कहीं दीप जले कहीं दिल…

विरोधियों को चौंकाने और उन पर हमला करने का कोई मौका महात्मा जी नहीं चूकते। महात्मा जी ने दिया क्या जलाया लोगों के दिल जल गए। राम-राम जपना पराया माल अपना, कहकर महात्मा जी को चिढ़ाने वाले भी राम के जन्मस्थान पर दिया जलने से बेचैन हैं। राम की नगरी में दिया जलने से कमल वाले खुश हैं कि अयोध्या सुर्खियों में है और इसका राजनीतिकरण किया जा सकता है। लेकिन विरोधियों के साथ कुछ कमल वालों के दिल भी इसलिए जल रहे हैं कि महात्मा जी यह काम कर रहे हैं। जो लोग महात्मा जी को लंगड़ी मार कर गिराना चाह रहे थे वे महात्मा जी के दांव से चित दिखाई दे रहे हैं। महात्मा जी का उपयोग अब केरल और गुजरात में किया जा रहा है।
लोगों की सेहत का जिम्मा संभाल रहे बड़े साहब की नाक में मातहतों ने दम कर दिया है। वे मातहतों को लाइन पर लाने के लिए तमाम जतन कर रहे हैं लेकिन मातहत है कि हर बार गच्चा दे जाते हैं। ये मातहत लोगों की नब्ज देखने और इलाज करने की जगह पूरी मौज काट रहे हैं। उन पर साहब का कोई खौफ नहीं दिख रहा है। हालत यह है कि साहब जैसे ही किसी चिकित्सा केंद्र पहुंचते है अधिकांश डॉक्टर नदारद दिखते हैं। बेचारे साहब केवल वेतन काटने का निर्देश देकर लौट आते हैं। अब साहब को कौन समझाए कि मोटी कमाई कर रहे लोगों के एक दिन का वेतन काटने से कुछ नहीं होने वाला है। मातहत साहब की इस चकरघिन्नी को देखकर मंद-मंद मुस्कुरा रहे हैं। अब पता चलेगा साहिबी क्या होती है?

पुडिय़ा छोड़ डिब्बा संभाल रहे साहब
शहर को चमकाने का जिम्मा संभाल रहे पुडिय़ा वाले साहब इन दिनों काफी गदगद है। हो क्यों न त्यौहार का मौका है जी। उपहार लेने-देने का जमाना है। एक हाथ लो और दूसरे हाथ दो। यह बात अपने पुडिय़ा वाले साहब भी समझते हैं और उनके करीबी और करीबी होने के चक्कर में पड़े लोग भी बखूबी समझते हैं। सो साहब के यहां डिब्बावाले खूब पहुंच रहे हैं। साहब को डिब्बा देकर अपने को धन्य समझ रहे हैं। मान ले रहे हैं चलो इस त्यौहार के बहाने कम से कम साहब की नजर तो पड़ी। इसके अलावा पुडिय़ा वाले साहब को विभाग के लगुए-भगुए भी डिब्बा थमाने में जुटे हैं। साहब के चेले बताते हैं कि बीते तीन दिनों से साहब डिब्बा-डिब्बा खेल रहे हैं। इस चक्कर में बेचारी पुडिय़ा आठ-आठ आंसू रो रही है। डिब्बे के आगे उसको साहब पूछ तक नहीं रहे हैं।

फिर ठगे गए चचा
राजनीति में भतीजे द्वारा चचा बार-बार ठगे जा रहे हैं। भैया जी ने लहरा दिया था लेकिन भतीजा नहीं माना। भतीजे ने पापा को साइकिल पर बैठा लिया और आगे बढ़ गया, चचा देखते रह गए। आगरा की पंचायत में लगा था कि चचा के दिन भी बहुरेंगे। कहा जा रहा था कि भैया जी ने ऐसी रणनीति तैयार की है कि चचा-भतीजे दोनों मिलकर साइकिल चलाएंगे। चचा भी तैयार थे कि चलो साइकिल की गद्दी पर न सही कैरियर पर ही बैठ जाएंगे। भतीजे ने जब साइकिल चलानी शुरू की तो चचा की हवा निकल गई। चचा को साइकिल पर न बैठाने का बड़ा मलाल है। अब चचा के समर्थक कहते घूम रहे हैं कि भैया जी की वजह से चचा फिर से ठगे गए हैं।

यह पब्लिक है सब जानती है

आज कल देश में बड़बोलेपन का कंप्टीशन चल रहा है। कुछ नेता तो जैसे विवादों की तलाश में ही रहते हैं। वे कोई मौका नहीं चूकते हैं ताकि अखबारों की सुर्खियां बन सकें। हिन्दुत्व का झंडा उठाए और स्लाटर हाउस चलाने वाले पश्चिम के एक नेताजी ने विश्व प्रसिद्ध ताजमहल को गिराने की बात कही तो मुस्लिमों की रहनुमाई करने वाले नेताजी भला कैसे खामोश रहते। उन्होंने आग में पूरा घी का पीपा ही उलट दिया। बड़ी तहजीब से बात करने वाले नेता जी ने संसद भवन, लाल किला और तमाम इमारतों को भी गिराने की बात कही और इस बात का तर्क दिया कि यह सब गुलामी की निशानी है सभी को जमींदोज कर दो। अब इन नेताओं को कौन समझाए कि यह पब्लिक है सब जानती है।

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