अयोध्या विवाद के हल में वक्फ एक्ट का पेंच लखनऊ में शिफ्ट नहीं की जा सकती मजिस्द

  • वक्फ संपत्ति न तो बेची जा सकती है, न ही की जा सकती है हस्तांतरित
  • सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही निकलेगा राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का हल

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। अयोध्या विवाद को हल करने की पहल एक बार फिर की जा रही है। पिछले दिनों शिया वक्फ बोर्ड ने इसे सुलझाने के लिए एक फॉर्मूला सबके सामने रखा। दूसरी ओर आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर ने भी दोनों पक्षों से बातचीत कर मामले को सुलझाने की कोशिश की। बावजूद इस मामले में ऐसा कानूनी पेंच है कि मुस्लिम पक्षकार एक बार विवादित स्थान पर राममंदिर के लिए रजामंद भी हो जाए, तब भी कोर्ट से बाहर समझौता नामुमकिन दिखाई पड़ रहा है।
सूत्रों के मुताबिक समझौते में वक्फ एक्ट का पेंच फंस रहा है। एक्ट के मुताबिक, 2013 के सेक्शन 29 में साफ है कि मस्जिद, कब्रिस्तान, खानकाह, इमामबाड़ा, दरगाह, ईदगाह, मकबरे को न तो बेचा जा सकता है, न किसी को हस्तांतरित किया जा सकता है। यही नहीं इसे न तो गिरवी रखा जा सकता है, न गिफ्ट में दिया जा सकता है। एक्ट के मुताबिक इनके स्वरूप को भी बदला नहीं जा सकता है। ये एक्ट सुन्नी और शिया वक्फ बोर्ड दोनों के मामलों में लागू होते हैं। यदि इसके विपरीत कोई काम करता है तो उसे अवैध माना जाएगा। लिहाजा मुस्लिम पक्षकार चाहकर भी समझौता नहीं कर सकते हैं क्योंकि उन्हें इसका कोई अधिकार नहीं हैं। गौरतलब है कि राम मंदिर विवाद पिछले कई वर्षों से चल रहा है। बाबरी मस्जिद की पैरवी सुन्नी वक्फ बोर्ड कर रहा है। इस तरह यह प्रॉपर्टी सुन्नी वक्फ बोर्ड की है। हालांकि 1940 में शिया वक्फ बोर्ड ने दावा किया था कि ये मस्जिद शिया समुदाय की है और उन्हें सौंपी जाए। हाईकोर्ट में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने मजबूत दावा पेश करते हुए पैरवी की। लिहाजा 1946 में कोर्ट ने शिया बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया था। सुन्नी पक्ष ने तर्क दिया था कि मौजूदा समय में मस्जिद का मुतवल्ली और इमाम सुन्नी हैं और रमजान के महीने में इस मस्जिद में तरावी भी होती है। सुन्नी पक्ष के इस तर्क पर कोर्ट ने शिया बोर्ड के दावे को खारिज करते हुए सुन्नी बोर्ड के पक्ष में फैसला दिया था। बाबरी मस्जिद में 1949 में मूर्ति रखी गई तो अयोध्या के मुसलमानों ने मुकदमा दायर कर दिया। इसके बाद 1961 में सुन्नी वक्फ बोर्ड ने इस मुकदमे को ले लिया। तब से इस मुकदमे की पैरवी सुन्नी वक्फ बोर्ड कर रहा है। बाबरी मस्जिद ही नहीं बल्कि वक्फ बोर्ड की किसी भी प्रापर्टी का मुतवल्ली सिर्फ रखवाला होता है मालिक नहीं। लिहाजा मुस्लिम पक्षकार चाहकर भी समझौता नहीं कर सकते हैं।

शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड का फॉर्मूला

अयोध्या में राम मंदिर विवाद को सुलझाने के लिए शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ने दोनों पक्षों के बीच समझौते का पांच सूत्रीय फॉर्मूला पेश किया है। फॉर्मूले के तहत अयोध्या में राम मंदिर और लखनऊ में मस्जिद बनाने की बात कही गई है। इस प्रपोजल पर कई महंतों ने सहमति भी जताई है। 5 दिसंबर को इस मामले की सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होगी। वसीम रिजवी ने कहा कि हम आपसी सहमति से हल निकालना चाहते हैं। इस मामले में लड़ाई-झगड़ा नहीं चाहते हैं। अयोध्या में राम मंदिर बने जबकि लखनऊ के हुसैनाबाद में मस्जिद-ए-अमन के नाम से मस्जिद बनाएंगे। इसका प्रस्ताव तैयार किया जा रहा है। हमने कभी भी कोई वकील कोर्ट में खड़ा नहीं किया तो शिया वक्फ बोर्ड की तरफ से किसने वकील खड़ा किया। इसकी जांच होनी चाहिये।

अयोध्या में मंदिर विवाद का हल केवल अदालत से ही निकल सकता है। अब तक बातचीत की जितनी भी कोशिशें हुईं सभी नाकाम रहीं। जब तक तीनों पक्षकार बातचीत में शामिल नहीं होंगे तब तक इसका कोई अर्थ नहीं है। जहां तक शिया वक्फ बोर्ड के अयोध्या विवाद पर शांतिपूर्ण मसौदे की बात है तो वह इस मामले में पक्षकार तक नहीं है ऐसे में उसके सुझाए फार्मूले का कोई मतलब नहीं है। मामले में अदालत का जो निर्णय होगा वह सभी पक्षों को मान्य होगा।
-अहमद बुखारी
शाही इमाम, दिल्ली जामा मस्जिद

बाबरी मस्जिद को लखनऊ में शिफ्ट करने की बात करने वाले लोग बेबुनियाद बातें कर रहे हैं। वक्फ एक्ट के तहत मस्जिद, इमामबाड़ा, दरगाह, कब्रिस्तान की जमीन न तो बेची जा सकती है और न ही ट्रांसफर की जा सकती है।
-जफरयाब जीलानी, एडवोकेट
व संयोजक बाबरी एक्शन कमेटी

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