संस्थाओं की खींचतान से नुकसान

संविधान दिवस के मौके पर आयोजित कार्यक्रम में कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के बीच बातचीत में कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों को लेकर जो तकरार नजर आई, उस पर टिप्पणी करना मैं उचित नहीं समझता। मैं बस इतना ही कहूंगा कि न्यायपालिका और विधानपालिका जैसे लोकतंत्र के प्रमुख अंगों के बीच खींचतान बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। वह खींचतान चाहे जिस किसी मामले को लेकर हो। दरअसल, एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप से तभी बचा जा सकता है, जब हम न सिर्फ अपने अधिकारों को समझें और उनका पालन करें, बल्कि दूसरे के अधिकारों को भी समझें और उनका सम्मान करें।
यही न्याय के तंत्र का तकाजा भी है और लोकतंत्र की जरूरत भी है। जैसा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि विधानपालिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका, ये तीनों एक ही परिवार का हिस्सा हैं, इसलिए हर एक को अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ते हुए दूसरे के अधिकारों का भी ख्याल रखना होगा। प्रधानमंत्री की यह बात सही है।
अब अगर बात संवैधानिक अधिकारों की करें, तो मैं संविधान का एक विद्यार्थी होने के नाते यह कह सकता हूं कि संविधान ही सर्वोपरि है और संविधान से ऊपर केवल देश की जनता है, जिसके हितों की या जिसके मौलिक अधिकारों की अनदेखी किसी को भी किसी भी हाल में नहीं करनी चाहिए। संवैधानिक अंगों के आपसी खींचतान और असंवैधानिक निर्णयों या आदेशों से सबसे ज्यादा नुकसान जनता का होता है और उसके मौलिक अधिकारों का हनन होता है।
किसी भी लोकतंत्र के लिए उसका संविधान और उसमें दर्ज प्रावधानों-अधिकारों की बेहद महत्ता होती है, जिसका सम्मान और पालन करना हमारा कर्तव्य होना चाहिए। संविधान में विधानपालिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका, इन तीनों के अधिकार क्षेत्र स्पष्टतया परिभाषित और परिसीमित हैं।
इसलिए यह जरूरी है कि ये तीनों अपने-अपने अधिकार क्षेत्र के अंदर रहकर ही अपने दायित्वों का निर्वाह करें और इससे भी ज्यादा जरूरी है कि कोई किसी के अधिकार क्षेत्र में दखल न दे। इनमें से कोई भी अगर अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन करता है या दूसरे के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करता है, तो ऐसा करना असंवैधानिक है। चाहे विधानपालिका हो, चाहे न्यायपालिका हो या फिर कार्यपालिका हो, हमारा संविधान जिस काम के लिए उन्हें अधिकार नहीं देता, उसे करना संविधान के विरुद्ध माना जायेगा। यह बात भी ध्यान रहे, असंवैधानिक निर्णयों या आदेशों को मानने के लिए कोई भी बाध्य नहीं है।
विधानपालिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका हमारे लोकतंत्र के तीन प्रमुख अंग हैं। इनमें से कोई भी अगर अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर या दूसरे पर किसी तरह का दबाव बनाने का काम करेगा, तो यह लोकतंत्र के लिए न सिर्फ घातक होगा, बल्कि इससे लोकतंत्र की सफलता भी संदिग्ध हो जायेगी। यह बेहद दुखद है कि ऐसी स्थिति देश में कभी-कभी उत्पन्न होती रही है। दरअसल, खींचतान की वजह ही यही है कि कोई न कोई अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जा रहा है। ऐसी स्थिति में लोकतंत्र का सुचारू रूप से चलना और न्यायतंत्र का मजबूत होना एक संदेह के घेरे में आ जायेगा। अगर न्यायपालिका कोई ऐसा आदेश पारित करती है, जो असंवैधानिक हो और संसदीय सरकार इसे नहीं मानती, तो भी यह भयावह स्थिति होगी। क्योंकि, एक तरफ तो विधायिका किसी भी असंवैधानिक आदेश को मानने के लिए बाध्य नहीं है। वहीं दूसरी तरफ, अगर सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों को नहीं माना जायेगा, तो इससे अराजकता की स्थिति पैदा होगी। इसलिए जरूरी है कि तीनों अंग अपने अधिकारों की सीमा समझें, ताकि संविधान की गरिमा को कोई चोट न पहुंचने पाये।
बीते कुछ समय से देखा गया है कि कार्यपालिका किसी मामले को लेकर न्यायपालिका पर दबाव बनाती रही है, तो वहीं न्यायपालिका भी तमाम लंबित मामलों को निबटाने की जगह कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप करती रही है। यहां सवाल उठता है कि ये दोनों ही अगर असंवैधानिक काम करने लगें, संवैधानिक शक्तियां अपने पास लेने का प्रयास करने लगें, तो फिर न्याय के लिए क्या संवैधानिक विकल्प रह जाते हैं। न्यायपालिका के निर्णयों का संशोधन हर हाल में सरकार को ही करना पड़ता है। मैं समझता हूं कि यह भयावह स्थिति होगी और इससे देश में अराजकता को पांव फैलाने का न्योता मिलेगा।
सरकार और न्यायपालिका की खींचतान से न्यायतंत्र के प्रति लोगों का भरोसा उठता है क्योंकि, जनता के पास सबसे आखिरी हथियार न्यायतंत्र ही है। इसलिए मौजूदा सरकार और न्यायपालिका से हम यह उम्मीद करते हैं कि ये दोनों कम-से-कम जनता के भरोसे को हर हाल में बनाये रखें। जनता का भरोसा टूटने से उसमें अपने मौलिक अधिकारों के हनन का डर बढऩे लगता है, जिससे लोकतंत्र तो कमजोर होता ही है, लोकतांत्रिक संस्थाएं भी संदेह के घेरे में आ जाती हैं।

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