पाकिस्तान में गहराता संकट

पाकिस्तान का लोकतांत्रिक प्रतिष्ठान पुन: धार्मिक समूहों और सेना के निर्देश पर चलने को मजबूर है। यह परिदृश्य सरकार द्वारा किसी भी प्रकार के संकट से निबटने में असक्षमता प्रदर्शित करता है और शासन चलाने की खुद की वैधता के सामने भी चुनौती खड़ी करता है।
यह असमंजस की स्थिति की शुरुआत चुनावी कानून में संशोधन के बाद हुई। चुनाव अधिनियम 2017 के जरिये, चुनाव के दौरान उम्मीदवार द्वारा शपथ पत्र भरने के संबंध में एक संशोधन हुआ, जो कि उम्मीदवार की पैगंबर मोहम्मद की अंतिमता में विश्वास को लेकर था और यह गैरमुस्लिम उम्मीदवारों के लिए नहीं था। इस संशोधन को लेकर प्रदर्शन भी हुए। संसदीय नेताओं ने यह निर्णय लिया कि शपथ पत्र के मूल स्वरूप को अपरिवर्तनीय रखा जाये। यद्यपि धार्मिक समूहों ने यह माना कि इस लिपिकीय स्तर की गलती से इस्लाम को नीचा दिखाने का प्रयास किया गया है और उन्होंने कानून मंत्री जाहिद हामिद को हटाने की मांग की।
धार्मिक दलों जैसे तहरीके-लब्बैक या रसूल अल्लाह, तहरीक-ए-खत्म-इ-नब्बुवत और सुन्नी तहरीक पाकिस्तान से जुड़े प्रदर्शनकारियों ने फैजाबाद शहर को 20 दिन से कब्जे में ले रखा है। इसके कारण रावलपिंडी और इस्लामाबाद जैसे बड़े शहरों की हालत खराब हो गयी है। सरकार इन प्रदर्शनकारियों को यहां से हटाने में असफल रही है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इन दोनों शहरों को इस तरह अपंग कर देना नागरिक स्वतंत्रता के लिए बड़ी चुनौती है। सरकार को तुरंत इन्हें हटाना चाहिए। सरकार बल का प्रयोग करने से हिचक रही है, क्योंकि उन्हें लगता है कि इस कदम से 2007 के लाल मस्जिद घटना का दोहराव हो सकता है, जिस कारण जनरल मुशर्रफ को सत्ता छोडऩी पड़ी थी। सरकार ने धार्मिक लिपिकीय वर्ग, शोधकर्ताओं, नेताओं और प्रदर्शनकारियों से बातचीत की, लेकिन असफल रही क्योंकि, आंदोलनकारी अपने हिसाब से ऐक्शन लेने की मांग कर रहे हैं।
इस्लामाबाद हाइकोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि सरकार को कड़ा कदम उठाना चाहिए, जिससे इस पर नियंत्रण पाया जा सके। आदेश की पूर्ति न कर पाने की स्थिति में मंत्री एहसान इकबाल को चेतावनी दी कि उनके खिलाफ कोर्ट की अवमानना का केस चल सकता है।
इस स्थिति पर काबू पाने की डेडलाइन 25 नवंबर थी, इसके बाद बड़ी संख्या में सुरक्षा बालों ने घेराबंदी की और आंसू गैस एवं रबड़ की गोलियों का प्रयोग किया और फैजाबाद वार जोन में तब्दील हो गया। इस कदम के बाद 26 और 27 नवंबर को पूरे देश में हिंसक घटनाएं हुईं। इसके कारण 6 लोगों की मौत हो गयी और दर्जनों घायल हो गये, जिसमें सुरक्षाकर्मी भी शामिल थे। इसके बाद सेना ने बल प्रयोग के लिए मना कर दिया और राजनीतिक समझौते की बात कही।
सरकार पर प्रदर्शकारियों से समझौता करने का दबाव बनने लगा और इस आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार प्रदर्शनकारियों की मांग मानने के लिए विवश थी और इसमें सेना ने एक मध्यस्थ की भूमिका निभायी। सरकार कानून मंत्री जाहिद हामिद को बर्खास्त करने की बात पर राजी हुई। सरकार 30 दिन के भीतर राजा जफरुल के नेतृत्व में रिपोर्ट सार्वजनिक करने की बात पर भी राजी हुई और गिरफ्तार आंदोलनकारियों को छोडऩे पर भी राजी हुई। सरकार पाठ्य पुस्तक बोर्ड में परिवर्तन के लिए बने पैनल में तहरीके-लब्बैक के दो प्रतिनिधियों को शामिल करने पर भी सहमत हुई। इस समझौते के लिए खास प्रयास करने के लिए सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा का आभार भी प्रकट किया गया।
राजनीतिक विरोधी खेमे ने इस पूरे प्रकरण में आग में घी डालने जैसा काम किया और वर्तमान सरकार की देशभर में आलोचना हुई, इस घटना का असर 2018 के राष्ट्रीय चुनावों पर देखा जा रहा है। पाकिस्तानी सेना इस मामले में लोकतांत्रिक राजनीतिक प्रतिष्ठान को बचाती हुई नजर आती है, जिस पर न्यायपालिका ने सवाल उठाये हैं। इस वर्तमान घटनाक्रम ने अतिवादी धार्मिक समूहों के राजनीतिक पक्ष को पनपने और मजबूत करने में अच्छी-खासी भूमिका अदा की है, जिससे पाकिस्तान में उदारवादी माहौल को खतरा पैदा होने लगा है।
राजनीतिक विपक्ष ने भी इसमें खराब भूमिका निभायी और तुच्छ राजनीतिक कारणों के चलते इस राजनीतिक संकट को भडक़ाया। विपक्ष यह भूल गया कि पीएमएल-एन को हटाने के चक्कर में वह बड़ी समस्या को ला रहा है। नागरिक सरकार एक शुतुरमुर्ग की तरह सभी पर इस संकट का आरोप लगा रही है और भारत पर भी इसका आरोप लगा रही है। नेतृत्व और दूरदर्शिता के अभाव ने पाकिस्तान की राजनीति को कमजोर किया है, जो कि पूरे दक्षिण एशियाई क्षेत्र की शांति और सुरक्षा के लिए खतरा है।

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