रेप की रिपोर्ट लिखवाना पीडि़त परिवार के लिए जीवट का काम

कोलकाता के जीडी बिरला सेन्टर फार एजुकेशन में एक चार साल की बच्ची के साथ उसी के स्कूल के पीटी टीचर द्वारा दुष्कर्म किया गया। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में कोचिंग से लौट रही एक युवती के साथ सामूहिक बलात्कार किया गया। इसी साल सितंबर में रेहान स्कूल में एक बालक की बेरहमी से हत्या कर दी गई। उससे पहले अगस्त में एक दस साल की बच्ची अपने मामा की हवस के कारण मां बनने की शारीरिक और मानसिक पीड़ा झेलने के लिए विवश हुई। कुछ समय पहले ही एक 12 साल की बच्ची ने पीजीआई में एक बालक को जन्म दिया। बेंगलुरू के एक स्कूल में एलकेजी की एक मासूम बच्ची के साथ स्कूल के सेक्यूरिटि गार्ड द्वारा छेड़छाड़ की गई।
ये तो केवल वो खबरें हैं जो मीडिया के द्वारा देश के सामने आईं हैं वो भी पूरे देश को झकझोर देने वाले देश की राजधानी दिल्ली में हुए निर्भया कांड के बाद, जब हमारी सरकार और हमारे नेताओं ने महिलाओं की सुरक्षा के बड़े-बड़े वादे करते हुए अनेकों योजनाओं और कानूनों की झड़ी लगा दी थी। लेकिन सच्चाई तो हम सभी जानते हैं। हमारे देश में रोजाना ऐसे कितने ही मामले घटित होते हैं लेकिन हालातों से मजबूरी के कारण या तो दब जाते हैं या दबा दिए जाते हैं।
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो ने अपनी ताजा रिपोर्ट में बच्चों के साथ होने वाले अपराधों में लगातार हो रही वृद्धि पर चिंता जाहिर की है। आंकड़ों के मुताबिक केवल 2016 में ही ऐसे 106958 मामलों को दर्ज किया गया है। 2007 में महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने एक रिपोर्ट पेश की थी जिसके अनुसार भारत में 53.22 प्रतिशत बच्चों ने अपने जीवन में यौन शोषण का सामना किया था जिसमें से 52.94 प्रतिशत लडक़े थे और 47.06प्रतिशत लड़कियां थीं। इसके बावजूद हालात नहीं बदले। देश में लगभग हर दूसरा बच्चा यौन शोषण का शिकार है।
यहां गौर करने लायक बात यह भी है कि एक तो लडक़े और लड़कियां दोनों ही इसके शिकार होते रहे हैं। शोषण करने वाले अधिकतर बच्चों और उनके माता पिता के भरोसेमंद ही होते हैं, शिक्षक, सेक्योरिटि गार्ड, रिश्तेदार, दोस्त या फिर पड़ोसी के रूप में होते हैं। अब समय आ गया है कि सरकार इसे एक राष्ट्रीय समस्या के रूप में स्वीकार करते हुए इस दिशा में जमीनी स्तर पर ठोस कार्यवाही करे।
हाल ही में मध्य प्रदेश सरकार ने इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए 12 वर्ष से कम उम्र की बालिकाओं के साथ बलात्कार करने पर फांसी की सजा देने की सिफारिश वाले प्रस्ताव को स्वीकार किया है। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या हमारे देश में बाल अपराध और यौन शोषण से संबंधित कानूनों की कमी है जो हम आज नए कानून बना रहे हैं? 2012 में ही सरकार पॉक्सो एक्ट नाम का एक कानून लेकर आई थी जिसमें 18 या 18 वर्ष से कम उम्र के बच्चों के यौन शोषण को एक गंभीर अपराध मानते हुए पुलिस को निर्देशित किया गया था कि वह पीडि़त के साथ उसके गार्जियन अर्थात अभिभावक जैसा व्यवहार करे, यह सुनिश्चित करे कि कानूनी प्रक्रिया के दौरान पीडि़त को किसी भी प्रकार की मानसिक प्रताडऩा न झेलनी पड़े और केस दर्ज होने के एक वर्ष के भीतर कोर्ट का फैसला आ जाए।
इस परिप्रेक्ष्य में यह जानकारी भी आवश्यक है कि नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की ही एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार पिछले वर्ष पॉक्सो के तहत देश में 15000 मामले दर्ज हुए थे जिसमें से 4 प्रतिशत केसों में अपराधी को सजा हुई, 6 प्रतिशत केसों में मुल्जिम को बरी कर दिया गया और 90 प्रतिशत केस लम्बित हैं।
इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि इन कानूनों के होते हुए भी अपराधियों के हौसले इतने बुलंद क्यों और कैसे हैं? क्यों हम इस प्रकार के अपराधों से आज तक अपने बच्चों को नहीं बचा पा रहे? एक के बाद एक हमारे बच्चे इन असामाजिक तत्वों का शिकार बनते जा रहे हैं और हम क्यों कुछ नहीं कर पाते? हमारी न्याय प्रणाली, कानून व्यवस्था, पुलिस, समाज, क्यों इन्हें किसी का भी डर क्यों नहीं? यही सच्चाई है और बहुत ही कड़वी भी है।
सबसे दुखद पहलू यह है कि यह सब जानते समझते हुए भी जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इस स्थिति को बदलने के प्रति गंभीर नहीं हैं। शायद इसीलिए आज सच्चाई यह है कि भले ही अपराधी पुलिस के नाम से न डरे लेकिन आम आदमी पुलिस थाने के नाम मात्र से डरता है। यहां रेप की रिपोर्ट लिखवाने का मतलब है पूरे परिवार के लिए एक अन्तहीन संघर्ष और मानसिक वेदनाओं की शुरुआत। पीडि़त के शारीरिक रेप के बाद परिवार का मानसिक और सामाजिक रेप। इसलिए पुलिस अपने आचरण में मूलभूत बदलाव करते हुए जनता को यह संदेश दे कि वह संवेदनहीन नहीं संवेदनशील है।

Pin It