अखिलेश यादव का गठबंधन राग मायावती के एकला चलो के इरादे

उत्तर प्रदेश नगर निकाय और नगर पंचायत चुनाव के नतीजे आने के बाद एक बार फिर बीजेपी के खिलाफ गठबंधन की बात होने लगी है। इस बार यूपी में महागठबंधन का शिगूफा बिहार में बैठे लालू यादव ने नहीं छोड़ा है,बल्कि यह आवाज यूपी के भीतर से ही आई है। गठबंधन की बात सपा मुखिया अखिलेश यादव ने उठाई है। अब अखिलेश बीजेपी के खिलाफ किस तरह के गठबंधन की बात कर रहे हैं यह तो वह ही जानें, लेकिन विधान सभा चुनाव के समय राहुल गांधी को साथ लेकर चलने का उनका प्रयोग कितना सफल रहा था, इसे सभी देख चुके हैं। अगर अखिलेश यह सोच रहे हैं कि कांग्रेस के साथ बसपा को भी इस गठबंधन का हिस्सा बना लिया जाये तो यह असंभव भले न हो मुश्किल जरूर लगता है। बसपा सुप्रीमों मायावती ने तो लोकसभा चुनाव में मिली करारी शिकस्त के बाद तब भी विधान सभा चुनाव के समय सपा के साथ गठबंधन नहीं किया था,जब उनको इसकी सबसे अधिक जरूरत थी, तो अब बदले हालात में मायावती क्यों सपा या कांग्रेस के साथ जायेंगी, निकाय चुनाव में बसपा काफी कुछ हासिल करने में सफल हो गई है। इस बात के संकेत मायावती ने भी यह कहकर दे दिये हैं कि वह गठबंधन तो चाहती हैं,लेकिन सर्वसमाज के साथ। यानी वह अपना वोट बैंक बढ़ाने को बेचैन हैं, न कि गठबंधन को, जिस तरह से उनका कोर दलित वोटर लौटा है और कई जगह मुसलमान वोटरों ने सपा से दूरी बनाकर बसपा के पक्ष में वोटिंग की है, वह माया की दलित-मुस्लिम गठजोड़ की इच्छा को पूरा कर सकता है। इसलिए अखिलेश के गठबंधन राग पर माया की एकला चलो की सोच भारी पड़ती दिख रही है।
मायावती निकाय और नगर पंचायत चुनावों के नतीजों से संतुष्ट नजर आ रही हैं और आगे की रणनीति पर काम कर रही हैं तो अखिलेश अपनी खामियां तलाशने की जगह ईवीएम में उलझे हुए हैं। ईवीएम पर फिर से प्रश्न चिन्ह लगा कर अखिलेश ने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि वह या तो अपनी खामियों को समझ नहीं पा रहे हैं, अन्यथा जानबूझ कर इस ओर से मुंह मोड़े बैठे हैं। ईवीएम पर हल्ला मायावती भी मचा रही हैं,लेकिन कहीं न कहीं दो नगर निगमों में मिली जीत से उनका ईवीएम में गड़बड़ी को लेकर पक्ष कमजोर नजर आ रहा है। अखिलेश तो निकाय चुनाव में प्रचंड बहुमत मिलने के मुख्यमंत्री योगी के दावे को भी झूठा करार दे रहे हैं। एक तरफ तो अखिलेश कहते हैं कि ईवीएम नफरत फैलाने का काम करती है, क्योंकि उससे यह पता चल जाता है कि किस बूथ पर किस प्रत्याशी को कितने वोट मिले तो दूसरी तरफ उन्हें इस बात का भी मलाल है कि जहां ईवीएम इस्तेमाल हुआ वहां बीजेपी को इतनी बड़ी जीत कैसे मिल गई। अपनी बात साबित करने के लिये वह यह भी कहते हैं कि नगर पंचायत के चुनावों में बीजेपी को इसलिए बड़ी सफलता नहीं मिली क्योंकि वहां बैलेट पेपर से चुनाव हुआ था।
यह और बात है कि अखिलेश और माया के दावे आंकड़ों में गलत साबित हो रहे हैं। जहां बैलेट पेपर से चुनाव हुए वहां बसपा की हालत ज्यादा खस्ता है। नगर निगमों से अधिक नगर पालिका परिषद व नगर पंचायतों में बसपा उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। नगर निगमों में जहां ईवीएम से चुनाव हुए थे वहां मेयर पद पर बसपा के 16 में से 11 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। यह आंकड़ा 68.75 प्रतिशत का है, जबकि नगर पालिका परिषद में बसपा के 70.43 फीसद उम्मीदवारों की जमानत जब्त हुई है। इसमें 186 प्रत्याशियों में 131 की जमानत जब्त हुई है। नगर पंचायतों के चेयरमैन में भी 75 फीसद उम्मीदवार जमानत नहीं बचा पाए। इसमें 357 पदों पर बसपा ने उम्मीदवार खड़े किए थे, लेकिन 268 प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई।
सपा की जरूर छोटे शहरों में स्थिति कुछ ठीक रही। नगर निगम में मेयर पद पर उसके भी 16 में 10 उम्मीदवार अपनी जमानत नहीं बचा पाए। यह कुल प्रत्याशियों का 62.5 प्रतिशत है तो नगर पालिका परिषद में उसके 43.68 फीसद उम्मीदवार ही जमानत नहीं बचा पाए थे। इसमें 190 में से 83 की जमानत जब्त हुई है, जबकि नगर पंचायतों में 54.47 प्रतिशत की जमानत जब्त हुई थी। इसमें 380 में से 207 प्रत्याशी जमानत बचाने लायक वोट भी नहीं पा सके।

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