कट्ïटरपंथियों के आगे झुका पाक

पिछले दिनों पाकिस्तान में घटित घटनाएं चिंतित करने वाली हैं। सेना ने एक बार फिर सरकार को कमजोर करने का दांव खेला और उसमें वह सफल रही। सेना ने इस्लामी कट्टरपंथियों को हवा देकर लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार को और कमजोर कर दिया। पाकिस्तान हमारा पड़ोसी मुल्क है, इसलिए वहां का घटनाक्रम हमें प्रभावित करता है। पाकिस्तान में लोकतांत्रिक शक्तियों का कमजोर और सेना का मजबूत होना शुभ संकेत नहीं है। पड़ोसी मुल्क की राजनीतिक अस्थिरता भारत के हित में नहीं है।
दरअसल, पाकिस्तान में इस्लामी कट्ïटरपंथियों का धरना-प्रदर्शन समाप्त कराने के लिए कानून मंत्री जाहिद हामिद से इस्तीफा ले लिया गया। तहरीक ए लब्बैक नामक संगठन के नेता खादिम हुसैन रिजवी के नेतृत्व में करीब दो हजार कट्टरपंथी कानून मंत्री के इस्तीफे की मांग पर धरने पर बैठे थे। प्रदर्शनकारी इस्लामाबाद की तरफ जाने वाली सडक़ को जाम किये थे। पाकिस्तानी सेना धार्मिक कट्टरपंथियों के साथ खड़ी थी। कट्टरपंथियों की इस जीत से लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार का निजाम और कमजोर हुआ है। इसे इस्लामी कट्टरपंथियों के आगे सरकार का समर्पण भी माना जा रहा है।
बता दें कि चुनाव के लिए नामांकन दाखिल करने से जुड़े एक हलफनामे में पैगंबर मोहम्मद का संदर्भ हटाने के लिए तहरीक ए लब्बैक कानून मंत्री को ईशनिंदा का जिम्मेदार बता रहा था। हालांकि कानून मंत्री ने पहले ही माफी मांग ली थी। साथ ही हलफनामे को भी उसके मूल स्वरूप में बहाल कर दिया था।
इसके बावजूद प्रदर्शनकारी उनके इस्तीफे से कम पर मानने को तैयार नहीं थे। वे हलफनामे में संशोधन को ईशनिंदा का मामला बता तूल दे रहे थे। पाकिस्तान में ईशनिंदा को लेकर सख्त कानून हैं और इन्हें न्यायसंगत बनाने की मांग उठती रही है। जब भी कोई इस दिशा में कदम उठाता है, उसे ईशनिंदक करार दे दिया जाता है।
इस्लामाबाद को रावलपिंडी से जोडऩे वाले फैजाबाद इलाके में जीटी रोड पर धरने पर बैठे कट्टरपंथियों के कारण आवागमन प्रभावित था। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर सख्त रुख अपनाया। मजबूरन सरकार ने कट्टरपंथियों को भगाने के लिए पुलिस की मदद ली। इस दौरान टीवी चैनलों का प्रसारण रोका गया और सोशल मीडिया पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। पुलिस मान रही थी कि धरने पर बैठे लोग आसानी से भगा दिये जायेंगे, पर ऐसा नहीं हो पाया, क्योंकि प्रदर्शनकारियों को इसकी पूर्व सूचना थी और वे पूरी तरह तैयार थे। इस कार्रवाई में छह प्रदर्शनकारी भी मारे गये। पुलिस कार्रवाई के विरोध में कट्टरपंथी गुट के समर्थक सभी बड़े शहरों में तोडफ़ोड़ पर उतर आये। नतीजतन सरकार ने सेना को उतारने का फैसला किया, लेकिन सेना ने सरकार के आदेश को मानने से इनकार कर दिया। सेना की मध्यस्थता से धरना तो समाप्त हुआ, पर समझौते के तहत कानून मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा।
इस घटनाक्रम की एक अन्य कड़ी है। कुछ दिन पहले एक न्यायिक पैनल ने मुंबई हमलों के मास्टरमाइंड हाफिज सईद को नजरबंदी से रिहा करने का आदेश दे दिया। हाफिज सईद को अंतरराष्ट्रीय समुदाय ने भी आतंकवादी घोषित कर रखा है।
ऐसी सूचनाएं हैं कि हाफिज उनके करीबी लोगों द्वारा शुरू राजनीतिक दल की कमान संभाल सकते हैं और चुनावी मैदान में उतर सकते हैं। इसी दौरान पूर्व राष्ट्रपति और सेनाध्यक्ष रहे मुशर्रफ लंदन से हाफिज सईद के समर्थन में इंटरव्यू दे रहे थे। आपस में जुड़ीं ये कडिय़ां इस बात की ओर इशारा कर रहे हैं कि सेना सरकार का निजाम लगातार कमजोर करती जा रही है। सेना एक और खेल खेलती है। यह सब कुछ अरसे पहले से चल रहा है। आपको याद होगा कि कुछ अरसा पहले सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को पद के अयोग्य ठहरा दिया था। इसके बाद उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था। नवाज शरीफ के करीबी शाहिद अब्बासी को प्रधानमंत्री बनाया गया। यह सब जानते हैं कि राजनीतिक और प्रशासनिक रूप से वह कमजोर प्रधानमंत्री हैं। हालांकि पाकिस्तान के लिए ऐसी परिस्थिति कोई नयी नहीं है। पाकिस्तान में लोकतांत्रिक तरीके से चुनी सरकारों को बर्खास्त किये जाने का इतिहास पुराना है। पाकिस्तान में सेना आतंकियों को नियंत्रित करती है और ऐसे मौकों पर उनका इस्तेमाल करती है ताकि ऐसी कोई पहल कामयाब न हो पाये। सेना की हमेशा कोशिश रहती है कि चुना हुआ नेता लोकप्रिय और ताकतवर न हो जाये।
पिछले कुछ समय से पाकिस्तान में सेना और राजनेताओं के बीच शह मात का खेल चल रहा है। पड़ोसी होने के नाते इस खेल का खामियाजा भारत को भी झेलना पड़ता है, क्योंकि लोकतांत्रिक रूप से चुनी सरकार से संवाद की गुंजाइश रहती है। सेना पर भी थोड़ा बहुत अंकुश रहता है। वह खुलेआम आतंकवादियों को बढ़ावा नहीं दे पाती। यही वजह है कि भारत के दृष्टिकोण से यह घटनाक्रम बेहद चिंताजनक है।

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