औरों की तरह ममता बनर्जी भी सत्ता पाने के बाद बदल गयीं

शिव शरण त्रिपाठी

पश्चिम बंगाल की वर्तमान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अतीत की जुझारू राजनीति भला कौन भूल सकता है। 1970 में कांग्रेस पार्टी से राजनीति की शुरूआत करने वाली ममता बनर्जी यदि वामपंथियों के गढ़ में अपने को राजनीतिक रूप से स्थापित कर सकीं, यदि वह 2011 में वामपंथियों के अभेद्य किले को ध्वस्त कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री बन सकीं तो नि:संदेह यह उनकी सादगी व विरल संघर्षों की राजनीति का ही परिणाम रहा है।
वामपंथी सरकार के विरूद्ध समय-समय पर आंदोलन चलाने वाली ममता ने सडक़ों पर पुलिस की जितनी लाठियां खाई हैं, उतनी लाठियां शायद ही देश की किसी अन्य महिला राजनेत्री ने खाई हों। बार-बार पुलिस की बर्बरता का शिकार होने वाली ममता दीदी ने अंतत: बंगाल की धरती पर राजनीति का जो नया फलसफा लिख डाला उसकी मिसाल भी मिलनी मुश्किल है। 1984 के लोकसभा चुनाव में जब ममता दीदी ने वामपंथी राजनीति के एक प्रमुख स्तम्भ माने जाने वाले सोमनाथ चटर्जी को पटखनी दी थी तो वामपंथी राजनीति में भूचाल सा आ गया था। एक सूती धोती व हवाई चप्पल के पहनावे के चलते आम जन के बीच सादगी व त्याग की पर्याय बन चुकीं ममता दीदी ने कालांतर में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व से बढ़ते मतभेदों के चलते आखिरकार 1996 में पार्टी ही छोड़ दी और 1997 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस के नाम से नई पार्टी का गठन कर लिया।
इसके बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में उनकी धाक बढ़ती चली गई। 1999 के लोकसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद वह भाजपा से गठबंधन करके राजग सरकार में शामिल हो गईं और उन्हें सरकार में रेल मंत्री का पद मिला। ममता दीदी की ज्यों-ज्यों राजनीतिक ताकत बढ़ती गई त्यों-त्यों उनके तेवर भी बदलते गये। बात-बात में वह सरकार के शीर्ष नेतृत्व से भिडऩे लगीं। ऐसे में उन्होंने राजग तो कभी संप्रग का दामन थामा। अलबत्ता इसी बहाने खासकर बंगाल के लोगों को वह दिखाती/बताती व जताती रहीं कि वह बंगाल के लोगों के हितों के लिये कुछ भी कर सकती हैं। उन्हें सकल सुफल तब प्राप्त हुई जब 2011 के विधान सभा चुनाव में उन्होंने बुद्धदेव भट्टाचार्य की वामपंथी सरकार का तख्ता पलटकर सत्ता पर कब्जा कर लिया। यकीनन करीब तीन दशकों तक पश्चिम बंगाल में एक छत्र राज्य करने वाली वामपंथी सरकार का किला ढहाकर उन्होंने नया इतिहास रच डाला था।
सत्ता हथियाने के बाद पांच वर्षों के अपने शासन काल में ममता दीदी ने शनै:-शनै: एक आदर्श राजनेत्री का चोला उतार फेंका। उन्होंने सत्ता बनाये रखने के वे सारे गुण-अवगुण सीख/समझ लिये जिनके लिये अन्य दलों की सरकारें व राजनेत्री/राजनेता बदनाम रहे हैं। पराकाष्ठा तो तब दिखी जब वह भी छद्म धर्मनिरपेक्षता के रास्ते महज इसलिये चल पड़ीं कि बंगाल के कोई 27 फीसदी मुसलमानों का वोट उनके हाथ से न निकलने पाये। यही कारण था कि उन्होंने खुले तौर पर हिन्दुओं को अपमानित करने का खेल शुरू कर दिया। फिर तो हिन्दुओं के त्योहारों पर पाबंदियां लगाई जाने लगीं। गत वर्ष की तरह इस वर्ष भी उन्होंने हिन्दुओं के त्योहारों पर पाबंदियां लगाईं तो उच्च न्यायालय ने पुन: उन्हें कड़ी हिदायत देने में चूक नहीं की। हाईकोर्ट ने यहां तक कहा कि सरकार के पास अधिकार हैं पर असीमित नहीं हैं।
कोई भी आसानी से समझ सकता है कि माननीय हाईकोर्ट के फैसले का उन पर असर न पडऩा उनकी सोची समझी विकृत राजनीति का ही उदाहरण है। हाईकोर्ट के आदेश के बहाने उन्होंने अपनी प्रतिक्रिया में अल्पसंख्यकों का पक्ष लेने का कोई मौका नहीं गंवाया। वो अल्पसंख्यकों को रिझाने के लिये ही भाजपा व संघ के नेताओं के कार्यक्रमों को नहीं होने देतीं। रोहिंग्या मुसलमानों को पश्चिम बंगाल में शरण देने की वकालत के पीछे उनका राजनीतिक मकसद भी छिपा नहीं है।
यहां यह भी गौरतलब है कि अब तक उनकी पार्टी, सरकार के कई नेताओं पर भ्रष्टाचार के मुकदमें दर्ज हो चुके हैं। कुछ तो जेल की कोठरी में पहुंच चुके हैं पर ममता दीदी इसे साजिश बताती हैं। वो लालू प्रसाद यादव जैसों के साथ मंच साझा करके केंद्र की मोदी सरकार को चलता करने की हुंकार भरती हैं। कल तक पूरा देश जहां उन्हें एक आदर्श राजनेत्री के रूप में देख रहा था, आने वाले कल में यदि वो औरों की तरह सिर्फ एक सम्प्रदाय विशेष की नेत्री रह जायें तो आश्चर्य की बात न होगी।

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