भैया मेरे मैं नहीं माखन खायौ

शहर को जगमगाने की जिम्मेदारी पहाड़ की तरह अपनी उंगली पर उठाए फिर रहे इंजीनियर साहब को इन दिनों खोजी पत्रकार बेतहाशा खोज रहे हैं। साहब के हैरतअंगेज कारनामों को एलईडी के प्रकाश में खोजा जा रहा है। तमाम पोथी-पत्रा खंगालने के बाद भी साहब के कारनामों का न आदि मिल रहा है न अंत। मुखिया जी भी आंखें फाड़े टुकुर-टुकुर देख रहे हैं। साहब की पूंछ उनकी पकड़ में भी नहीं आ रही है। एक भक्त ने बताया कि साहब के नाम के कारण लोग कन्फ्यूजन में है और उनको लगता है कि साहब को माखन मिश्री गटकने की आदत है। सो माखन खाने की खबर प्रकाशित करने का मैका कैसे छोड़ दें। सो माखन की हाड़ी का पता कुछ खबरनवीस लगाने में जुट गए हैं। तब से वे साहब के पीछे हाथ धोकर पड़ गए हैं। हालत यह है कि जैसे ही कोई मीडिया वाला इनसे माखन के बारे में पूछता है तो साहब पहले इधर-उधर देखते हैं फिर कहते हैं भैया मेरे मैं नहीं माखन खायौ।
बाबा का पूरा भौकाल है। जब से वे चलासन की मुद्रा में आए हैं किसी को सांस लेने का मौका नहीं दे रहे हैं। हर दो मिनट बाद एक आदेश जारी कर देते हैं। भले आदेश का पालन हो या नहीं। सब कुर्सी की महिमा है जी। जो भी इस पर बैठता है उसके अनुसार वह अपना रूप रंग बदल लेती है। बाबा को देखते ही कुर्सी ने उनका तेवर समझ लिया। सो खट से भगवा हो गई है। बाबाजी ने कुर्सी पर बैठते ही अपराधियों के खात्मे की प्रतिज्ञा की है। लेकिन मामला बिगड़ता ही जा रहा है। बाबा के आदेश का इन पर कोई असर नहीं दिख रहा है। अपराधी अपने कर्तव्य पथ पर सक्रिय है। बेचारी पुलिस बीच में फंसी है। करे क्या। बाबा का आदेश नहीं पूरा होगा तो उनकी कुर्सी खतरे में हैं।

डॉक्टर साहब की बांछे खिलीं

राजधानी में कई डॉक्टर साहब लोगों के दोनों हाथों में लड्डू वाला माहौल है। शहर में एक बड़ा प्राइवेट अस्पताल क्या खुला सरकारी डॉक्टर साहब लोगों की बांछे खिल गई हैं। कुछ मोटी कमाई के चक्कर में गुणा-गणित लगाकर घुस गए हैं तो कई घुसने की फिराक में लगे हुए हैं। वे घुस चुके साहब की परिक्रमा कर खुश करने का उपाय कर रहे हैं। पता चला है कि इससे सरकारी अस्पताल प्रशासन के अफसरों के पैरों तले जमीन खिसक गई है। उन्होंने सभी के पीछे जासूस लगा दिए हैं ताकि मामले को बिगडऩे से पहले संभाला जा सके।

जिसकी लाठी उसकी भैंस

प्रदेश चुनावी रंग में रंग गया है। सभी कुछ न कुछ बनने के लिए जनता के सामने तरह-तरह के करतब दिखा रहे हैं। वादों की चाशनी से लुभा रहे हैं। बात बन गई तो ठीक नहीं बनी तो फिर देखेंगे। वहीं चुनाव के रंगारंग कार्यक्रम करवाने की जिम्मेदारी संभाल रहे बड़े साहब पूरी तरह मुस्तैद हैं। ये साहब कमल दल वालों पर मेहरबान हैं। अरे भाई मेहरबान क्यों न हो। सरकार उनकी है। लाठी उनकी है तो भैंस भी उनकी होगी। सो इस दुलरुआ बच्चे के इशारे पर साहब दूसरे बच्चों का खेल बिगाडऩे पर लगे हुए है। बेचारे जहां भी खेलने की तैयारी करते हैं साहब डंडा लेकर पहुंच जाते हैं। साहब को देखते ही बेचारे अपना पंजा, हाथी और साइकिल उठा कर भाग खड़े होते हैं।

आगे-आगे देखिए होता है क्या
ऊपर से इशारा मिलते ही अपने यातायात वाले साहब सक्रिय हो गए हैं। पूरे लाव-लश्कर के साथ सडक़ पर मार्च कर रहे हैं। इनकी टीम के लोग शिकार देखते ही दबोच लेते हैं। सवार जब तक गाड़ी में टंगा हेलमेट साहब लोगों को दिखाए उससे पहले उसको चालान थमा दिया जाता है। सीट बेल्ट न लगाने वाले सवारों पर भी पैनी नजर रखी जा रही है। साथ ही हिदायत भी दी जा रही है कि अगर अगली बार वाहन के पीछे बैठने वाला भी बिना हेलमेट दिखा तो उसकी खैर नहीं। सुना है टै्रफिक वाले नए अभियान से गदगद हैं। चलो धौंस दिखाने और मलाई काटने का एक और सुनहरा मौका मिल गया है। लेकिन इन साहब लोगों को कौन समझाए। जाम भरी सडक़ों पर वाहन रेंगते हैं। इनका कोई उपाय करिए। अभी चालक से हेलमेट लगवा नहीं पा रहे हैं चले हैं पीछे की सवारी को हेलमेट पहनाने। खैर आगे-आगे देखिए होता है क्या।

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