जीवन के लिए जरूरी है वायु

वायु प्रदूषण अन्तरर्राष्ट्रीय चर्चा है। भारत की राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण की धुंध है। उत्तर भारत धुंध की चपेट में है। वायु सरकारी सीमाएं नहीं मानती। उसे विदेश यात्रा में वीजा की जरूरत नहीं। वायु सभी जीवों के प्राण हैं। वे वैदिक पूर्वजों के प्यारे देवता हैं। वे प्राणशक्ति के संचालक हैं लेकिन दिखाई नहीं पड़ते। वैदिक ऋषि वायु की प्रीति में सराबोर हैं। ऋग्वेद के ऋषि बताते हैं ‘इनकी ध्वनि सुनाई पड़ती है लेकिन रूप नहीं दिखाई पड़ता’ वायु की तीव्र गति आंधी है। आंधी का शोर सुनाई पड़ता है लेकिन वायु का रूप नहीं। वायु हरेक प्राणी का प्राण हैं लेकिन देवों का प्राण भी वायु ही है ‘आत्मा देवानां।’ बड़ी बात है देवों को भी मनुष्य जैसा बताना।
भारतीय अनुभूति में सृष्टि पांच महाभूतों (तत्वों) से बनी है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश ये पांच महाभूत हैं। इनमें ‘वायु’ को प्रत्यक्ष देव कहा गया है। वायु प्रत्यक्ष देव हैं और प्रत्यक्ष ब्रह्म भी। ऋग्वेद में स्तुति है ‘नमस्ते वायो, त्वमेव प्रत्यक्ष ब्रहमासि, त्वामेव प्रत्यक्षं ब्रह्म वदिष्यामि। तन्मामवतु – वायु को नमस्कार है, आप प्रत्यक्ष ब्रह्म है, मैं तुमको ही प्रत्यक्ष ब्रह्म कहूंगा। आप हमारी रक्षा करें।’ ऋग्वेद का यही मन्त्र यजुर्वेद, अथर्ववेद व तैत्तिरीय उपनिषद् में भी जस का तस आया है। कहते हैं, ‘वायु ही सभी भुवनों में प्रवेश करता हुआ हरेक रूप में प्रतिरूप होता है-वायुर्थेको भुवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपो वभूव:। सभी जीवों में प्राण की सत्ता है।’ प्राण वस्तुत: वायु है। मृत्यु के समय सभी तत्व अपने-अपने मूल में लौट जाते हैं।
वैदिक पूर्वज वायु को देवता जानते हैं, उसे बहुवचन ‘मरुद्गण’ कहते हैं। वे सम्पूर्ण विश्व के प्रति मधु दृष्टि रखते है। ऋग्वेद के एक मंत्र में वे वायु को भी मधुरस से भरा पूरा पाना चाहते हैं- मधुवाता ऋतायते। वृहदारण्यक उपनिषद् के सुन्दर मंत्र में पृथ्वी और अग्नि के प्रति मधुदृष्टि बताने के बाद वायु के लिए कहते हैं ‘अयं वायु: सर्वेर्षां भूतानां मध्वस्य – यह वायु सभी भूतों का मधु है और सभी भूत इस वायु के मधु है-वायो: सर्वाणि भूतानि मधु। सृष्टि निर्माण के सभी घटक एक दूसरे से अन्तर्सम्बंधित है। वे एक दूसरे के मधु हैं। उनके ढेर सारे नाम हैं, वे वायु हैं, प्राण हैं, वही मरूत् या वायु भी हैं।
वायु समतावादी हैं, धनी, दरिद्र सबको एक समान संरक्षण देते हैं। ऋग्वेद में वशिष्ठ के सूक्तों में इन्हें अति प्राचीन भी बताया गया है ‘हे मरूतो आपने हमारे पूर्वजों पर भी बड़ी कृपा थी’ वशिष्ठ की ही तरह ऋग्वेद के एक और ऋषि मैत्रवरूणि भी मरूद्गमों के प्रति अतिरिक्त जिज्ञासु है। कहते हैं, वे पर्वतों को भी अपनी शब्द ध्वनि से गुंजित करते हैं, राजभवन कांप जाते हैं और जब अंतरिक्ष के पृष्ठ भाग से गुजरते हैं उस समय वृक्ष डर जाते हैं और वनस्पतियां औषधियां तेज रफ्तार रथ पर बैठी महिलाओं की तरह भयग्रस्त हो जाती है। ’ तेज आंधी और पानी का ऐसा काव्य चित्रण अनूठा है।
प्रकृति में एक प्रीतिकर यज्ञ चल रहा है। वायु प्राण हैं, अन्न भी प्राण हैं। अन्न का प्राण वर्षा है। वायुदेव/मरूतगण वर्षा लाते हैं। ऋग्वेद में मरूतों की ढेर सारी स्तुतियां हैं। कहते हैं ‘आपके आगमन पर हम हर्षित होते हैं, स्तुतियां करते हैं।’ लेकिन कभी-कभी वायु नहीं चलती, उमस हो जाती है। प्रार्थना है ‘हे मरूतो आप दूरस्थ क्षेत्रो में न रूकें, द्युलोक अंतरिक्ष लोक से यहां आयें।’ ऋषि कहते हैं ’रसा, अनितमा कुभा सिंध आदि नदियां वायु वेग को न रोकें।’ वे ‘नदी के साथ पर्वतों से भी यही अपेक्षा करते हैं।’ भारतीय मनीषा ने वायु को समग्रता में देखा और प्रतीकों में गाया। बेशक भारतीय ग्रन्थों में काव्य का प्रवाह है लेकिन कौन इंकार करेगा कि वायु का प्रदूषण हजारों रोगों की जड़ है। प्राणवायु के लिए ही लोग सुबह-सुबह टहलने निकलते हैं। जहां वायु सघन है, वहां के जीवन में नृत्य है। जंगलों में वायु सघन है। इसीलिए वन उपवन मधुवन हैं। भारत का अधिकांश प्राचीन ज्ञान वनों/अरण्यों में ही पैदा हुआ था। वैदिक मंत्रों में प्राणवायु की सघनता है। हम सब वैदिक संस्कृति के उत्तराधिकारी हैं, बावजूद इसके हम वायु को प्रदूषित करते हैं। प्रकृति को आहत करते हैं।
वायु के अध्ययन और उपासना पर पूर्वजों ने बड़ा परिश्रम किया था। अध्ययन चिन्तन की भारतीय दृष्टि में वायु प्रकृति की शक्ति है। उन्होंने वायु का अध्ययन एक पदार्थ की तरह किया है। भारतीय दृष्टि में वे सृष्टि निर्माण के पांच महाभूतों से एक महाभूत हैं, उनका अध्ययन जरूरी है लेकिन दिव्य शक्ति की तरह उनको प्रणाम भी किया जाना चाहिए।

Pin It