ड्यूटी छोड़ो, पहले कर लें मनोरंजन

मेडिकल कॉलेज के एक विभाग के कर्मचारी आजकल बसंती के फैन हो गए हैं। ऐसे फैन की ड्यूटी जाए भाड़ में। मरीजों का क्या है वे तो हाय-हाय करते ही रहते हैं। पता नहीं इनको दवा खाने की इतनी जल्दी क्यों पड़ी रहती है। कायदे से एक गाना भी देखने नहीं देते। बस दवा दो दवा दो की रट लगाते रहते हैं। अरे भाई जिंदगी में बसंती का नाच नहीं देखा तो क्या देखा। फिर वह शोले वाली हो या कोई और। दस मिनट में तुम्हारा कुछ नहीं बिगड़ेगा लेकिन अपुन का मूड बिगड़ गया तो फिर नाच देखने का सारा मजा किरकिरा हो जाएगा। अब इन साहब को कौन बताए कि सरकार ने आपको कंप्यूटर दवाओं की ऑनलाइन उपलब्धता और इनका हिसाब-किताब देखने के लिए दिया है न कि वीडियो डाउनलोड कर नाच देखने के लिए। ये सरकारी मुलाजिम है जी। शांति से लाइन में लगे रहिए।

ईवीएम ने बहुत दुख दीन्हा

निकाय चुनाव हो गए हैं जी। मेयर, पार्षद और अध्यक्ष बन चुके हैं। कोई जीत का जश्न मना रहा है तो कोई हार के गम में गोते लगा रहा है। भगवा दल वाले मेयर की 14 सीटें झटक सीना फूला कर घूम रहे हैं। हाथी वालों को भी बहती गंगा में हाथ धोने का मौका मिल गया है। दो सीटें इनकी झोली में भी आ गई है। साइकिल और पंजा वाले खाली झोली देख मुंह लटकाए हैं। हाथी वाले ने इनका दर्द समझ लिया। सो लगे हाथ ईवीएम को निशाना बना दिया। कहने लगे सारी गड़बड़ी ईवीएम के कारण हुई है। इसी ने हमारी लुटिया डूबा दी वरना कभी हम शहंशाह हुआ करते थे। साइकिल और पंजे वाले भी सुर में सुर मिला रहे हैं।

खिसियानी बिल्ली खंभा नोंचे

इंस्पेक्टर साहब का अपराधियों ने जीना हराम कर दिया है जी। एक को अभी खोज भी नहीं पाते हैं दूसरे को खोजने का फरमान आ जाता है। बेचारे साहब कभी इधर भागते हैं कभी उधर। मामला फाइनल नहीं हुआ तो ठाठ की नौकरी से हाथ धोना पड़ सकता है। सो राजधानी के एक थाने में तैनात इंस्पेक्टर साहब भी अपना ग्राफ बढ़ाने में जुट गए। अपराधी नहीं मिला तो एक गरीब को धर दबोचा और करने लगे पिटाई। ऐसी पिटाई की पूछो मत। ऐसे ही चलता रहा तो अपराधी मजे मारेगा ही। दिलजले ने बताया, इंस्पेक्टर साहब की यह आदत पुरानी है।

बाबा का राजयोग

बाबा का राजयोग गजब का निकला जी। विरोधियों ने निकाय चुनाव में ऐसा शमा बांधा की बाबाजी की हालत खराब हो गई। किसी ने चुनाव को उनकी अग्नि परीक्षा तक बता दिया। सो बाबाजी हड़बड़ा गए। परीक्षा में फेल होने का ऐसा डर उनके भीतर बैठा कि न दिन देखा न रात भागदौड़ तेज कर दी। अपने प्रत्याशियों को जिताने के लिए जमीन-आसमान एक कर दिया। इनकी भागदौड़ रंग लाई या विरोधियों का हाथ पर हाथ धरे बैठना, यह तो पता नहीं लेकिन बाबाजी परीक्षा में फस्र्ट डिवीजन फस्र्ट पास हो गए। सोलह में 14 को मेयर की कुर्सी पर आसीन करा दिया है। जब से बाबा का राजयोग तेज हुआ है विरोधी भी अब कन्नी काटने लगे हैं।

बिना दक्षिणा नहीं गलेगी दाल

शहर के विकास में अहम जिम्मेदारी निभा रहे पंडित जी का जवाब नहीं। इनके जैसा तिकड़मी विश्व में खोजे नहीं मिलेगा। पंडित जी वैसे तो नवागत हंै लेकिन पूत के पांव पालने में अभी से नजर आने लगे हैं। इनके तिकड़मी दिमाग का लोहा सभी मानते हैं। लहरें गिन कर पैसा कमाने का हुनर पंडित जी को मालूम है। सो शहर का विकास हो न हो उनका विकास लगातार हो रहा है। मोटी रकम देखते ही इनकी बांछे गुलाब की पंखुडी की तरह खिल जाती हैं। ईमानदारी का चोला उतर जाता है। अब इसमें इनका क्या दोष जी। गुलाबी नोटों की रंगत ही ऐसी है कि बिना जेब के हवाले किए मन ही नहीं मानता। इधर नोट देखा और उधर पोथी-पतरा खोल कर ग्रहों की चाल सीधी करने में जुट जाते हैं ताकि आसामी का काम हो जाए। अब तो पंडित जी दक्षिणा के लिए सुविख्यात से कुख्यात हो गए हैं। विभाग के कई नटवरलाल भी इनकी प्रतिभा देख नतमस्तक हैं। बताया यह जा रहा है कि पंडित जी को जल्द ही भ्रष्ट भूषण पुरस्कार से सम्मानित करने की अंदरखाने पूरी योजना बन गई है। बस उनके कारनामों की पोटली खुलने का इंतजार हो रहा है।

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