अपराधियों के शिकार होते बच्चे और पुलिस की संवेदनहीनता सवाल यह है कि आखिर कोर्ट को बच्चों के लापता होने के मामलों पर सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ा? क्या पुलिस बच्चों को अपराधियों से बचाने की जिम्मेदारी नहीं निभा पा रही है? हर साल हजारों बच्चे कहां गुम हो जाते हैं और उनका पता क्यों नहीं चल पाता है? क्या पुलिस के ढुलमुल रवैये से मानव तस्करों के हौसले बुलंद हैं? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक लडक़ी के अपहरण मामले में यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने न केवल आईजी कानून व्यवस्था को संबंधित थाने में तीन दिन कैंप करने का निर्देश दिया बल्कि अपहरण के शिकायत की विवेचना रिपोर्ट भी तलब की है। न्यायमूर्ति विपिन सिन्हा व जेजे मुनीर की खंडपीठ ने यह आदेश पीडि़ता की याचिका पर दिए। सवाल यह है कि आखिर कोर्ट को बच्चों के लापता होने के मामलों पर सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ा? क्या पुलिस बच्चों को अपराधियों से बचाने की जिम्मेदारी नहीं निभा पा रही है? हर साल हजारों बच्चे कहां गुम हो जाते हैं और उनका पता क्यों नहीं चल पाता है? क्या पुलिस के ढुलमुल रवैये से मानव तस्करों के हौसले बुलंद हैं? क्या लापता बच्चों के मामलों में पुलिस पूरी तरह संवेदनहीन हो चुकी है? भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों में हर वर्ष इजाफा हो रहा है। बच्चों के लापता होने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक प्रति वर्ष 30,000 से ज्यादा बच्चों का पता नहीं चल पाता है। पिछले कुछ वर्षों में लापता बच्चों का प्रतिशत 58 फीसदी तक पहुंच चुका है। झारखंड और असम जैसे पूर्वोत्तर के कई राज्यों से लड़कियों का अपहरण कर बेचा जा रहा है। यूपी में भी हर साल लापता बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। साफ है ये गतिविधियां संगठित गिरोहों द्वारा संचालित की जा रही हैं। बच्चों को गायब कर उनको बेचने का धंधा देश और विदेश तक फैल चुका है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी लापता बच्चों के अवैध व्यापार की पुष्टिï कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल करीब पचास हजार बच्चे गायब होते हैं। इनमें अस्सी फीसदी लापता बच्चों का पता नहीं लग पाता है। यह स्थिति तब है जब मानव तस्करी रोकने के लिए कड़े कानून हैं। ऐसा क्यों है? दरअसल, अधिकांश मामलों में पुलिस कोई सक्रियता नहीं दिखाती है। यही नहीं थानों में पीडि़त की शिकायत तक दर्ज नहीं की जाती है। पीडि़तों को एक थाने से दूसरे थाने तक दौड़ाया जाता है। इस मामले में पुलिस पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का भी कोई असर नहीं पड़ता नजर आ रहा है। पुलिस की इसी कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुलिस बड़े लोगों के बच्चे खोजने में पूरी मुस्तैदी दिखाती है जबकि गरीबों के बच्चों के लापता होने की एफआईआर तक नहीं दर्ज करती है। सरकार यदि बच्चों को अपराधियों से बचाना चाहती है तो उसे पुलिसतंत्र को सक्रिय करना होगा। साथ ही ऐसा न करने वालों पुलिसवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी करनी होगी।

सवाल यह है कि आखिर कोर्ट को बच्चों के लापता होने के मामलों पर सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ा? क्या पुलिस बच्चों को अपराधियों से बचाने की जिम्मेदारी नहीं निभा पा रही है? हर साल हजारों बच्चे कहां गुम हो जाते हैं और उनका पता क्यों नहीं चल पाता है? क्या पुलिस के ढुलमुल रवैये से मानव तस्करों के हौसले बुलंद हैं?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक लडक़ी के अपहरण मामले में यूपी पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाया है। कोर्ट ने न केवल आईजी कानून व्यवस्था को संबंधित थाने में तीन दिन कैंप करने का निर्देश दिया बल्कि अपहरण के शिकायत की विवेचना रिपोर्ट भी तलब की है। न्यायमूर्ति विपिन सिन्हा व जेजे मुनीर की खंडपीठ ने यह आदेश पीडि़ता की याचिका पर दिए। सवाल यह है कि आखिर कोर्ट को बच्चों के लापता होने के मामलों पर सख्त रुख क्यों अपनाना पड़ा? क्या पुलिस बच्चों को अपराधियों से बचाने की जिम्मेदारी नहीं निभा पा रही है? हर साल हजारों बच्चे कहां गुम हो जाते हैं और उनका पता क्यों नहीं चल पाता है? क्या पुलिस के ढुलमुल रवैये से मानव तस्करों के हौसले बुलंद हैं? क्या लापता बच्चों के मामलों में पुलिस पूरी तरह संवेदनहीन हो चुकी है? भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों में हर वर्ष इजाफा हो रहा है। बच्चों के लापता होने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के मुताबिक प्रति वर्ष 30,000 से ज्यादा बच्चों का पता नहीं चल पाता है। पिछले कुछ वर्षों में लापता बच्चों का प्रतिशत 58 फीसदी तक पहुंच चुका है। झारखंड और असम जैसे पूर्वोत्तर के कई राज्यों से लड़कियों का अपहरण कर बेचा जा रहा है। यूपी में भी हर साल लापता बच्चों की संख्या बढ़ती जा रही है। साफ है ये गतिविधियां संगठित गिरोहों द्वारा संचालित की जा रही हैं। बच्चों को गायब कर उनको बेचने का धंधा देश और विदेश तक फैल चुका है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग भी लापता बच्चों के अवैध व्यापार की पुष्टिï कर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल करीब पचास हजार बच्चे गायब होते हैं। इनमें अस्सी फीसदी लापता बच्चों का पता नहीं लग पाता है। यह स्थिति तब है जब मानव तस्करी रोकने के लिए कड़े कानून हैं। ऐसा क्यों है? दरअसल, अधिकांश मामलों में पुलिस कोई सक्रियता नहीं दिखाती है। यही नहीं थानों में पीडि़त की शिकायत तक दर्ज नहीं की जाती है। पीडि़तों को एक थाने से दूसरे थाने तक दौड़ाया जाता है। इस मामले में पुलिस पर सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों का भी कोई असर नहीं पड़ता नजर आ रहा है। पुलिस की इसी कार्यप्रणाली पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि पुलिस बड़े लोगों के बच्चे खोजने में पूरी मुस्तैदी दिखाती है जबकि गरीबों के बच्चों के लापता होने की एफआईआर तक नहीं दर्ज करती है। सरकार यदि बच्चों को अपराधियों से बचाना चाहती है तो उसे पुलिसतंत्र को सक्रिय करना होगा। साथ ही ऐसा न करने वालों पुलिसवालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई भी करनी होगी।

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