दिल्ली में किसान मुक्ति संसद

कुमार प्रशांत

राजधानी दिल्ली के संसद मार्ग पर किसानों की रैली दिनभर जमी रही और लगातार अपनी बात कहती रही। रैली इस अर्थ में नयी थी कि उसमें 184 किसान संगठनों ने शिरकत की थी। जैसी टूट राजनीति के मंच पर है, वैसी ही टूट किसानों के मंच पर भी है। हमारे सारे जन-आंदोलन आपस में भी और एक-दूसरे के साथ भी इस कदर टूटे हुए हैं कि न आवाज एक हो पाती है, न निशाना! टूट की यह त्रासदी उन सबको भीतर-भीतर एक किये देती है, जिनसे लडऩे का खम भरते हैं ये आंदोलन!
आज किसान दुखी है, क्योंकि हर तरह से, हर तरफ से उसे दुखी करने की कोशिशें जारी हैं। हर किसी के पास किसानों के नाम पर बहाने के लिए आंसू हैं, पर कोई अपनी आंखों का कोर भी भिगोना नहीं चाहता है। ऐसी त्रासदी में असंगठित किसानों का एकजुट होना और राजधानी पहुंचकर दस्तक देना ध्यान तो खींचता ही है। यह देखना भी हैरान कर रहा था कि रैली में चल-चलकर संसद मार्ग पर पहुंची महिलाओं की संख्या खासी थी, जो वहां किसान महिलाओं के रूप में आयी थीं। हम, जो किसानों का स्वतंत्र अस्तित्व कबूल करने को भी बमुश्किल तैयार होते हैं, महिला किसानों का यह स्वरूप, उनकी दृढ़ता व साहस भरी जागरूकता से हैरान-से थे।
हमारे देश में महिलाओं व बच्चों का कोई अस्तित्व नहीं मानता है। लेकिन, यहां मौजूद किसान महिलाएं ऐसी नहीं थीं। वे थीं- अपनी वेदना, दर्द और दमन सबको संभालती, पीती हुई अपनी बातें कहे जा रही थीं। किसान महिलाओं की संसद वहीं संसद मार्ग पर बैठी थी और उस संसद की अध्यक्ष मेधा पाटकर बार-बार भर आता अपना गला और बार-बार उमड़ आती अपनी आंखें बचाती-छुपाती हमें अहसास कराना चाह रही थीं कि ये बहनें नहीं हैं, किसान महिलाएं हैं, जो लड़ाई की सिपाही हैं। यहीं कहीं पीछे से नरेंद्र मोदी के कांग्रेस मुक्त भारत या नीतीश कुमार के संघ व शराब मुक्त भारत की पैरोडी भी याद आ रही थी। हमारा राजनीतिक प्रशिक्षण इस तरह हुआ है कि हम किसान को भी एक वर्ग मानकर, उसे उसके लाभ के सवाल पर संगठित कर लड़ाई में उतारना चाहते हैं। किसानों को लुभाने-भरमाने के लिए भाजपा ने कहा कि वह स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों को लागू करेगी और फसल की लागत की दोगुनी कीमत देगी। यह सीधा सौदा था, जिसकी व्यवहारिकता या शक्यता पर किसी ने विचार नहीं किया और भाजपा की झोली वोटों से भर गयी। तब भी ये ही नेता थे और ये ही किसान संगठन थे। भाजपा ने अपनी जीत पक्की कर ली, सरकार बना ली और फिर यह सच्चाई बयान कर दी कि उसने चुनाव के वक्त जो कुछ कहा वह सब जुमलेबाजी थी।
भाजपा से पिटने के बाद किसान नेताओं ने उन जुमलों को ही नारा बना लिया और कर्जमाफी, स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें तथा लाभकारी मूल्य की मांग खड़ी कर किसानों को अपने झंडे के नीचे जमा करने लगे। एक तरह की राजनीतिक होड़ शुरू हुई, जिसमें किसान कम, किसान नेता ज्यादा हावी हो गये। किसान नेता पार्टियों में टूटे हैं, वे वोटों का सौदा करते हैं, वे भी खुले या छुपे तौर पर नाम व नामा की होड़ में लगे हैं। राजस्थान के कोटा की एक सभा में एक किसान ने पूछा कि भाईजी, किसान है कहां यहां? यहां मैं हूं, जो भाजपा का किसान हूं; आप कांग्रेस के किसान हैं और वह बसपा का किसान है!
खेती-किसानी वह पेशा या नौकरी नहीं है कि जो हर साल हड़ताल करे और इस या उस पार्टी का दामन थामे, ताकि उसकी उपयोगिता का आकलन करने के लिए आयोग बैठे और किसान कमीशन भी बनाया जाये। यह हमारे अस्तित्व का आधार है। हम अपनी तमाम भौतिक सुविधाओं के बावजूद खेती पर निर्भर रहते हैं।
इसलिए ऐसा समाज बने, जो खेती-किसानी को केंद्र में रखता हो। किसान न तो ऐसी भूमिका ले पा रहे हैं, न ऐसी भूमिका के लिए उन्हें तैयार किया जा रहा है। इसलिए सारे किसान आंदोलन एक सीमित दायरे में अपने लाभ-हानि की बात करते हैं और मजदूर यूनियनों का चरित्र ओढ़ लेते हैं। व्यवस्था इन्हें उसी तरह लील जाती है,जिस तरह उसने सारा मजदूर आंदोलन लील लिया है।
किसान अपनी जमीन से उखड़ा हुआ और औद्योगिक इकाइयों की छाया में जीनेवाला मजदूर नहीं है। वह अपनी जमीन से जुड़ा और जमीन से जीवन रचनेवाला स्थायी समाज है। वही खेतिहर सभ्यता का आधार है। हम राजा को याचक बनाने की गलती कर रहे हैं, जो विफल भी होगी और सत्वहीन भी बनायेगी।

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