भाजपा के विजय रथ के लिए चुनौती बना दलित-मुस्लिम फैक्टर

निकाय चुनाव परिणामों में दलित और मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्रों में कमजोर रहा भाजपा का प्रदर्शन
आगामी चुनावों में सपा, बसपा और कांग्रेस गठबंधन के भी बन रहे आसार

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। उत्तर प्रदेश नगर निकाय चुनाव में बहुजन समाज पार्टी की दो मेयर सीटों पर जीत के मायने अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। जहां इस जीत पर हाशिए पर पहुंची बीएसपी को एक नई संजीवनी मिली है, तो वहीं विपक्ष के लिए भी गठबंधन की राजनीति पर नए सिरे से आत्ममंथन करने का एक सुनहरा अवसर दिया है।
देश में सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी भाजपा सूबे में विपक्षी दलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है, लेकिन भाजपा के लिए दलित और मुस्लिम फैक्टर मुसीबत बनता जा रहा है। बीजेपी के विजय रथ को यूपी में अकेले रोकना संभव नहीं है। इसलिए आने वाले समय में बसपा, सपा और कांग्रेस गठबंधन कर चुनाव में भाजपा को कड़ी टक्कर दे सकती है। बसपा की नगर निकाय में यह जीत इसी ओर संकेत भी कर रही है। दरअसल बीएसपी की इस जीत को दलित-मुस्लिम वोटरों की एकजुटता के रूप में भी देखा जा रहा है। मेरठ में बीएसपी की सुनीता वर्मा ने करीब 28 हजार वोटों से बीजेपी की कांता करदम को हराया। यह जीत एक बड़ी जीत है. बीजेपी ने भले ही 14 मेयर सीटें जीतीं हों, लेकिन मेरठ की हार उसे लंबे समय तक सालती रहेगी। यही हाल अलीगढ़ में भी रहा। यहां बीएसपी के मोहम्मद फुरकान ने बीजेपी के राजीव को 11 हजार से ज्यादा वोटों से मात दी। पहली बार पार्टी सिम्बल पर चुनाव लड़ रही बीएसपी ने कई जगहों पर मजबूती से चुनाव लड़ा और बीजेपी को कड़ी टक्कर दी। वहीं सहारनपुर, आगरा और झांसी में पार्टी ने बीजेपी को नाकों चने चबवा दिए।
दरअसल निकाय चुनाव से एक बात साफ है, मुस्लिमों की कोशिश रहती है कि वह उस उम्मीदवार को वोट दें जो बीजेपी को हराने में सक्षम हो। वैसे तो सूबे में उसकी पहली पसंद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस रहती थी। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ। उसे लगा कि बीएसपी उम्मीदवार की दावेदारी मजबूत है। साफ है कि मुस्लिम वोटरों की सोच यही रही होगी कि वे बीएसपी के परंपरागत वोटर दलितों के साथ मिलकर बीजेपी को रोक सकते हैं। मेरठ और अलीगढ़ में यह फॉर्मूला सफल भी रहा। जो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है।

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