निकाय चुनाव के जरिए लोकसभा चुनाव साधने में जुटी बसपा, भाजपा का रथ रोकने के लिए बना रही रणनीति

बसपा सुप्रीमो मायावती ने दिए संकेत, गठबंधन से नहीं परहेज, कांग्रेस से नजदीकी बढ़ाने की कोशिशें जारी
सिंबल पर पार्टी लड़ रही निकाय चुनाव, प्रत्याशियों को जिताने के लिए पदाधिकारी और वरिष्ठï नेताओं को दी जिम्मेदारी

4पीएम न्यूज़ नेटवर्क

लखनऊ। निकाय चुनाव में पूरे दमखम से उतरने की तैयारी कर रही बसपा की नजर आगामी लोकसभा चुनाव पर टिकी है। बसपा सुप्रीमो मायावती इसी को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना रही है। वे किसी भी कीमत पर भाजपा का रथ रोकना चाहती है। यही वजह है कि मायावती ने सार्वजनिक तौर पर अब गठबंधन से ऐतराज जताना बंद कर दिया है। उन्होंने संकेत दिए हैं कि यदि धर्मनिरपेक्ष ताकतें गठबंधन करना चाहती हैं तो उनकी पार्टी को कोई ऐतराज नहीं है। हालांकि यह गठबंधन बसपा को सम्मानजनक सीटें मिलने पर ही हो सकता है। गठबंधन को लेकर बसपा इन दिनों कांग्रेस से अपनी नजदीकियां भी तेजी से बढ़ा रही है। हालांकि अभी तक इसका कोई सार्थक परिणाम नहीं निकला है लेकिन निकट भविष्य में कांग्रेस और बसपा एक राह के राही बन जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होगा।
पिछली लोकसभा और यूपी विधानसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अब नगर निकाय चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सियासी चालें चलने लगी है। पार्टी ने अपने सिंबल पर प्रत्याशी उतारे हैं। टिकट बंटवारें में बसपा ने जाति और धर्म के समीकरण का भी पूरा ध्यान रखा है। मायावती खुद पूरे चुनाव पर नजर रख रही हैं। पदाधिकारियों व कार्यकर्ताओं की बैठक में बसपा सुप्रीमो ने कार्यकर्ताओं से आह्वान किया है कि वे नगर निकाय चुनाव में भाजपा को पटकनी देने के लिए जी-जान से जुट जाएं और पार्टी प्रत्याशियों को जिताएं। दरअसल, निकाय चुनाव को रिहर्सल मानकर रणनीति तैयार कर रही बसपा सुप्रीमो की नजर 2019 के चुनाव पर है। बसपा की हकीकत भी उन्हें मालूम है। पार्टी में इस समय वरिष्ठï और प्रभावशाली नेताओं की कमी है। इस बात को खुद मायावती ने स्वीकार किया है। पिछले दिनों हुई बैठक में उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पार्टी में नेतृत्व की कमी के कारण ही भाई आनंद को जिम्मेदारी सौपी गई। उन्होंने उम्मीद जताई कि आनंद अपनी जिम्मेदारियों पर खरे उतरेंगे। यह सफाई उन्होंने इसलिए दी क्योंकि आनंद को जिम्मेदारी सौंपे जाने के बाद बसपा पर परिवारवाद का आरोप लगने लगा था। इस दौरान उन्होंने यह भी कहा कि बसपा अंबेडकरवादी सोच की पार्टी है। यह कभी भी सपा व कांग्रेस की तरह परिवारवादी पार्टी नहीं बन सकती है। मायावती ने स्वीकार किया कि बसपा के मूवमेंट के लिए न झुकने तथा न बिकने वाले नेतृत्व की जरूरत है। अपने कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए बसपा पहली बार शहरी निकाय का चुनाव पार्टी सिंबल पर लड़ रही है। इस बार मेयर, पार्षद, नगर पालिका व नगर पंचायत के अध्यक्ष व सदस्यों के लिए पार्टी ने अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं। इस बार किसी पार्टी कार्यकर्ता को निर्दलीय के तौर पर यह चुनाव लडऩे की अनुमति नहीं दी गई है। पार्टी ने साफ कह दिया है कि पार्टी लाइन से इतर काम करने वाले कार्यकर्ताओं और नेताओं को बख्शा नहीं जाएगा। कुल मिलाकर निकाय चुनाव बसपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। पार्टी किसी भी सूरत में प्रदेश में अपने खोए जनाधार को पाना चाहती है। इसके लिए वह निकाय चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहती है। हालांकि कई कद्दावर नेताओं के पार्टी छोडऩे से बसपा को काफी नुकसान हुआ है। यही वजह है कि गठबंधन को लेकर बसपा प्रमुख के सुर अब बदलने लगे हैं।

निकाय चुनाव बसपा के लिए अस्तित्व की लड़ाई है। पार्टी किसी भी सूरत में प्रदेश में अपने खोए जनाधार को पाना चाहती है। इसके लिए वह निकाय चुनाव में कोई कोर कसर नहीं छोडऩा चाहती है।

…तो इसलिए कांग्रेस से नहीं बनी बात

बसपा सुप्रीमो मायावती ने गुजरात और हिमाचल में कांग्रेस से गठबंधन न करने का खुलासा करते हुए कहा कि गुजरात में कुल 182 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से कांग्रेस को हारी सीटों में से 25 सीटें बीएसपी को देने के लिए कहा गया, परन्तु कांग्रेस ने इसे स्वीकार नहीं किया। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश की कुल 68 सीटों में से कांग्रेस की हारी सीटों में 10 सीटें बीएसपी को देने के लिए कहा गया, लेकिन इस बारे में भी उन्होंने कोई रुचि नहीं ली।

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