युवाओं को मौका दें राजनीतिक दल

ऑस्ट्रिया के नये चांसलर सेबेस्टियन कुर्ज 31 साल के हैं। न्यूजीलैंड की नयी पीएम जैसिंडा अर्डर्न की उम्र 37 साल है। वह दुनिया की सबसे युवा महिला नेत्री हैं। टोनी ब्लेयर और डेविड कैमरन दोनों 43 की गरिमामय उम्र में पीएम बने। एमैनुअल मैक्रों 39 की उम्र में फ्रांस के राष्ट्रपति हैं। दुनिया में किसी राजनीतिक दल की औसत आयु सिर्फ 43 साल है-ऐसे में जिस तरह मतदाता खंडहर राजनीतिक दलों से ऊब रहे हैं, ये दल अपना अस्तित्व बनाये रखने के लिए लगातार नये खून को अपने साथ जोड़ रहे हैं और उन्हें आगे बढ़ा रहे हैं।
अब जरा भारत पर नजर डालिये, तो राजनीतिक दल अपनी बुजुर्गियत और वरिष्ठता की स्वामिभक्ति के साथ ठहरे से हैं। वर्ष 2014 में मौजूदा संसद में सिर्फ 12 सांसद 30 साल से कम उम्र के थे, इसके सिर्फ 53 फीसद सदस्य 55 साल से कम के थे, जबकि एक सांसद की औसत उम्र 50 साल से ऊपर (भाजपा में 54 और कांग्रेस में 57) थी।
एक तरफ हमारी आबादी (देश की औसत उम्र का मध्यांक 25 है) लगातार युवा होती जा रही है, दूसरी तरफ संसद बुढ़ाती जा रही है-पहली लोकसभा की औसत आयु 46.5 साल थी, जो दसवीं लोकसभा तक बढक़र 51।4 साल हो गयी। नेता सेवानिवृत्ति की उम्र पार कर जाने के बाद भी वानप्रस्थ का कोई इशारा दिये बिना सत्ता की डोर थामे होते हैं। इधर बाकी तब तक कुर्सी थामे रहते हैं, जब तक कि उनका उत्तराधिकारी इसके लिए तैयार ना हो जाये। लगता है कि राजनीतिक सशक्तीकरण बुजुर्गों का एकाधिकार है। लेकिन इसके अपवाद भी रहे हैं, कुछ युवा नेताओं को जिम्मेदारी के पद दिये गये। हालांकि, ये गिने-चुने मामले ही हैं, और ज्यादातर मामलों में ऐसा मुख्यत: राजनीतिक विरासत के चलते हुआ। मैं, खुद भी मुद्दतों से चली आ रही इस प्रथा का लाभार्थी हूं।
ऐसा भी नहीं कि राजनीति दल युवाओं को शामिल नहीं करते-ज्यादातर दलों की युवा और छात्र इकाइयां हैं, लेकिन इनकी राजनीति में तरक्की प्रत्यक्षत: सीमित है। कुछ दलों में अनौपचारिक रूप से 75 साल सेवानिवृत्ति की उम्र तय करना स्वागतयोग्य है, लेकिन फिर भी बहुत कुछ करने की जरूरत है।
संघर्षरत युवाओं को मजबूत बनाने के और भी रास्ते हैं। दक्षिण यूरोपीय देश सर्बिया कई वर्षों का एक 500 युवा राजनीतिक नेता प्रोग्राम चलाता है, जिसके तहत देश में लोकतंत्र के पुनरुद्धार के लिए युवा नेताओं की खोज करके युवा राजनीतिक नेतृत्व को प्रश्रय दिया जाता है।
यूरोपीय कमीशन, रॉकफेलर फंड और अन्य संस्थाओं से पैसा पानेवाले इस प्रोग्राम में अलग-अलग पृष्ठभूमि वाले युवाओं को राजनीतिक प्रशिक्षण मुहैया करा युवा नेताओं का नेटवर्क बनाया जाता है, जो पार्टी रुख से परे नीतिगत समाधान पेश कर सकें और सत्ता प्रतिष्ठान के दरवाजे आमजन के लिए खोल सकें। इस प्रोग्राम से युवा दलों में एकराय बनाने के साथ ही पार्टियों की नीतियों पर प्रभाव छोड़ सके।
यूएनडीपी ने 26 लाख डॉलर के फंड से एक राष्ट्रीय युवा नागरिक शिक्षा अभियान चलाया, जिसका मकसद नागरिक समझदारी व कौशल का विकास करना है और राजनीति में युवाओं के दखल को लेकर परंपरागत रवैये में बदलाव लाना है। केन्या में नेशनल डेमोक्रेटिक इंस्टीट्यूट (एनडीआइ) साल 2001 से एक युवा राजनीतिक नेतृत्व अकादमी को मदद करती है, जहां सभी दलों के युवा नेता अपने दलों में लागू की जानेवाली परियोजनाओं के साथ संधि वार्ता और जनसमर्थन विषय पर कौशल विकास प्रशिक्षण प्राप्त करते हैं।
यूनिसेफ ने कोसोवो में 2010 से 2013 के बीच इनोवेशंस लैब के लिए फंड दिया, जिसमें भावी नेताओं को मेंटर के साथ ही जरूरी सुविधाएं व सरकार में संस्थागत संपर्क मुहैया करवा कर सामाजिक रूप से प्रभाव छोडऩेवाले उनके आइडिया का चयन किया जाना और उनको लागू किया जाना था। यूएनडीपी ने युवा एशियाई नेताओं की नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए राष्ट्रीय और क्षेत्रीय वर्कशॉप के माध्यम से 2007 और 2009 के बीच एशियन यंग लीडर्स प्रोग्राम चलाया।
संस्थागत समर्थन से भी हमें काफी मदद मिल सकती है। बहुत से देश (उदाहरण के लिए मोरक्को, पाकिस्तान, केन्या, इक्वाडोर) ने अपनी विधायिका में युवा नेताओं के लिए अलग से सीटें सुरक्षित कर रखी हैं- आखिरकार समुदाय और जाति आधारित समूहों को आरक्षण दिया जा सकता है, तो युवाओं को क्यों नहीं दिया जा सकता? अन्य देशों (इक्वाडोर, एल साल्वाडोर, सेनेगल, युगांडा, बुरुंडी) ने सभी विधायिकाओं में उम्मीदवारी की उम्र घटाकर 18 साल कर दी है। बोस्निया में यदि चुनाव में किसी प्रत्याशी को बहुमत नहीं मिलता, तो वहां के चुनाव कानून के आर्टिकल 13.7 के तहत सबसे युवा उम्मीदवार को वह सीट दे दी जायेगी।
केंद्रीय अमेरिकी देश एल साल्वाडोर 18 साल की उम्र के करीब पहुंच रहे लोगों को जिम्मेदारी संभालने के लिए प्रोत्साहित करने को स्कूलों में सक्रिय रूप से अभियान चलाता है। केन्या ने एक राष्ट्रीय युवा नीति (2006) और राष्ट्रीय युवा अधिनियम (2009) बना रखा है।
इन दोनों का मकसद युवाओं को चुनावों में ज्यादा भागीदारी के लिए प्रोत्साहित करना है। साथ ही, हमारे राजनीतिक ढांचे को राजनीतिक सशक्तीकरण के लिए कई मौके मुहैया कराना चाहिए- स्थानीय निकाय और पंचायत चुनावों में उन नेताओं को मौका दिया जाना चाहिए, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया है; ऐसे नेताओं में कुछ अनुभव होने के बाद राज्य विधानसभा चुनाव लडऩा चाहिए और अंत में लोकसभा के लिए। आखिर स्वस्थ लोकतंत्रों में ऐसे ही तो नेता बनते हैं।
पार्टियों में आंतरिक लोकतंत्र में गिरावट, बढ़ता चुनावी खर्च और स्थानीय निकाय, पंचायत और मेयर चुनाव में आरक्षण ने युवा नेताओं के आगे बढऩे में रुकावटें डाल दी हैं। राजनीतिक दलों को गैर-राजनीतिक पृष्ठभूमि से आनेवाले उम्मीदवार युवाओं को कुछ पदों पर आरक्षण दिये जाने के साथ ही मुख्यधारा की राजनीति में प्रोफेशनल्स को शामिल करने के मुद्दे पर सक्रियता से विचार करना चाहिए।
युवा नेता विशाल युवा आबादी वाले भारत की जरूरतों और ख्वाहिशों को समझते हैं। दलों को ऐसे नेताओं को अपनी प्रतिभा के बल पर आगे बढऩे का मौका मुहैया कराना चाहिए।

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