महंगी बिजली, जनता और घाटे का गणित

ह्यवे कौन से कारण हैं जिसके कारण राज्य विद्युत नियामक आयोग को बिजली दरों में भारी वृद्धि करनी पड़ी? लगातार बढ़ रहे विद्युत घाटे को पूरा करने का क्या यही एकमात्र रास्ता है? क्या पावर कारपोरेशन अपनी लापरवाही और कार्यशैली पर पर्दा डालने के लिए इस तरह का फैसला ले रहा है? क्या बिजली बिलों की वसूली में विफलता का ठीकरा जनता पर फोडऩा उचित है?

राज्य विद्युत नियामक आयोग ने प्रदेश में बिजली की दरें बेतहाशा बढ़ा दी हैं। सबसे तगड़ा झटका ग्रामीण उपभोक्ताओं को लगा है। ग्रामीण क्षेत्र की घरेलू बिजली दरों में 63फीसदी, शहरी क्षेत्र में 8.49, कॅमर्शियल में 9.89 और कार्यालयों की दरों में 13.46 फीसदी की वृद्धि हुई है। वहीं निजी नलकूप का फिक्स चार्ज 100 से बढ़ाकर 150 रुपये कर दिया गया है। सवाल यह है कि आखिर वे कौन से कारण हैं जिसके कारण राज्य विद्युत नियामक आयोग को बिजली दरों में भारी वृद्धि करनी पड़ी? लगातार बढ़ रहे विद्युत घाटे को पूरा करने का क्या यही एकमात्र रास्ता है? क्या पावर कारपोरेशन अपनी लापरवाही और कार्यशैली पर पर्दा डालने के लिए इस तरह का फैसला ले रहा है? क्या बिजली बिलों की वसूली में विफलता का ठीकरा जनता पर फोडऩा उचित है? महंगाई से जूझ रही जनता को एक और झटका देने से क्या स्थितियां बदल जाएंगी? दरअसल, पावर कारपोरेशन करीब 75 हजार करोड़ के घाटे से जूझ रहा है। उसे बाहर से महंगे दामों में बिजली खरीदनी पड़ रही है। हालांकि इसके बावजूद कारपोरेशन मांग के मुताबिक विद्युत आपूर्ति नहीं कर पा रहा है। घाटे की सबसे बड़ी वजह खुद पावर कारपोरेशन की कार्यशैली है। बिजली बिलों के बकाए की वसूली में कारपोरेशन पूरी तरह फिसड्डी साबित हुआ है। यही नहीं विभाग को बिजली चोरों से निपटने में आज तक सफलता नहीं मिल सकी है। वह विद्युत चोरों के खिलाफ कभी-कभी अभियान चलाकर बस खानापूर्ति करता है। इसके अलावा घाटे का एक अन्य कारण लाइन लॉस भी है। कारपोरेशन इस समस्या से निपटने में अभी तक सक्षम नहीं हो पाया है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में केबिल डालने की कार्रवाई की जा रही है। लेकिन यह काम जब तक पूरा नहीं हो जाता है लाइन लॉस को कम करना मुमकिन नहीं है। अब कारपोरेशन अपने घाटे को पूरा करने के लिए बिजली दरों को बढ़ाकर अपने घाटे की भरपाई करना चाह रहा है। यह फैसला करे कोई, भरे कोई वाली कहावत को चरितार्थ करती है। इसके अलावा जिस तरह से घरेलू दरों को बढ़ाया गया है वह भी चिंता का कारण है। इस दायरे में उद्योगों को नहीं रखा गया है यानी जहां विद्युत की खपत सबसे ज्यादा है, उनको दायरे से बाहर कर दिया गया है। कुल मिलाकर घाटे को पूरा करने की सारी जिम्मेदारी आम जनता पर डाल दी गई है। महंगाई के बोझ से कराह रही जनता के लिए यह बड़े झटके से कम नहीं है। यदि विद्युत नियामक आयोग हकीकत में घाटे को पूरा करना चाहता है तो उसे अपनी कार्यशैली बदलनी होगी। कारपोरेशन को विद्युत चोरी और लाइन लॉस को कंट्रोल करना होगा। केवल बिजली दरों में वृद्धि करना इसका स्थायी हल नहीं है। हां, यह असंतोष को जरूर जन्म देगी।

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