हाथ से न छोड़ें विवेक की लगाम

विश्वनाथ सचदेव

उच्चतम न्यायालय ने कहा है- ‘सरकार दर्शकों की उग्रता पर काबू न कर पाने का तर्क नहीं दे सकती। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करना सरकार का कर्तव्य है।’ यह बात 28 साल पहले, 1989 में, एक फिल्म पर हुए विवाद के संदर्भ में कही गयी थी। तब तमिलनाडु सरकार ने एक तमिल फिल्म ‘ओरे ओरु ग्रामथिले’ के प्रदर्शन पर रोक लगा दी। फिल्म में जाति आधारित आरक्षण का विरोध किया गया था और राज्य को कुछ राजनीतिक गुटों ने हिंसा की धमकी दी थी। सरकार इस धमकी के आगे झुक गयी थी। तर्क दिया गया था कि राज्य में हिंसा फैलने का डर है और स्थिति संभालना मुश्किल हो सकता है। तब न्यायालय ने कहा था कि सरकार किसी विषय पर खुली बहस और अभिव्यक्ति पर प्रतिबंध नहीं लगा सकती, भले ही सरकार की नीतियों की कैसी भी आलोचना क्यों न हो।
‘पद्मावती’ फिल्म को लेकर उठाये गये विवाद में उक्त तमिल फिल्म के संदर्भ में न्यायालय का रुख बहुत कुछ कह देता है। विवादों के घेरे में फंसी ‘पद्मावती’ अभी सेंसर बोर्ड ने नहीं देखी है। उसने कोई निर्णय भी नहीं दिया है। फिर भी बिना फिल्म देखे ही राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों ने सिनेमाघरों में फिल्म के दिखाये जाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। यह सही है कि फिल्म को लेकर समाज के एक तबके में काफी रोष है; फिल्म से जुड़े लोगों की नाक और गला काटने की धमकियां दी जा रही हैं; सिनेमाघरों को चेतावनियां दी जा रही हैं; भावनाओं पर आघात की दुहाई दी जा रही है। लेकिन इन सब बातों को आधार बनाकर राजनीतिक दल और कुछ राज्यों की सरकारें जिस तरह की प्रतिक्रिया दे रही हैं, वह ज्यादा चिंताजनक बात है, क्योंकि जातीय अस्मिता के नाम पर असहिष्णुता का माहौल पैदा हो रहा है।
फिल्म निर्देशक को जितनी स्वतंत्रता है, उतनी ही स्वतंत्रता दर्शकों को भी अपनी प्रतिक्रिया देने की है। लेकिन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार असीमित नहीं है। विवेक की सीमाओं के भीतर ही इस अधिकार का उपयोग होना चाहिए। विवेक का तकाजा है कि हम दूसरों की भावनाओं का सम्मान करें और इसी विवेक की मांग यह भी है कि भावनाओं के नाम पर कोई अपने स्वार्थों की रोटियां न सेंकंे।
फिल्म ‘पद्मावती’ से जुड़े लोगों और कुछ पत्रकारों के सिवाय, जिन्हें फिल्म निर्माता ने अपनी फिल्म दिखानी चाही, किसी ने यह फिल्म अभी देखी नहीं है। जिन्होंने फिल्म देखी नहीं है, वह यह भी नहीं जानते की फिल्म इतिहास पर आधारित है या कवि की कल्पना पर।
पहले इस अफवाह पर फिल्म के निर्माण में बाधा डाली गयी थी कि इसमें महारानी पद्मिनी और खिलजी के प्रेम-प्रसंग को दिखाया गया है और अब शिकायत यह है कि एक राजपूत महारानी को नृत्य करते दिखाया जाना राजपूती परंपरा और स्वाभिमान के विरुद्ध है। अपने इतिहास, अपनी परंपराओं, आदि पर गर्व करना गलत बात नहीं है, लेकिन इतिहास और परंपरा के नाम पर विवेक की लगाम को अपने हाथ से छोड़ देना भी सही नहीं है।
इस विवाद के संदर्भ में आज देश में जो कुछ हो रहा है, वह हमारे वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए चिंता और चिंतन का विषय है। दरअसल, गड़बड़ी तभी होती है, जब हम दूसरे की भावनाओं की चिंता नहीं करते या कानून अपने हाथ में लेने को अपना अधिकार मान लेते हैं।
जहां तक फिल्म पद्मावती का सवाल है, सेंसर बोर्ड और आवश्यकता पर न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा की जानी चाहिए। उम्मीद की जानी चाहिए की अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाने का काम नहीं किया गया है। दूसरी तरफ, जो कुछ विरोध के नाम पर देश में हो रहा है, वह असंवैधानिक तो है ही, जनतांत्रिक मूल्यों का नकार भी है। जिस तरीके से कुछ राज्यों की सरकारों ने इस अनदेखी फिल्म पर प्रतिक्रियात्मक कार्रवाई की है, उसमें भी राजनीतिक स्वार्थों की रोटियां सेंकने की गंध आ रही है। जबकि अदालत ने धमकियों के आगे सरकार के झुकने को भयादोहन के सामने घुटने टेकना कहा था। जनतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मर्यादाओं की दृष्टि से इस तरह घुटने टेकना और घुटने टिकवाना, दोनों अपराध हैं।
सभ्य व सुसंस्कृत समाज में ऐसे अपराधों के लिए कोई जगह नहीं होनी चाहिए। रहा सवाल ‘खिलवाड़’ का, तो इतिहास और संवैधानिक अधिकार, दोनों के साथ खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। जनतांत्रिक मर्यादाओं और कानून के शासन का तकाजा है कि कुछ भी कहने और करने से पहले उसे विवेक के तराजू पर तौला जाये। हम सबका साझा अतीत है, साझा इतिहास है, साझी परंपराएं हैं।
इस साझी विरासत का सम्मान हम सबको मिलकर करना है। यह काम भावनाओं में बहकर नहीं, विवेक के आधार पर होना चाहिए। असहमतियों के विवाद धमकियों से नहीं, विचार-विमर्श से सुलझते हैं। यही न्यायोचित है। मानवोचित भी।

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