योगी धर्मनिरपेक्षता से परेशान क्यों

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि ‘धर्मनिरपेक्षता, सबसे बड़ा झूठ है, जो आजादी के बाद से बोला जा रहा है और जिसने इस देश को भारी नुकसान पहुंचाया है। जिन्होंने इस शब्द का सबसे पहले प्रयोग किया है, उन्हें जनता से माफी मांगनी चाहिए।’ यह केवल एक शब्द के अर्थ का सवाल नहीं है। असल में आजादी के 70 वर्ष बाद जो लोग प्रमुख निर्वाचित पदों पर बैठे हुए हैं, वे इस सच्चाई को आसानी से नहीं पचा सकते कि भारत ने उनके संकुचित धर्म-आधारित देश ‘हिंदु-पाकिस्तान’ के संस्करण की अवधारणा को पूरी तरह से अस्वीकृत कर दिया है। वैसे नेता स्वतंत्रता संग्राम के बुनियादी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को चुनौती देने के लिए अपने पदों का दुरुपयोग कर रहे हैं।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक अवसरों पर यह आदेश दिया है कि धर्मनिरपेक्ष चरित्र भारतीय संविधान की मौलिक संरचना का एक हिस्सा है और मौलिक संरचना के किसी भी हिस्से को मिटाया नहीं जा सकता है, यहां तक कि संवैधानिक संशोधन के द्वारा भी नहीं। यह सबसे पहले 1973 में केशवानंद भारती मामले में कहा गया और फिर 1994 में बोम्मई निर्णय में इसे दोहराया गया। दूसरे मामले में न्यायालय ने विस्तृत गहराई तक जाकर इसकी व्याख्या की है कि धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा का तात्पर्य क्या है। संविधान धर्म और राजसत्ता के घालमेल को मान्यता नहीं देता और इजाजत भी नहीं देता। दोनों को आवश्यक रूप से अलग रखना है- यह संवैधानिक आदेश है। कोई इसके विपरीत नहीं बोल सकता है, जब तक कि देश में संविधान का शासन है। राजनीति और धर्म को मिलाया नहीं जा सकता है। इससे अधिक और क्या स्पष्ट हो सकता है? लेकिन आदित्यनाथ सरीखे नेता न तो संविधान को मानते हैं और न न्यायालय को। धर्मनिरपेक्षता के लिए संघर्ष केवल एक शब्द के उपयोग के बारे में नहीं है, बल्कि यह भारत के संविधान के बुनियादी ढांचे की रक्षा का संघर्ष है।
आदित्यनाथ चाहते हैं कि धर्मनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग जिन लोगों ने किया, वे माफी मांगे। केवल वे ही लोग, जो स्वतंत्रता संग्राम और उसके इतिहास से कोसों दूर हैं, इस प्रकार का प्रश्न उठा सकते हैं कि धर्मनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग सबसे पहले किसने किया। धर्मनिरपेक्षता ने स्वतंत्रता संग्राम के योद्धाओं को प्रेरित किया, भले ही उन्होंने इस शब्द का प्रयोग किया हो या नहीं। हमारे देश के स्वतंत्रता आंदोलन में स्थापित धर्मनिरपेक्ष प्रवृत्ति ने मुस्लिम लीग और हिंदू महासभा के वैचारिक आधार को अस्वीकृत कर दिया था। ये दोनों ही राष्ट्रीयता के धार्मिक आधार पर विश्वास करते थे।
हिंदुत्व का विचार-बीज देने वाले बीडी सावरकर थे, जिन्होंने अपनी पुस्तक ‘हिंदुत्व का सार’ में हिंदू राष्ट्र का सिद्धांत विकसित किया- ‘हम हिंदू एक हैं और एक राष्ट्र है’। 1937 में महासभा के अहमदाबाद सत्र में सावरकर ने इस संकीर्ण समझ को आगे बढ़ाया और कहा कि ‘भारत में हिंदू और मुस्लिम दो राष्ट्र हैं।’
सर्वप्रथम सावरकर द्वारा दो राष्ट्रों के सिद्धांतों को प्रस्तावित किया गया था, जिसे कई वर्ष बाद पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने सन् 1943 में मुस्लिम लीग के सम्मेलन में स्वीकृत किया।
भारत ने आजादी पायी, लेकिन ठीक उसी समय सांप्रदायिक उन्मादियों के द्वारा धर्म के नाम पर हजारों लोगों की हत्या की गयी और लोगों को विस्थापित किया गया। तब आरएसएस व उसके समर्थक इस धर्म-आधारित संकुचित विभाजन को संस्थागत स्वरूप देने का आह्वान कर रहे थे। इसी पर आदित्यनाथ का विश्वास है।
जबकि भगत सिंह ने लिखा था कि ‘1914-15 के शहीदों ने धर्म को राजनीति से अलग किया। उन्होंने समझा था कि धर्म व्यक्तिगत मामला है, जिसमें किसी दूसरे के हस्तक्षेप की जरूरत नहीं है, लेकिन वे सभी लोग सहमत हुए कि धर्म को राजनीति में प्रवेश नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह आम लोगों को एक साथ काम करने की इजाजत नहीं देता।
यही कारण था कि गदर पार्टी द्वारा आहूत क्रांति में लोग एकताबद्ध रहे। भगत सिंह द्वारा गठित भारत नौजवान सभा के संविधान में ये महत्वपूर्ण बिंदु थे-उनका सांप्रदायिक संस्थानों या दलों से कुछ लेना-देना नहीं था, जो सांप्रदायिक विचारधारा का प्रसार करते थे। जनता के बीच एक सामान्य सहिष्णुता का सृजन करना, इस समझ के साथ कि धर्म व्यक्तिगत विश्वास का मामला है और उसी के अनुरूप पूर्णतया आचरण करना था।

Pin It