कौन सुनेगा नवाबों की नगरी के चौराहों का दर्द

कहां हैं हुक्मरान 


मैं महानगर स्थित गोल मार्केट चौराहे पर लगा खूबसूरत सा फौव्वारा हूं। एक समय था जब मेरे आस-पास से गुजरने वाले लोग ठंडे पानी के फुहारों का आन्नद लेने के लिए रुक जाते थे। कई घंटों मुझे निहारते। देखते-देखते समय पंख लगाकर उड़ता रहा। वक्त का काला साया मेरे ऊपर भी मंडराने लगा। किसी को मेरी चिंता ही नहीं रही। न हुक्मरानों को मेरी दुर्दशा दिखाई पड़ती है न मेरी देखभाल करने वाले लोगों को मेरी परवाह है। वक्त के साथ लोग भी बदलते गए। देखरेख के अभाव में मेरी खूबसूरती खत्म हो गई है। मेरी दुर्दशा पर किसी को दया नहीं आती। हर आदमी मेरी मजबूरी का फायदा उठा रहा है। कई लोग मेरे सीने पर अपना आशियाना बना चुके हैं। शाम को लोग खाना बनाते हैं। खाना बनाने से निकलने वाला धुआं मेरा दम घोटता है। अब तो मेरी शरीर पर तमाम घाव हो चुके हैं। सुना है स्मार्ट सिटी बनाने की कवायद चल रही है लेकिन कोई मेरी सुध लेने को तैयार नहीं है। मेरे एक साथी चौक चौराहे की पीड़ा भी आपको बता दूं। सरकार ने चौक चौराहे को स्मार्ट सिटी के दायरे में रहकर बनाया है। देखने में काफी खूबसूरत है। लेकिन अभी पूरी तरह बना नहीं कि लोगों ने मुझे घाव देना शुरू कर दिया। अपना आशियाना बना लिया है। सरकार भी सुन नहीं रही है। क्या ऐसे ही स्मार्ट शहर बनेगा नवाबों का शहर लखनऊ। इन चौराहों का दर्द फोटो जर्नलिस्ट शुभम त्रिपाठी ने कैमरे की नजर से महसूस किया है।

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