प्रदूषण, बच्चे और सरकार की चुनौती

सवाल यह है कि क्या प्रदूषण से प्रभावित हो रहे लोगों की सेहत को सुरक्षित रखने के लिए सरकार कोई कदम उठाएगी? क्या प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनायी गई संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभा पा रही हैं? क्या केवल आदेश और निर्देशों से प्रदूषण को दूर किया जा सकता है?

सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट की ताजा रिपोर्ट ने सरकार के सामने चुनौती पेश कर दी है। इस रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण के चलते देश की राजधानी दिल्ली के हर तीसरे बच्चे का फेफड़ा खराब हो चुका है। वे बीमार होते जा रहे हैं। रिपोर्ट भले ही दिल्ली के बच्चों पर केंद्रित हो लेकिन वायु प्रदूषण की चपेट में पूरा देश है। जाहिर है करोड़ों बच्चों की सेहत पर खतरा मंडरा रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक प्रदूषण के कारण तीन करोड़ से अधिक देशवासी अस्थमा के शिकार हो चुके हैं। सवाल यह है कि क्या प्रदूषण से प्रभावित हो रहे लोगों की सेहत को सुरक्षित रखने के लिए सरकार कोई कदम उठाएगी? क्या प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए बनायी गई संस्थाएं अपनी जिम्मेदारी ईमानदारी से नहीं निभा पा रही हैं? क्या केवल आदेश और निर्देशों से प्रदूषण को दूर किया जा सकता है? आखिर कब सरकार इसको रोकने के लिए ठोस कदम उठाएगी और इसके कारणों को पहचान कर उस पर नियंत्रण लगाएगी? क्या बच्चों की सेहत से खिलवाड़ करने दिया जा सकता है? दरअसल, असंतुलित विकास ने प्रदूषण की समस्या को गहरा कर दिया है। सरकार और कार्यदायी संस्थाएं विकास कार्यों के दौरान प्रदूषण को हमेशा से दरकिनार करती रही हैं। यही वजह है कि प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। सडक़ों पर बढ़ते वाहन और कल-कारखाने वायु प्रदूषण को बढ़ाते जा रहे हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड भी प्रदूषण उगल रहे कल-कारखानों को नोटिस थमाने तक अपने को सीमित कर चुका है। यही हाल अन्य संस्थाओं का है। वहीं सरकार भी प्रदूषण को लेकर कोई ठोस पहल करती नहीं नजर आ रही है। इसका परिणाम यह है कि देश की हवा जहरीली हो चुकी है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ समेत कई जिलों की हालत बेहद खस्ता है। पिछले दिनों लखनऊ में वायु प्रदूषण ने लोगों का श्वांस लेना दूभर कर दिया था। इस पर सरकार ने कुछ फौरी कदम उठाए लेकिन वे भी खानापूर्ति साबित हुए। लिहाजा यहां भी बच्चों की सेहत पर खराब असर पड़ रहा है। प्रदूषण पर सरकार की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इससे निपटने के लिए तमाम कमेटियों की रिपोर्ट आज तक ठंडे बस्ते में पड़ी हैं। यही नहीं विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट पर भी सरकार ध्यान नहीं दे रही है। लिहाजा स्थितियां दिनोंदिन बिगड़ती जा रही है। यदि सरकार ने प्रदूषण को दूर करने के लिए कार्रवाई नहीं की तो हालात विस्फोटक हो सकते हैं।

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