आदतें कोई सुधारना नहीं चाहता साफ पर्यावरण सभी को चाहिए

साल 2016 में अंतरराष्ट्रय पर्यावरण दिवस पर एक अंग्रेजी वेबसाइट के लिए एक लेख लिखते हुए मुझे ध्यान आया कि एक देश और एक समाज के तौर पर पर्यावरण संरक्षण के लिए उठाये गये हमारे कदम कितने कारगर हैं और हम पर्यावरण संरक्षण के लिए कितने चिंतित हैं। यह एक मौका था, कुछ देर रुकने का, रुक कर देखने का और अपने द्वारा उठाये गए कदमों पर, एक तरह का आत्म विश्लेषण करने का, कि जिस हालत में हमारी आज की आबो-हवा है उसके लिए हम खुद कितने जिम्मेदार हैं।
आज रौशनी के त्यौहार दिवाली से पहले हमारे पास फिर एक मौका आया है इस बात पर चिंतन करने का। सुप्रीम कोर्ट ने 9 अक्टूबर के अपने एक फैसले में ये आदेश दिया कि दिल्ली-एनसीआर में पठाखों की बिक्री पर 1 नवम्बर 2017 तक रोक लगी रहेगी। अगर इस फैसले के तमाम क़ानूनी पहलुओं (कुछ लोग इसे सुप्रीम कोर्ट के अति उत्साहवाद और न्यायपालिका का कार्यपालिका के अधिकारों पर हमला मान रहे हैं) को अलग कर दें तो निम्न कुछ बातें साफ तौर पर नजर आती हैं-
पहली यह कि इसमें कोई दो राय नहीं कि दिल्ली शहर की हवा काफी खराब हो चुकी है और जैसे-जैसे सर्दियां बढ़ती जाती हैं, एक गहरी घनी धुएं की चादर दिल्ली के आसमान में छा जाती है, और धीरे धीरे हमारी सांस में आने लगती है।
दूसरा यह कि इस गहरी धुएं की चादर के पीछे कई कारण हैं। दिल्ली में चल रहे तमाम वाहन पहले ही काफी धुआं पैदा करते हैं पर साथ ही साथ दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश, हरियाणा के खेतों में किसानों द्वारा जलाई गई पराली से निकला धुंआ भी काफी ज्यादा असर करता है दिल्ली की आबो हवा पर। इसमें शहर के अंदर हो रहे निर्माण से निकलने वाली धूल भी शामिल होती है और साथ ही साथ दिवाली पर हुई आतिशबाजी से निकला धुआं पूरी समस्या को और भी गम्भीर बना देता है। इन सब कारणों से मिलकर एक ऐसी भयानक समस्या हमें घेरती है जिससे बचने के लिए तमाम दिल्ली वासी मुंह पर रुमाल लगाए घूमते रहते हैं।
कोर्ट के इस आदेश के प्रति भी अलग-अलग लोगों की भिन्न-भिन्न प्रतिक्रिया रही है। एक तरफ तो एक बड़ा हिस्सा इस फैसले का स्वागत करते हुए साफ सुथरी ग्रीन दिवाली मनाने की वकालत कर रहा है तो दूसरी तरफ एक हिस्सा इसे एक तुगलकी फरमान कहते हुए धर्म विशेष की आस्था पर चोट कह रहा है। पिछले कई दिनों से तमाम अलग अलग मीडिया मंचों पर इस फैसले पर दी गयी प्रतिक्रिया पर मैंने गौर किया और पाया की मीडिया का एक बड़ा धड़ा इस पूरी बहस को ही दिग्भ्रमित कर रहा है। ऐसे सवाल, ऐसे तर्क उठाये जा रहे हैं जिनका पर्यावरण और हमारे जीवन से कोई लेना देना ही नहीं।
हां ये सही है कि अचानक से आया ऐसा फैसला पटाखा विक्रेताओं को भारी नुकसान देगा पर साथ ही साथ ये भी तो देखना जरूरी है कि हमें कितने बड़ी समस्या का सामना करना है। भारत में पर्यावरण पर होने वाली तमाम बहस के साथ यही समस्या है कि हम सभी साफ सुथरा पर्यावरण तो चाहते हैं पर अपनी जरूरतों और अपनी आदतों से समझौता नहीं करना चाहते। मुझे याद आता है कि जब 2015 में एक युवा वकील के तौर पर राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) में चल रहे डीजल वाहन बैन मामले में पहली बार मेरा सामना पर्यावरण सम्बन्धी मामलों से हुआ तो मुझे अचरज हुआ कि कोई भी अपनी आदतों, अपनी जरूरतों से समझौता नहीं चाहता था पर साफ सुथरा पर्यावरण सभी को चाहिए था।
एक तय छमता से ज्यादा शक्ति वाले डीजल वाहनों का दिल्ली में प्रयोग रोकने वाला ये फैसला बाद में सुप्रीम कोर्ट द्वारा पलट दिया गया। गौर करने वाली बात ये है कि तमाम महंगी लक्जरी गाडिय़ां डीजल पर ही चलती हैं, पर समझौता करने को कोई तैयार नहीं। कई पत्रकार और मीडिया संस्थान बार-बार पटाखों पर लगे इस प्रतिबंध पर सवाल उठा रहे हैं कि कुछ दिन के प्रतिबंध से क्या होगा ?, बस दिवाली पर ही आतिशबाजी होती है ? कारों और कारखानों को कब बंद करेंगे? ऐसे ही तमाम गलत और गुमराह करने वाले सवाल उठाये जा रहे हैं मीडिया में और ऐसी ही पत्रकारिता के चलते आम जनता भी गुमराह हो कर सोशल मीडिया पर भी अपने गुस्से को जाहिर कर रहे हैं।
माना कि कुछ दिन के प्रतिबंध से शायद दिल्ली की हवा पर खास असर नहीं पड़े, शायद दूसरे मौकों पर दिवाली से ज्यादा आतिशबाजी होती हो, शायद पटाखों से ज्यादा प्रदूषण दूसरे कारणों से होता हो पर हमारे द्वारा उठाये गए ये सवाल पर्यावरण को साफ बनाये रखने की हमारी नीयत के बारे में क्या बताते हैं ? क्या हम खुद एक साफ सुथरे पर्यावरण में रहना चाहते हैं ? क्या हम निजी स्वार्थ को त्याग कर अपनी पुरानी आदतों से समझौता कर अच्छी आदतों को अपनाना चाहते हैं?
स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत करते समय हमारे प्रधानमंत्री ने एक कहा था, ‘अगर भारत की 100 करोड़ जनता ये तय कर ले की गंदगी नहीं करनी तो कोई ताकत हमें रोक नहीं सकती।’
आज दीपों के इस त्यौहार पर हमें फिर से एक ऐसा ही प्रण लेने की जरूरत है, निजी स्वार्थ, पूर्वाग्रह इत्यादि से ऊपर उठकर एक संकल्प, एक निर्णय लें कि अपनी ही धरा, अपने ही वातावरण को साफ़ सुदंर और स्वस्थ बनायेंगे। प्रकाश के इस पर्व को मनाने का दूसरा कोई बेहतर तरीका नहीं हो सकता।

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