शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के लिए प्रबंधन का सहयोग जरूरी

सुबह-सुबह बच्चे अपनी अपनी नाक पोंछते हुए धकियाते, मुकियाते पंक्ति में खड़े हो रहे हैं। साथ में लगभग चिल्लाती, डांटती मैडम उन बच्चों के साथ खड़ी हैं। प्रार्थना संपन्न होती है। कुछ आदर्श वाचन होते हैं। अब बारी आती है अभिभावकों के लिए कि आधार कार्ड अब तक नहीं दिए जल्द जमा करा दें। बच्चों को समय पर स्कूल साफ सुथरे रूप में भेजें आदि। और अंत राष्ट्रगान से होता है।
कहानी अब शुरू होती है। शिक्षक/शिक्षिका एक-एक कर बच्चों के नाम उपस्थिति रजिस्टर पर दर्ज करती जाती हैं। बीचबीच में कॉपी फाडऩे, चिकोटी काटने, मारने, गाली देने जैसी आम शिकायतों का निपटारा भी करती हैं। अब बारी है स्कूल के एक कमरे में लगे चेहरादर्ज मशीन के आगे सभी बच्चों को खड़ा करने और उपस्थिति दर्ज कराने की। इस प्रक्रिया में शिक्षक को करीब 45 मिनट लग जाते हैं।
इसके बाद पुस्तक निकालने और बच्चों को पढ़ाना शुरू करते ही बड़ी मैडम का बुलावा आ जाता है। मैडम बच्चों को पढ़ाना छोडक़र मैडम के पास हाजिरी देने पहुंचती हैं। मैडम टीचर से कहती हैं, सुनो एक अर्जेंट काम है। अभी के अभी एक लिस्ट चाहिए कि पिछले साल कितने बच्चों के पैसे उनके एकाउंट में गए। किनके पैसे वापस आ गए आदि। ये लिस्ट मुझे तुरंत चाहिए।
यह कहानी नहीं बल्कि कम से कम दिल्ली के एक प्राथमिक स्कूल का रोजनामचा है। इसमें समय इधर-उधर कर सकते हैं। कामों की सूची में आधार कार्ड को बैंक खाते में लिंक कराना, लडक़ा लड़कियां कितनी ऐसी हैं जो स्कूल नहीं जातीं आदि का सर्वे जैसे काम जोड़ सकते हैं। ऐसे तो कभी भी काम खत्म नहीं होंगे हां बच्चों का समय जरूर हम खत्म कर रहे हैं।
स्कूल को हमने आज तक पढऩे-पढ़ाने के तौर पर ही देखा है। लेकिन वह जमाना अब लद गया। स्कूल में शिक्षक पढ़ाते कम और अन्य काम ज्यादा किया करते हैं। हाल में प्रद्युम्न की मृत्यु ने समाज को झकझोर कर रख दिया। इस घटना ने नागर समाज के विद्रूप चेहरे को सामने किया। इस घटना ने टीचर के साथ ही स्कूल में काम करने वाले शिक्षक के साथ ही दूसरे कर्मचारियों के लिए मुश्किलें पैदा कीं। इसी का परिणाम है कि पूर्वी दिल्ली नगर निगम के शिक्षक शाम और रात में अपने स्कूल जा कर गार्ड के साथ सेल्फी लेकर अपने अधिकारी को फोटो भेजते हैं। स्कूल निरीक्षक उन तस्वीरों को आगे फारवर्ड करता है। शिक्षक, अधिकारी सब रात बिरात स्कूलों में निरीक्षण करते हैं कि स्कूल ठीक तो हैं।
स्वच्छता अभियान ने समाज को बदलने का एक कैम्पेन चलाया है। जिसमें गली गली, नगर नगर साफ हो। इससे किसी को भी कोई गुरेज नहीं हो सकता। स्कूल भी समाज का एक अंग है। शिक्षक तो स्कूल का हिस्सा हैं ही। इसलिए उन्हें जिम्मेदारी सौंपी गई। हाल ही में बिहार के भागलपुर और औरंगाबाद में शिक्षा विभाग ने आदेश जारी किए कि स्कूल आने से पूर्व और जाने के उपरांत अपने आस-पास यदि कोई खुले में शौच करता मिले तो उसकी तस्वीर खींच कर उन्हें भेंजें और उन्हें समझाने की कोशिश करें। पहली बात तो यह कि जिसकी तस्वीर खींची जाएगी वह क्या सहजता से चुपचाप बैठा रहेगा या फिर मारने दौड़ेगा। दूसरी बात शिक्षक मैदान मैदान घूम-घूम कर पता करे कि कौन खुले में शौच करता है। उस पर तुर्रा यह कि राज्य के शिक्षा मंत्री मानते हैं कि इसमें हर्ज ही क्या है। शिक्षक समाज पढ़ा लिखा है। जनगणना आदि काम तो करते ही हैं। इसे भी अंजाम दे सकते हैं।
यह सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। इसे शिक्षा और स्कूली पठन-पाठन में अनावश्यक राजनैतिक हस्तक्षेप के रूप में भी देखने और समझने की आवश्यकता है। यदि बच्चे ठीक से नहीं पढ़ पा रहे हैं तो इसके पीछे एक बड़ा कारण यह भी है। शिक्षकों को गैर शैक्षिक कामों में झोंका जाता है।
अफसोसनाक स्थिति यह है कि ऐसा केवल दिल्ली या बिहार या फिर मध्य प्रदेश में नहीं होता बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी प्राथमिक शिक्षा और स्कूल में होने वाली शिक्षकीय बरताव और पठन-पाठन की स्थिति यही है। जबकि जिन शिक्षकों से बातचीत की गई वे स्टूडेंट्स को पढ़ाना चाहते हैं। यहां तक कि वे तैयारी कर के भी आते हैं कि आज फलां विषय इस तरह से पढ़ाउंगा। लेकिन बीच में ही उन्हें कक्षा से बाहर बुला कर अन्य काम पकड़ा दिए जाते हैं। इसलिए यदि वास्तव में हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे पढ़ें और वास्तव में जीवन में कुछ सीखें तो इस आदर्श वाक्य को अमलीजामा पहनाने के लिए शिक्षकों को अवसर भी प्रदान करना होगा। इस गंभीर मुद्दे का हल निकालनेे में सरकार को भी तत्परता दिखानी होगी।

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