मुलायम के लिये अखिलेश जैसा कोई नहीं

अखिलेश सपा के दोबारा अध्यक्ष बन गये और उन्हें पिता मुलायम सिंह यादव का आशीर्वाद भी मिल गया। इतना ही नहीं मुलायम ने ऐन वक्त पर अलग राजनैतिक दल बनाने का अपना इरादा भी बदल दिया। जबकि जब आगरा में सपा का अधिवेशन हो रहा था, उसी समय लखनऊ में मुलायम के नेतृत्व में नई पार्टी बनाने की नींव एक तरह से रख ली गई थी, जिसकी रूपरेखा 25 सितंबर को तय कर ली गई थी, लेकिन अखिलेश की चतुराई से ऐसा हो नहीं सका। अन्यथा अखिलेश के लिये बड़ी मुश्किल खड़ी हो जाती।
खैर, इसके पीछे तमाम किंतु-परंतु हो सकते हैं, लेकिन नेताजी के नई पार्टी बनाने से कदम पीछे खींचने की सबसे बड़ी वजह एक बार नेताजी का पुत्र मोह ही रहा। मुलायम को करीब से जानने वालों को पता है कि नेताजी कहें कुछ भी लेकिन दुनिया में वह अखिलेश से अघिक किसी को प्यार नहीं करते हैं। किसी रिश्ते को तवज्जो नहीं देते हैं। वह अखिलेश को फलता-फूलता देखना चाहते हैं। इसके लिये हर जतन करते हैं। बस, फर्क इतना भर है कि अखिलेश अपने बनाये रास्ते पर चलना चाहते हैं जबकि पिता मुलायम चाहते हैं कि बेटा उसी मार्ग पर आगे बढ़े जिस मार्ग को उन्होंने वर्षो की ‘तपस्या’ के बाद तैयार किया है। नेताजी का पुत्र मोह ही था जो उनका पर्यावरण इंजीनियर बेटा अखिलेश सियासत के मैदान में कूदा। नेताजी ने पहले बेटे को सांसद बनाया, फिर उसकी पत्नी डिपंल यादव को लोकसभा में भेजा। नेताजी के करीबी बताते हैं कि वह दिन में कई बार अखिलेश से फोन पर बात करते थे, अगर एक बार भी अखिलेश फोन नहीं उठाते तो वह बेचैन हो जाते थे। यह सिलसिला लगातार चलता रहा। पुत्र मोह में ही मुलायम ने परिवार के विरोध की परवाह न करते हुए अखिलेश को सीएम की कुर्सी तक सौंप दी थी, जबकि वे चाहते तो स्वयं या फिर शिवपाल यादव को जो अपने आप को सीएम पद का प्रबल दावेदार समझ रहे थे, सीएम बनने का मौका दे सकते थे। अखिलेश को सीएम बनाये जाने से शिवपाल की नाराजगी किसी से छिपी नहीं रह पाई थी। अखिलेश ने सीएम की कुर्सी संभालते ही प्रदेश के विकास को अपना सियासी हथियार बना लिया।
मुलायम पुत्रमोह में फंसे रहे तो अखिलेश ने भी एक आज्ञाकारी बेटे की भूमिका निभाने में कभी कोताही नहीं की। 2012 में विधान सभा चुनाव जीतने के बाद नेताजी की मर्जी के अनुसार अखिलेश ने मंत्रिपरिषद का गठन किया। इस वजह से अखिलेश के कई करीबी नेता जो मंत्री पद के प्रबल दावेदार थे, नाराज भी हो गये थे। नेताजी की खास आईएएस अनीता सिंह को प्रमुख सचिव बनाया, जिनको पांच साल तक नहीं हटाया। अखिलेश को पता था कि मुलायम अपने सभी काम अनीता सिंह के माध्यम से ही कराते हैं,लेकिन सीएम रहते अखिलेश ने कभी इसमें दखलंदाजी नहीं की। मुलायम ही नहीं, चाचा शिवपाल यादव भी अखिलेश राज में अपने आप को सुपर सीएम समझते थे। वह सभी विभागों में सीधा दखल देते थे। मुलायम सिंह शिवपाल यादव और आजम खान का ही नहीं प्रमुख सचिव अनीता सिंह का भी अखिलेश राज में सिक्का चलता था। इसीलिए विपक्ष हमेशा साढ़े चार मुख्यमंत्री की बात कहता रहता था। यह सब 2014 लोकसभा चुनाव तक तो चलता रहा, परंतु जब आम चुनाव के नतीजे आये और समाजवादी पार्टी पांच सीटों पर सिमट गई तो नेताजी से लेकर शिवपाल यादव तक ने हार का ठीकरा अखिलेश के सिर फोड़ दिया। अखिलेश ने तेवर बदल लिये। वह फ्रंट मोर्चे पर आ गये। उन्होंने सबसे साथ-साथ नेताजी की भी सुनना बंद कर दिया।
अखिलेश जिद्दी बचपन से ही थे। मगर बचपन की बात और होती है। सीएम की कुर्सी पर रहकर जिद्द कराना उनको भारी पडऩे लगा बाप-चाचा के इगो को ठेस लगी तो कुछ लोग घर के झगड़े की आग में घी डालने का काम करने लगे। इसमेंं अमर सिंह से लेकर साधना सिंह, शिवपाल यादव, प्रो. रामगोपाल यादव सहित तमाम नाम उछले। इसके बाद अखिलेश ने अपना घर बदला तो मां साधना से मनमुटाव की खबरें आने लगी। अखिलेश ने उस चाचा को भी मंत्रिमंडल से बाहर का रास्ता दिखा दिया जिनकी गोद में बैठकर वह कभी खेला करते थे। अखिलेश, बाप के आदेश की नाफरमानी नहीं कर सकते थे,इसलिए उन्होंने पिता मुलायम सिंह यादव से सियासी दूरी बना ली। अखिलेश ने लखनऊ में सपा को राष्ट्रीय अधिवेशन बुला कर अपने आप को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष घोषित किया और नेताजी को संरक्षक बना दिया। चचा शिवपाल यादव को सरकार के बाद संगठन से भी बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
तब लगा कि पूरे ड्रामें का पटाक्षेप हो चुका है। मगर नेताजी ने हार नहीं मानी। उन्हें बेनी प्रसाद वर्मा, भगवती सिंह, रेवती रमण जैसे नेताओं के अलावा भाई शिवपाल का साथ मिला हुआ था तो तत्कालीन विधान सभा अध्यक्ष माता प्रसाद पांडेय और आजम खान जैसे नेता दोनों सबसे अधिक हिचकोले शिवपाल यादव की सियासत मार रही थी। मुलायम सिंह भाई के साथ होते हुए भी पुत्र मोह से उबर नहीं पा रहे थे। शिवपाल लगातार इस प्रयास में थे कि नेताजी के साथ मिलकर नया सेक्युलर मोर्चा बना कर अखिलेश को चुनौती दी जाये। आगरा अधिवेशन से पहले इसकी रूप रेखा भी बन गई थी,लेकिन ऐन वक्त पर पिता मुलायम से बात करके अखिलेश ने डेमेज कंट्रोल कर लिया। वह पिताश्री को आगरा अधिवेशन का निमंत्रण देने गये तो बाप-बेटे के बीच की दूरियां काफी कम हो गईं।
इसी के बाद नेताजी ने आगरा न पहुंच कर भी अखिलेश को बधाई दी,जिसका अच्छा मैसेज गया। अब तो यह भी कहा जा रहा है कि शिवपाल भी मान गये हैं कि अखिलेश को किनारे करके समाजवादी राजनीति को आगे नहीं बढ़ाया जा सकता है। लगता है इस प्रकार से सपार्टी के ड्रामे का पटाक्षेप हो गया है। पुत्रमोह में फंसे पिता मुलायम ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उनके लिये अखिलेश के जैसा कोई नहीें है।

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