मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट के खिलाफ उठ रही है आवाज

केदारनाथ में पुनर्निर्माण कार्य के तहत पीएम के ड्रीम प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को प्रारम्भ किया जा चुका है। इसके लिए वहां केदारनाथ विकास प्राधिकरण की स्थापना की जा रही है। जबकि तीर्थ पुरोहित केदारनाथ विकास प्राधिकरण के गठन की सरकारी पहल को अनुचित बता रहे हैं। इसके अलावा केदारनाथ को रोप-वे से जोडऩे की सरकारी योजना से कांडी, पालकी और खच्चर वाले भी खासे परेशान दिखाई दे रहे हैं। इस मामले को लेकर वह भी सरकार खिलाफ लामबंद होने लगे हैं। बड़ा सवाल यह है कि ऐसी स्थिति में प्रधानमंत्री का यह ड्रीम प्रोजेक्ट किस प्रकार से परवान चढ़ पायेगा।
उत्तराखंड स्थित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट केदारनाथ पुनर्निर्माण के कार्यों का तीर्थ पुरोहित विरोध कर रहे हैं। लेकिन सरकार फिलहाल पीछे हटती नजर नहीं आती। पिछले माह 20 अक्टूबर को प्रधानमंत्री ने केदारनाथ में पांच योजनाओं का शिलान्यास किया था। इसके तहत आदि गुरु शंकराचार्य की समाधिस्थल का पुनर्निर्माण और संग्रहालय, गौरीकुंड से केदारनाथ पैदल मार्ग का चौड़ीकरण, मंदाकिनी के तट पर बाढ़ सुरक्षा एवं घाट निर्माण, सरस्वती नदी के तट पर बाढ़ सुरक्षा एवं घाट निर्माण और केदारनाथ में तीर्थ पुरोहितों के लिए आवास का निर्माण किया जाना है। इतना ही नहीं इन तमाम निर्माण कार्यों पर प्रधानमंत्री स्वयं नजर रख रहे हैं। इसलिए प्रदेश सरकार इस मामले में किसी तरह की ढील नहीं छोडऩा चाहती। निगरानी के लिए ड्रोन की खरीद के साथ ही गौरीकुंड से केदारनाथ के बीच प्रमुख पड़ावों पर सीसीटीवी कैमरे लगाने का कार्य शुरू हो चुका है।
फिलहाल गढ़वाल मंडल विकास निगम के अतिथि गृह के एक कमरे में कार्यालय संचालित होगा। सरकार के हवाले से मालूम हुआ है कि संबंधित विभाग योजना की डिटेल प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं। उम्मीद है कि शीघ्र ही केदारनाथ में नए निर्माण शुरू कर दिए जाएंगे।
दूसरी ओर तीर्थ पुरोहित केदारनाथ विकास प्राधिकरण के गठन का विरोध कर रहे हैं। केदार सभा के अध्यक्ष विनोद शुक्ला ने का कहना है कि तीर्थ पुरोहितों की मांग है कि जब तक केदारनाथ आपदा से पहले जैसी स्थिति में नहीं आ जाता तब तक केडीए का गठन न किया जाए। उन्होंने कहा कि सरकार तीर्थ पुरोहितों की भावनाओं के खिलाफ कार्य कर रही। है। तीर्थ पुरोहित समाज प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक अपना विरोध भी जता चुका है, इसके बावजूद यदि सरकार केडीए की स्थापना करती है तो यह दुर्भाग्यपूर्ण है। तीर्थ पुरोहित समाज अपना विरोध जारी रखेगा।
फिलहाल हर तरह के विरोध को नजर अंदाज करते हुए राज्य सरकार ने मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट मिशन केदारनाथ पर काम शुरू कर दिया है। सरकार ने प्रमुख पड़ाव गौरीकुंड से केदारनाथ के बीच रोपवे निर्माण के लिए सर्वे कार्य भी पूरा कर लिया है। बताया जाता है कि इस रोपवे के निर्माण के बाद केदारनाथ और गौरीकुंड के बीच की दूरी घटकर नौ किलोमीटर रह जाएगी। इससे यात्रा न केवल सुगम हो जाएगी, बल्कि यात्रा के खर्चे में भी कमी आएगी। पैदल यात्रा में आमतौर पर छह से सात घंटे लगते हैं, जबकि रोपवे से यह दूरी मात्र तीस मिनट में तय की जा सकेगी।
समुद्रतल से 11300 फीट की ऊंचाई पर स्थित केदारनाथ धाम तक पहुंचना वर्तमान में किसी चुनौती से कम नहीं है। यात्रा के प्रमुख पड़ाव गौरीकुंड से केदारनाथ की दूरी 16 किलोमीटर है। हालांकि केदारनाथ के लिए हेली सेवाओं की सुविधा है, लेकिन आम यात्री के लिए ये काफी महंगी साबित होती हैं। इसके तहत प्रति यात्री किराया करीब आठ हजार रुपये है।
वहीं, घोड़े से जाने पर किराया दो हजार और पालकी से पांच हजार रुपये पड़ता है। ऐसे में लंबे समय से केदारनाथ को रोपवे से जोडऩे की कवायद की जा रही थी, लेकिन यह परवान नहीं चढ़ पाई। पूर्व में सरकार रोपवे का निर्माण पीपीपी मोड में करना चाहती थी, मगर कंपनियों ने रुचि नहीं दिखाई। इस पर सरकार ने स्वयं ही यह जिम्मेदारी उठाने का निर्णय लिया। अब रोपवे निर्माण उत्तराखंड सरकार का उपक्रम ब्रिज रोपवे, टनल एंड अदर इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलेपमेंट कारपोरेशन को सौंपा गया है।
रुद्रप्रयाग के डीएम मंगेश घिल्डियाल ने बताया कि ढाई अरब रुपये की इस परियोजना का सर्वेक्षण कार्य पूरा कर लिया गया है। इसकी रिपोर्ट शासन को भेजी जा रही है। शासन से रिपोर्ट केंद्र को भेजी जाएगी और मंजूरी मिलते ही कार्य शुरू कर दिया जाएगा। अब देखना यह है कि रोपवे निर्माण के पश्चात इस मार्ग पर यात्रियों की यात्रा को सुगम बनाने का दावा करने वाली उत्तराखंड सरकार वर्षों से खच्चर, पालकी और कांडी से यात्रियों को केदारनाथ पहुंचाने वाले स्थानीय व्यवसायियों के लिए कौन सा रास्ता निकालती है जिससे उनका रोजगार प्रभावित न हो।

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