राहुल की चुनौतियां और मौके

नीरजा चौधरी

कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी का पार्टी अध्यक्ष बनना लगभग तय है। काफी अरसे से राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान संभालने की बात पार्टी कार्यकर्ता और नेता करते आ रहे थे, जिस पर अब विराम सा लग गया है।
हालांकि, अध्यक्ष पद के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद वोटिंग के जरिये ही अध्यक्ष चुने जाने की प्रक्रिया है, लेकिन यह तब होगा, जब राहुल के अलावा भी कोई और नामांकन दाखिल करेगा। ऐसे में राहुल का निर्विरोध चुना जाना तय ही समझिये। राहुल गांधी लोकसभा सांसद हैं। साल 2013 में कांग्रेस उपाध्यक्ष बनने के वक्त और उसके बाद से ही उनके अध्यक्ष बनने को लेकर राजनीतिक गलियारे में खूब कयास लगाये जाते रहे हैं।
राहुल गांधी अगर कांग्रेस अध्यक्ष बनते हैं, तो कांग्रेस में यह एक प्रकार का पीढ़ीगत बदलाव होगा। राहुल गांधी युवा हैं और उनका राजनीतिक कैरियर कोई बहुत लंबा नहीं है। ऐसे में पार्टी अध्यक्ष के रूप में उनके पास चुनौतियां तो होंगी ही, साथ ही कुछ नया करने और भारत की एक पुरानी पार्टी में नये लोगों को मौके देकर उसे नया बनाने की जिम्मेदारी भी होगी। अगर राहुल इसमें कामयाब रहे, तो यह राहुल के राजनीतिक कैरियर को एक नया आयाम दे सकता है। वे सोनिया की गैरमौजूदगी में नीति-निर्माण की बैठकों में शामिल होते रहे हैं और अपने महत्वपूर्ण मशविरे देते रहे हैं। उनका यह अनुभव भी उनके अध्यक्ष बनने में मदद करेगा।
हालांकि, साल 2014 के आम चुनाव में कांग्रेस को जब 44 सीटें मिलीं, तब कांग्रेस नेतृत्व को बड़ा झटका लगा था। तब कुछ लोगों का मानना था कि नेतृत्व में बदलाव जरूरी है, पार्टी की कमान राहुल के हाथों में सौंप दी जानी चाहिए। उसके बाद कई मौकों पर राहुल देश से बाहर चले गये, जिससे उनकी छवि में एक गैरजिम्मेदार नेता शामिल हो गया था। इसलिए उनके लिए यह समय बहुत चुनौतीपूर्ण है। लेकिन, कुछ महीनों से जिस तरह से राहुल गांधी सक्रिय हैं और भाजपा पर लगातार उसके ही तरीके से हमले कर रहे हैं, उससे उनकी राजनीतिक सक्रियता मजबूत नजर आती है और उनकी गैरजिम्मेदार छवि भी खत्म होती दिखती है, लेकिन इतना जरूर है कि कांग्रेस में जान फूंकने की राहुल की कोशिश एक ईमानदार कोशिश लगती है। यह ईमानदार कोशिश कांग्रेस को कहां पहुंचाती है, यही देखने वाली बात होगी।
राहुल गांधी को पार्टी अध्यक्ष बनाने की बात उस समय हुई है, जब गुजरात का चुनाव-प्रचार जोरों पर है। राहुल के लिए गुजरात चुनाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि वहां से पीएम मोदी आते हैं। इस वक्त गुजरात में अंदरखाने काफी बुदबुदाहट चल रही है, जिसमें ज्यादातर स्वर भाजपा के खिलाफ दिख रहे हैं। ढेर सारे सवाल भी उठ रहे हैं। लेकिन, इन सवालों को अब राहुल गांधी किस तरह से वोट में बदलेंगे या गुजराती मतदाताओं को कैसे यह उम्मीद दिलायेेंगे कि वे पिछली सरकारों से बेहतर सरकार देंगे, एक बड़ी चुनौती है। गुजरात में कांग्रेस के पास कोई बड़ा जनाधार नहीं है, जो एक जमाने में हुआ करता था।
गुजरात में कांग्रेस संगठन स्तर पर भी कमजोर है। इसलिए उनके अध्यक्ष बनाये जाने के इस वाकये के बीच यह चुनौती बहुत मायने रखती है, क्योंकि गुजराती मतदाओं की भले भाजपा के प्रति नाराजगी है, लेकिन नरेंद्र मोदी के प्रति नहीं है। राहुल की यही सबसे बड़ी चुनौती है कि वे कैसे पार्टी को संगठित करके मतदाताओं की भाजपा के प्रति नाराजगी को अपने पक्ष में करने में कामयाब होते हैं। इसी बात से, उनकी अध्यक्षीय पारी कितनी दमदार होगी, इसका आंकलन किया जा सकेगा। वहीं राहुल को जमीन पर मजबूत होना होगा।
कांग्रेस पार्टी जिस तरह के कमजोर नेतृत्व से गुजर रही है, उस ऐतबार से राहुल पर यह जिम्मेदारी बढ़ जायेगी कि वे नेतृत्व स्तर पर संगठन में नयी ऊर्जा का संचार करें, नौजवानों, महिलाओं, बूढ़ों को अपनी राजनीतिक क्षमता से न सिर्फ आकर्षित करें, बल्कि उनके वोटों को भी हासिल करें।
भारत सिर्फ लोकतंत्र ही नहीं, बल्कि चुनावी जनतंत्र भी है, इसलिए चुनावों में जनता को अपने पक्ष में मतदान के लिए खड़ा कर पाना ही नेतृत्व की सफलता है। इसके लिए जरूरी है कि जो भी चेहरे राहुल के सामने आयें, उनको दरकिनार किये बिना उन पर राय-मशविरा कर एक सामूहिक रणनीति बनायें, ताकि कार्यकर्ताओं का विश्वास मजबूत हो सके। पार्टी में निश्चित रूप से राहुल गांधी का अगर जमीनी स्तर पर नेतृत्व उभरता है, तो इससे भाजपा के सामने मुश्किलें खड़ी होंगी और विपक्ष मजबूत होगा। यह किस प्रकार होगा, इसको तो आने वाला समय ही बतायेगा।

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