मुस्कुराइए कि आप नए लखनऊ में हैं

महफिलों की जगह नवाबों के शहर में फेस्टिवल्स की धूम

11 से 17 दिसंबर तक संगीत नाटक अकादमी में रेपर्टवा फेस्टिवल
नाटक, संगीत और स्टैंड अप कॉमेडी से जुड़ीं होंगी प्रस्तुतियां

हिमांशु बाजपेयी

लखनऊ। कभी लखनऊ अपनी अदबी महफिलों और नशिस्तों के लिए मशहूर था। आज के लखनऊ में नशिस्तों एवं महफिलों के बजाय फेस्टिवल्स की धूम है। आगामी 11 से 17 दिसंबर तक संगीत नाटक अकादमी में रेपर्टवा फेस्टिवल होने जा रहा है। ये व्यावसायिक चरित्र का फेस्टिवल है जिसमें नाटक, संगीत और स्टैण्ड-अप कॉमेडी की प्रस्तुतियां होंगी। रेपर्टवा के अलावा भी शहर में लखनऊ लिटरेचर फेस्टिवल, लखनऊ लिटरेरी फेस्टिवल, लखनऊ मैंगो फेस्टिवल, सनतकदा लखनऊ फेस्टिवल, लखनऊ कथक फेस्टिवल, वाजिद अली शाह फेस्टिवल, सरकारी लखनऊ महोत्सव, अहिंसा फेस्टिवल जैसे बेशुमार फेस्टिवल पिछले कुछ सालों से हो रहे है। कला-संस्कृति के संदर्भ में इन फेस्टिवल्स की भूमिका पर लगातार बहस होती रही है। रेपर्टवा फेस्टिवल की आमद ने इस बहस को फिर ताजा कर दिया है। मूल सवाल यही है कि कला जब बाजार की जीनत बनती है तो मआशरे पर इसका क्या असर होता है?
इस हंगामाखेज फेस्टिवल की शुरूआत 2009 में नाट्य महोत्सव या थिएटर फेस्टिवल के तौर पर हुई थी। इसके आठवें संस्करण में लाइव म्यूजिक और स्टैण्ड-अप कॉमेडी का फेस्टिवल भी शामिल रहेगा। इस बार के फेस्टिवल में नाटक, संगीत और स्टैण्ड-अप कॉमेडी के कल 28 टिकट आधारित प्रस्तुतियां होंगी, इनमें 150 से ज़्यादा कलाकार शामिल रहेगें, जिनमें से बेशतर लखनऊ में पहली बार परफॉर्म करेंगे। इसके अलावा रेपर्टवा की तरफ से 200 से ज़्यादा लोग आयोजन-दल का हिस्सा हैं, जो एक हफ्ते तक कुल 22000 लोगों को टिकट के साथ इस फेस्टिवल तक लाने की कोशिश करेंगे। इस भव्यता के बावजूद शहर के वरिष्ठ रंगकर्मी नहीं मानते कि ये फेस्टिवल शहर के रंगमंच में कोई सार्थक योगदान दे पाएगा। रंग-संगीतकार अखिलेश दीक्षित कहते हैं कि रेपर्टवा में लोग टिकट खरीदकर नाटक देखने जाते हैं क्योंकि रेपर्टवा में सेलिब्रिटीज़ एवं फिल्मी सितारों की मौजूदगी रहती है। साथ ही रेपर्टवा का जितना प्रचार-प्रसार होता है वो सरकारी सहयोग से नाटक करने वाले आम नाटककारों के बस की बात नहीं है। स्पॉन्सरशिप भी उतनी नहीं आती। रेपर्टवा का अपना मकसद और सोच है और उस लिहाज से वो ठीक काम कर रहा है मगर शहर के रंगमंच की कोई बेहतरी इससे नहीं होने वाली। अपनी शुरुआत से ही इस फेस्टिवल ने लखनऊ की सांस्कृतिक दुनिया में एक विक्षोभ पैदा किया। सालों तक पारंपरिक ढंग के रंगकर्म और बिना किसी टिकट के नाटक देखने के आदी रहे इस शहर में रेपर्टवा महंगे टिकट, नई विषयवस्तु और कलेवर वाले नाटक लाने के लिए चर्चित हुआ। ये इस फेस्टिवल की एक ऐसी बात थी जिसके लिए इसे तारीफ भी बहुत मिली और शुरू के सालों में आलोचना भी बहुत हुई। सही या गलत पर बहस हो सकती है पर एक बात तय है कि लखनऊ के लिए ये बिल्कल नया तर्जुबा था। इससे पहले लखनऊ में अखिल भारतीय स्तर पर चर्चित हो रहे नए नाटक व्यावसायिक तौर पर न के बराबर होते थे। यहां ज़्यादातर स्थानीय रंगकर्मियों द्वारा तैयार किए गए नाटक होते थे वो भी बिना टिकट अथवा मामूली टिकट पर।
महंगे टिकट और असामान्य विषयों पर होने वाले नाटकों तक लोगों को खींचना एक असंभव बात समझी जाती थी मगर रेपर्टवा ने अपना ऐसा दर्शक वर्ग तैयार किया है जो न सिर्फ टिकट खऱीद कर नाटक देखता है बल्कि पारंपरिक विषयों से अलग नाटक देखने के लिए भी तैयार रहता है। ये अलग बात है कि इस दर्शक-वर्ग में बेशतर लोग उच्च वर्गीय होते हैं और ये दर्शक-वर्ग सब का प्रतिनिधित्व नहीं करता। इस बार टिकट की क़ीमत 300 से 500 तक है, जो कि लखनऊ के लिहाज से ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा है, इसके बावजूद आयोजकों को उम्मीद है कि वे दर्शक जुटाने में कामयाब होंगे।
अपने आठवे संस्करण में रेपर्टवा बर्फ, लॉरेट्टा, चुहल, द जेन्टलमेन्स क्लब और धूम्रपान जैसे बहुचर्चित नाटक लेकर आ रहा है। ये सभी नाटक राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहे हैं जो लखनऊ में पहली बार होंगे। इसी तरह लखनऊ में पहली बार वरून ठाकुर, रजनीश कपूर, अभिषेक उपमन्यु, कुनाल कामरा, गौरव कपूर, सुमित आनंद, वरून ग्रोवर, संजय रजौरा जैसे चर्चित स्टैण्ड-अप कॉमेडियन्स भी रेपर्टवा के मंच पर आ रहे हैं। यहां एक म्यूजिक फेस्टिवल भी होगा जिसमें बॉलीवुड, गजल या ठुमरी तक ही महदूद लखनवी मिजाज से अलग हटकर मॉडर्न बैंड म्यूजक़ि से लखनऊ का परिचय होगा। व्हेन चाय मेट टोस्ट, कबीर कैफे, परवाज, नमित दास और अनुराग शंकर, अंकुर एंड द ग़लत फैमिली और इंडियन ओशेन जैसे बैण्ड जो कि इस फेस्टवल में एक मंच पर प्रस्तुति देंगे। ये अलग बात है कि इन सबका लुत्फ़ लेने के लिए अच्छा खासा पैसा खर्च करना पड़ेगा। कुल मिलाकर रेपर्टवा लखनऊ में एक नई राह पर चल रहा है, जिसकी अपनी दुशवारियां, आसानियां, मंजिलें और हासिल हैं। एक वो लखनऊ है जो बड़े अदब-अखलाक से अपने नॉस्टेल्जिया का उत्सव मनाता है। एक ये लखनऊ है जिसके मिजाज में एक मगरूर बांकपन है जो पुरानी राहों पर चलने से इंकार करता है। इन दोनों के बीच लखनऊ का तहजीबी सफर सिमटा हुआ है।

आम आदमी को कुछ नया दिखाने की कोशिश: भूपेश राय

रेपर्टवा के संस्थापक भूपेश राय कहते हैं कि इस फेस्टिवल के माध्यम से हमने ये कोशिश की है कि हम लखनऊ के लोगों के सामने इस तरह के नाटक या अन्य परफॉर्मिंग आर्ट्स पेश कर सकें जो आम तौर पर उन्हें देखने को नहीं मिलतीं और जो उनके अंदर ये नया बोध पैदा कर सकें कि थिएटर या म्यूजिक इस तरह का भी होता है और हमें इसको और करीब से जानना चाहिए। टिकट के महंगे होने के सवाल पर भूपेश कहते हैं कि कोई भी टिकट तब तक महंगा नहीं है जब तक वह अपने दाम के बराबर की चीज दर्शक के सामने रखता है और हमारी कोशिश यह रहती है कि दर्शक जब हॉल से निकलें तो उन्हे महसूस हो कि इस प्रस्तुति के लिए ये टिकट खरीदना सार्थक रहा।

खास आय वर्ग तक सिमट जाता है फेस्टिवल: सौरभ मिश्र

लखनऊ के नाटक-प्रेमी सौरभ मिश्र इस तस्वीर के दूसरे पहलू को सामने रखते हुए कहते हैं कि ये बात तो ठीक है कि बड़े नाटक को बड़े स्तर पर इस तरह के माहौल के साथ करवाने में खर्च काफी आता है, जिसे निकालने के लिए टिकट का होना जरूरी है मगर जब एक टिकट का दाम फिल्म के दाम से दो-तीन गुना हो और आप एक समूह में नाटक देखने जाना चाहते हैं तो आम दर्शक के लिए इसमें समस्या पैदा होती है और ऐसे में ये फेस्टिवल न चाहते हुए भी एक खास आर्थिक पृष्ठ-भूमि के दर्शकों का फेस्टिवल होकर रह जाता है। जिसके केन्द्र में मजबूरन इसी वर्ग को संतुष्ट करने वाला सौन्दर्य-बोध एवं रुचियां होती हैं। इस संबंध में वैकल्पिक रास्ता ढूंढने की जरूरत है।

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