ठेंगे पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक, राजधानी के अस्पतालों में चल रहा सिजेरियन डिलीवरी का खेल

पैसा कमाने के चक्कर में निजी अस्पताल के चिकित्सक भी बिना जरूरत कर रहे ऑपरेशन
सरकारी अस्पताल भी नहीं पीछे, जच्चा-बच्चा की सेहत से हो रहा है खिलवाड़
60 से 90 फीसदी केसों में की जा रही है सिजेरियन डिलीवरी, कार्रवाई से कतरा रहा स्वास्थ्य विभाग

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क
लखनऊ। राजधानी के अस्पतालों में सिजेरियन डिलीवरी के विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मानकों की धज्जियां उड़ रही हैं। निजी अस्पतालों के डॉक्टर भी मोटी कमाई के चक्कर में 80 फीसदी तक सिजेरियन डिलीवरी कर रहे हैं। इस मामले में सरकारी के डॉक्टर भी पीछे नहीं हैं। राजधानी के सरकारी और प्राइवेट अस्पतालों से स्वास्थ्य विभाग को मिल रही रिपोट्र्स से इसका खुलासा हुआ है। चिकित्सकों के इस रवैए से जच्चा-बच्चा की सेहत पर खराब असर पड़ सकता है।
डब्ल्यूएचओ ने अस्पतालों में होने वाली सिजेरियन डिलीवरी के लिए मानक तय कर रखे हैं। जिसके अनुसार किसी भी अस्पताल में 10 से 15 फीसदी मरीजों की ही सिजेरियन डिलीवरी की जा सकती है। शेष को सामान्य डिलीवरी कराई जानी चाहिए। डब्ल्यूएचओ के इस मानक का सरकारी अस्पतालों से लेकर प्राइवेट के बड़े-बड़े चिकित्सा संस्थान उल्लंघन कर रहे हैं। भोलेभाले मरीजों को डराकर डॉक्टर सिजेरियन डिलीवरी कराकर अपनी जेबें भर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग को दी गई रिपोर्ट के मुताबिक आलमबाग के एक बड़े निजी चिकित्सालय में लगभग 85 प्रतिशत केसेज में सिजेरियन डिलीवरी की जा रही है। अस्पताल की अप्रैल 2016 से लेकर दिसंबर तक की रिपोर्ट यही बता रही है। जिन अस्पतालों की रिपोर्ट स्वास्थ्य विभाग को मिल रही है उनमें से ज्यादातर में सिजेरियन के आंकड़े 60 से 90 फीसदी तक के हैं। यही नहीं ज्यादातर अस्पताल ऐसे हैं जो स्वास्थ्य विभाग को रिपोर्ट ही नहीं भेजते हैं। लेकिन स्वास्थ्य विभाग मामले में अब तक कोई कार्रवाई नहीं कर सका है। केजीएमयू का क्वीन मेरी हॉस्पिटल भी इस मामले में कम नहीं है। यहां के डाक्टरों का कहना है कि प्लेसेंटा एक्रीटा के कारण सिजेरियन डिलीवरी का आंकड़ा बढ़ रहा है। पहली बार सिजेरियन से प्रसव होने के बाद दोबारा गर्भ धारण के बाद प्लेसेन्टा यूट्रस से चिपक जाता है। जिस वजह से रक्तस्त्राव अधिक होता है और सिजेरियन न करने पर महिला की मौत हो जाती है। उनकी जान बचाने के लिए सिजेरियन करना पड़ता है। वहीं सिजेरियन डिलीवरी कराने का सबसे बड़ा खेल प्राइवेट चिकित्सालयों में चलता है। सूत्रों के मुताबिक एक सिजेरियन में 35 से 80 हजार रुपए का खर्च आता है जबकि सामान्य में 10 से 15 हजार ही अस्पताल को मिलते है। सिजेरियन डिलीवरी कराना डॉक्टर के समय पर निर्भर है जबकि सामान्य में डॉक्टर को इंतजार करना पड़ता है। यह हाल तब है जबकि सिजेरियन डिलीवरी में बच्चे से लेकर मां तक को खतरा रहता है। लेकिन प्राइवेट डॉक्टर फैमिली मेंबर्स को कोई न कोई समस्या बताकर सिजेरियन के लिए राजी कर ही लेते हैं।

अस्पताल में एवरेज 45 से 50 परसेंट केसेज में सिजेरियन डिलीवरी कराई जाती है क्योंकि यह रेफरल सेंटर है और अधिकतर मरीज हालत बिगडऩे पर दूसरे अस्पतालों से यहां आते हैं। अस्पताल में किसी भी मरीज की बिना जरूरत सिजेरियन डिलीवरी नहीं कराई जाती। इससे बचाव के लिए हर एक सिजेरियन डिलीवरी का ऑडिट होता है। बिना कारण सिजेरियन कराना संभव नहीं है।
प्रो. एसपी जैसवार, डिप्टी मेडिकल सुप्रीटेंडेंट, क्वीन मेरी अस्पताल

सरकारी अस्पतालों के अपै्रल 2016 से जनवरी 2017 तक के आंकड़े
अस्पताल कुल डिलीवरी सिजेरियन
बीएमसी एनके रोड 400 208
बीएमसी ऐशबाग 619 291
बीएमसी रेडक्रास 180 105
बीएमसी टुडिय़ागंज 320 78
बीएमसी सिल्वर जुबली 458 142
बीएमसी इंदिरा नगर 573 121
बीएमसी आलमबाग 511 122
आरएलबी 1169 393
लोकबंधु अस्पताल 2283 527

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