माताओं, बहनों की महान विरासत को बदनाम करने की अनुमति किसी को नहीं

मंगल पांडेय ने तो शायद अपने जीवन में कभी कोठा या तवायफ शब्द भी नहीं सुना था। ब्रह्मर्षि भृगु की धरती के इस पवित्र ब्राह्मण सैनिक को मियां आमिर ने तवायफ के कोठे पर दिखा दिया। किसी ने कोई विरोध या टिप्पणी नहीं की। तब यह देश सुरक्षित था। दुनिया के सबसे बड़े योद्धा वीर पंडित बाजीराव को इसी संजय लीला ने महज एक आशिक बनाकर नचा दिया, किसी ने कोई प्रतिवाद नहीं किया। तब भी यह देश सुरक्षित था। मंगल पांडेय और बाजीराव का इतिहास भी उतना गहरा रसातल का नहीं है। बहुत नया है और सभी को मालूम है। भारत के इन दोनों वीर सपूतों को महज एक प्रेमी आशिक आवारा जैसा दिखाने वाले बॉलीवुड के किसी ज्ञानी को दिक्कत नहीं हुई न ही तब किसी को भारत में पैदा होने का दु:ख दिखा। ये भारत की सनातन परंपरा पर चाहे जितने चोट करें, करने दिया जाये तो भारत ठीक और जरा सा विरोध हुआ नहीं कि भारत रहने लायक नहीं रह जाता।
मैं तो कहता हूं कि जिसे भी भारत रहने लायक नहीं लग रहा हो वह कृपाकर भारत से बाहर चला जाये। जिसे भारतीय होने में शर्म आ रही हो वह भी तत्काल इस मुल्क को छोड़ दे। भारत सरकार को यह ऐलान कर देना चाहिए की जो देश में नहीं रहना चाहता उसे बाहर जरूर जाना चाहिए। बात केवल पद्मिनी जैसी एक फिल्म की नहीं है। बात यह है कि देश में रह कर देश की माताओं बहनों की महान विरासत को बदनाम करने की अनुमति तो यह देश नहीं ही देगा। तुम अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर केवल सनातन भारतीय तथ्यों और आस्थाओं से ही क्यों खेलना चाहते हो? जरा कभी किसी दूसरे सम्प्रदाय के किसी प्रतीक से भी छेड़छाड़ कर के देखते? मुंबई की फिल्मी दुनिया में ऐसी सैंकड़ों फिल्में हैं जो बन कर डिब्बों में बंद हैं।
सती प्रथा भारत में प्रतिबंधित है। सती (रोकथाम) अधिनियम, 1987 राजस्थान सरकार द्वारा 1987 में कानून बनाया। 1988 में भारत सरकार ने इसे संघीय कानून में शामिल किया। यह कानून सती प्रथा की रोकथाम के लिए बनाया गया जिसमें जीवित विधवाओं को जिन्दा जला दिया जाता था। इसके बावजूद इसका बढ़ाकर प्रचार किया जा रहा है। इससे एक्ट का उल्लंघन होने के साथ नई पीढ़ी पर इसका गलत असर पड़ सकता है।
सती प्रथा की समाप्ति के लिए कितने प्रयास हुए यह किसी से छिपा नहीं है। ये प्रयास ब्रिटिश काल में राजा राममोहन राय के प्रयासों से प्रभावित थे। ब्रिटिश सरकार ने सती प्रथा या विधवा स्त्री को जिन्दा जलाने की प्रथा को समाप्त करने का निर्णय लिया और इसे आपराधिक हत्या घोषित कर दिया। 1829 का सती प्रथा उन्मूलन कानून पहले बंगाल तक सीमित था लेकिन 1830 में उसे कुछ संशोधनों के साथ मद्रास व बम्बई प्रेसिडेंसियों में भी लागू कर दिया गया। आज भारत में सती प्रथा नहीं है और इसे प्रोत्साहित करने या दिखाने की भी अनुमति नहीं है। बड़ा सवाल यह भी है कि भारत के फिल्मकार आखिर ऐसी प्रथा को दिखाने के लिए इतने परेशान ही क्यों हैं।
पद्मावती के साथ ही अब और भी बहुत सी बातें तय हो जानी चाहिए। यह भी तय हो जाना चाहिए कि सेक्सी दुर्गा बना कर अभिव्यक्ति की आजादी चाहने वालों का क्या करना है। यह भी तय हो जाना चाहिए कि देश की संस्कृति और सनातनता से खिलवाड़ करने की छूट नहीं दी जा सकती। आमिर खान और शाहरुख खान को दीपिका की तो खूब चिंता है लेकिन करोड़ों लोगों की भावनाएं इनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं जिनको आहत किया गया है। रोहित रॉय ने एक ट्वीट किया, ‘पहली बार मैं इस बात को लेकर दुखी, निराश और क्रोधित हूं कि मुझे भारतीय होने पर दु:ख है। बी-टाउन के कई सितारों ने इस विवाद को दुखद और खुद को देश में असुरक्षित बताया।
इस बीच एक अच्छी सूचना है। ‘पद्मावती’ के रिलीज होने की डेट को लेकर जहां हर तरफ हंगामा चल रहा है। इस मामले पर गौतमबुद्ध नगर जिला अदालत में फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली व कलाकारों समेत 45 के खिलाफ डाली गई याचिका स्वीकार कर ली गई है। कोर्ट ने वादी के बयान दर्ज करने के लिए 15 दिसंबर की तिथि निश्चित की है। सूरजपुर स्थित जिला न्यायालय के अधिवक्ता लखन भाटी ने बताया कि अधिवक्ता पवन चैधरी ने पद्मावती फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली अभिनेत्री दीपिका पादूकोण और अभिनेता रणवीर सिंह व शाहिद कपूर समेत 45 लोगों के खिलाफ केस चलाने को याचिका दी थी। अदालत में याचिका पर सुनवाई हुई। अधिवक्ता लखन भाटी का कहना है कि अदालत ने याचिका स्वीकार कर वादी के बयान दर्ज कराने के लिए 15 दिसंबर की तिथि निश्चित की है।

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