हदिया जैसी लड़कियां ’लव’ नहीं ’जिहाद’ का शिकार होती हैं

डॉ. नीलम महेन्द्र

परिवर्तन तो संसार का नियम है। व्यक्ति और समाज के विचारों में परिवर्तन समय और काल के साथ होता रहता है लेकिन जब व्यक्ति से समाज में मूल्यों का परिवर्तन होने लगे तो यह आत्ममंथन का विषय होता है। अखिला अशोकन से हदिया बनी एक लडक़ी आज देश में एक महिला के संवैधानिक अधिकारों और उसकी ‘आजादी’ की बहस का पर्याय बन गई है।
दरअसल आज हमारा देश ‘उस दौर से गुजर रहा है जहां हम हर घटना को कभी अपनी अभिव्यक्ति तो कभी अपनी स्वतंत्रता, कभी जीने की आजादी तो कभी अपने संवैधानिक अधिकारों जैसी विभिन्न नई-नई शब्दावलियों के जाल में उलझा देते हैं। इस पर पूर्वाग्रहों से ग्रसित प्रतिक्रिया भी त्वरित होती है। शायद अब हमें पहले यह सोचना चाहिए कि समाज में अपने हकों की बात करते करते कहीं हम इतने नकारात्मक तो नहीं होते जा रहे कि मानव सभ्यता के प्रति अपना सकरात्मक योगदान देने का कर्तव्य लगभग भूल ही चुके हैं? सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या हमारे देश में एक लडक़ी अपने पसंद के लडक़े से शादी नहीं कर सकती? क्या वो अपने पसंद का जीवन नहीं जी सकती? क्या वो अपनी मर्जी से धर्म परिवर्तन नहीं कर सकती? ऐसे अनगिनत प्रश्न हैं जो एक सभ्य समाज के लिए उचित भी हैं। लेकिन ऐसे सवाल पूछने वालों से एक प्रश्न कि क्या ये तब भी ऐसे ही तर्क देते अगर हदिया उनकी खुद की बेटी होती? क्या हम अपनी बेटियों को हदिया बनाने के लिए तैयार हैं? जबकि प्रश्न यह उठना चाहिए कि क्यों एक लडक़ी ने विद्रोह का रास्ता चुना? क्यों एक मामला जो कि पारिवारिक था कानूनी और सामाजिक मुद्दा बन गया? क्या वाकई में यह मामला ‘लव’ का है या फिर एक लडक़ी किसी लडक़े के लिए ‘जिहाद’ का मोहरा भर है? यह लव जिहाद की जगह जिहादी लव तो नहीं है?
ऐसी बातें निकलती हैं तो दूर तलक जानी चाहिए लेकिन कुछ बेमतलब के मुद्दों पर अटक कर ही दम तोड़ देती हैं। इसलिए ऐसे मुद्दों पर ईमानदारी से चर्चा की जानी चाहिए। क्या वाकई हमारे देश के हालात इतने खराब हैं कि हमारी बेटियां (जैसा कि हदिया ने कहा) माता पिता, परिवार, समाज, जाति, धर्म और रूढिय़ों की कैदी हैं? क्या हमारे देश में आज तक कोई प्रेम विवाह नहीं हुआ? इन प्रश्नों के ईमानदार उत्तर तो हम सभी जानते हैं। अब सवाल उठता है एक हिन्दू लडक़ी के अपनी ‘मर्जी से इस्लाम कबूलने’ पर। हदिया या फिर किसी का भी अपने जन्म के धर्म को बदल कर किसी दूसरे सम्प्रदाय को अपनाना कोई मामूली घटना नहीं होती। ऐसे व्यक्ति से उन बिन्दुओं के बारे में पूछा जाना चाहिए, जिसकी वजह से उसने सारी भावनाओं को दरकिनार करते हुए यह कदम उठाया।
अब बात आती है ‘अपनी पसंद से शादी’ करने की। सबसे महत्वपूर्ण तथ्य तो यह है कि हदिया का शफीन जमां से विवाह ‘प्रेम विवाह’ नहीं है। खुद उसके कथित पति के वकील कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा है कि एक मैट्रीमोनियल साइट के जरिए दोनों का निकाह हुआ है तो ‘प्रेम’ की बात तो खुद-ब-खुद खत्म हो गई। उसने ‘अपने प्रेमी’ से नहीं बल्कि ‘एक अजनबी’ शफीन जमां से शादी की है। जो की खाड़ी का रहने वाला है, वह हदिया को भी वो निकाह के बाद खाड़ी ले जाना चाहता था, उसका क्रिमिनल रिकार्ड भी है, क्या यह सारी बातें हदिया को शादी से पहले पता थीं?
सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कि कपिल सिब्बल जैसे वकील से अपना केस लड़वाने के पैसे शफीन के पास कहां से आ रहे हैं? सच तो यह है कि इन हालातों में अगर हमारी बेटियां हदिया बन रही हैं तो यह शफीन जैसों की जीत नहीं बल्कि माता-पिता के रूप में हमारी हार है। अगर आज हदिया को अपने माता पिता का साथ ’कैद’ लगता है तो यह हमारे संस्कारों की असफलता है। वो समय जब बच्चा कच्ची मिट्टी होता है उस समय हम अगर उसके मन में संस्कारों के बीज नहीं डाल पाए तो उस भूमि पर अनचाहे विचार ही अपनी जगह बनाएंगे। इसलिए हमें अपने बच्चों में ऐसे संस्कार विकसित करने होंगे कि वे अपने पारिवारिक और सामाजिक मूल्यों पर अटूट विश्वास रखें और जीवन भर उन पर अडिग रहें। यदि परिवार के प्रति प्रेम की डोर मजबूत हो तो क्या लव और क्या जिहाद हमारी बच्चियां अखिला से हदिया कभी नहीं बन सकतीं।

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