचालित सभी बोर्ड के स्कूलों, अल्पसंख्यक संस्थानों पर भी लागू होगा।
पहले देखने में यह आता था कि मदरसा, मिशनरी और अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान चलाने वाले संविधान में मिले अपने अधिकारों और छूट के नाम पर सरकारों को ठेंगा दिखाते रहते थे तो कुछ वोट बैंक की सियासत के कारण भी इनको छूट का फायदा मिल जाता था। सबसे अच्छी बात यह है कि बीस हजार रुपये सालाना से अधिक फीस लेने वाले स्कूल-कॉलेज ही इस विधेयक के दायरे में आयेंगे। उत्तर प्रदेश वित्त पोषित स्वतंत्र विद्यालय (शुल्क का विनियमन) विधेयक, 2017 का मसौदा माध्यमिक शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर अपलोड कर दिया गया है। स्कूलों की मनमानी पर नियंत्रण के लिये फीस को तीन हिस्सों में बांट कर संभव शुल्क, ऐच्छिक शुल्क व विकास शुल्क की श्रेणी बनाई गई हैं। स्कूल प्रबध्ंान डेवलपमेंट के नाम पर कुल फीस का केवल 15 प्रतिशत ही वसूल सकेंगे। निश्चित रूप से सरकार का यह कदम अभिभावकों के हित के लिए काफी कल्याणकारी है। सरकारी गाइड लाइन के रूप में उनको एक ‘प्लेटफार्म’ भी मिल गया है, जहां वह अपनी बात बेबाकी से कह सकेंगे। यह कड़वी हकीकत है कि लगातार महंगी होती निजी शिक्षा ने अभिभावकों की कमर तोड़ दी है। स्टेट्स सिंबल और स्कूल प्रबंधन के डर के कारण भले ही अभिभावक मुंह नहीं खोल पा रहे थे, लेकिन ‘कब्र का हाल मुर्दा ही जान सकता है।’ यह कहावत अभिभावकों पर बिल्कुल सही बैठती है। स्कूल संचालकों की मनमानी के खिलाफ कोई प्रभावी कार्रवाई न हो पाने के कारण स्थिति बद से बदतर हो गई थी। ट्यूशन फीस, एडमीशन फीस और डेवलपमेंट फीस के अलावा स्कूल ऐसे तमाम खर्चे अभिभावकों पर डाल रहे थे जिन्हें वहन कर पाना मुश्किल हो चला था। वैसे यह अभिभावकों पर पडऩे वाले कुल भार का एक पहलू है।
निजी स्कूलों की मनमानी सिर्फ उलटी-सीधे तरीके से फीस वसूली तक ही सीमित नहीं है। अप्रत्यक्ष रूप से भी अभिभावकों को चूना लगाया जाता है। निजी स्कूल मालिकों द्वारा एनसीईआरटी की जगह निजी प्रकाशकों की पुस्तकों का स्कूल में लगाया जाना। फिर प्रत्येक वर्ष प्रकाशक बदल कर नई किताब लगाना, ताकि कोई बच्चा पुरानी किताब न इस्तेमाल कर सके, जिससे स्कूल को प्रकाशकों से मिलने वाला कमीशन कम न हो जाये? निजी प्रकाशकों द्वारा पुस्तकों की मनमानी कीमत तय करने के साथ-साथ महंगी ड्रेस को लेकर भी अभिभावकों की शिकायत आती रहती है। किताबों और ड्रेस के इस खेल में मोटा कमीशन स्कूल संचालकों को मिलता है, बदले में अभिभावकों की जेब पर डाका पड़ता है। ऐसे में फीस को नियंत्रित करने के अलावा इन बिंदुओं पर भी सरकार को विचार करना चाहिए। इसी प्रकार बच्चों के आवागमन के लिये स्कूलों द्वारा बस या कार आदि के रूप में जो साधन मुहैया कराये जाते हैं। वह भी स्कूलों की अवैध कमाई का एक जरिया रहता है।

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