काम तो बहुत किया पर आसान नहीं शिवराज की राह

2018 में मध्य प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों का समय जैसे जैसे नजदीक आता जा रहा है वैसे वैसे प्रदेश में राजनैतिक हलचल भी तेज होती जा रही है। वैसे तो प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी बीते 14 सालों से सत्ता में है लेकिन शिवराज शासन की अगर बात की जाए तो विगत 12 वर्षों से प्रदेश की बागडोर उनके हाथों में है। इन बारह सालों में शिवराज सिंह सरकार के नाम कई उपलब्धियां रहीं तो कुछ दाग भी उसके दामन पर लगे। अगर उपलब्धियों की बात की जाए तो उनकी सबसे बड़ी सफलता मप्र के माथे से बीमारू राज्य का तमगा हटाना रहा। बिजली उत्पादन के क्षेत्र में आज मप्र सरप्लस स्टेट में शामिल है, यहां 15500 मेगावाट बिजली की उपलब्धता है जबकि मांग सामान्यत: 6000 मेगावाट और रबी सीजन में अधिकतम 10000 मेगावाट रहती है।
अटल ज्योति योजना के अन्तर्गत 24 घंटे बिजली देना एक महत्वपूर्ण कदम रहा। हालांकि बिजली आपूर्ति के इन्फ्रास्ट्रक्चर का विकास हुआ है लेकिन देश के बाकी राज्यों के मुकाबले यह सबसे अधिक बिजली टैरिफ वाले राज्यों में शामिल है।
सडक़ों की अगर बात की जाए तो गांवों तक पहुंच आसान हो गई है। पर्यटन के क्षेत्र में ‘हिन्दुस्तान का दिल देखो’ ऐड कैम्पेन से मप्र ने देश में उत्कृष्ट स्थान हासिल किया, इसके लिए 2008 में यूएस द्वारा मप्र को पर्यटन के क्षेत्र में सर्वश्रेष्ठ राज्य घोषित किया गया और वर्ष 2015 में छह राष्ट्रीय पुरस्कार भी जीते।
लगातार चार बार कृषि कर्मण अवार्ड जीतने वाला देश का पहला राज्य बना, 108 एम्बुलेंस, जननी योजना, लाडली लक्ष्मी योजना, मुख्यमंत्री तीर्थ दर्शन योजना, शिवराज सरकार की वो उपलब्धियां हैं जिन पर बेशक सरकार अपनी पीठ थपथपा सकती है।
यह सत्य है कि विभिन्न क्षेत्रों में आशातीत निवेश नहीं हुआ है लेकिन यह भी नहीं है कि निवेश हुआ ही नहीं है। निवेश क्षेत्र– आईटी, औटॉमोबाईल, रक्षा, इनर्जी, फार्मास्यूटिकल, टैक्सटाईल, पर्यटन में सिंगल विंडो के माध्यम से तीव्रगति से एक महीने के अंदर सरकारी प्रक्रिया पूरी की जा रही है। औद्योगिक लैंड बैंक की व्यवस्था भी सिर्फ मध्य प्रदेश में ही है।
कई मोर्चों पर मुख्यमंत्री से चूक भी हुई वरना 2015 में भाजपा का गढ़ कहे जाने वाले रतलाम और झाबुआ लोकसभा सीट उप चुनाव के लिए बतौर सीएम रहते हुए दर्जन भर सभाएं, 15 मंत्रियों, 16 सांसदों, 60 विधायकों के साथ चुनाव प्रचार एवं 1500 करोड़ की घोषणाओं के बावजूद शिवराज की झोली में हार क्यों आई? देवास में जीत का अन्तर भी चेहरे पर खुशी लाने वाला नहीं माथे पर बल लाने वाला रहा। हालात की अगर समीक्षा की जाए तो भले ही सरकार अपनी उपलब्धियों को आज अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापनों से राज्य में तरक्की का श्रेय ले रही हो लेकिन धरातल पर शिवराज सरकार की लोकप्रियता में निश्चित ही कमी आई है।
व्यापमं घोटाला भ्रष्टाचार की सारे हदें पार कर गया क्योंकि सैंकड़ों छात्रों और गवाहों की मौत का कलंक दामन से मिट नहीं सकता है, इतना ही नहीं किसान आंदोलन में किसानों पर गोली चलाना एक बहुत ही गलत कदम रहा। दरअसल यह सरकार के अति-आत्मविश्वास एवं प्रशासन तंत्र द्वारा गलत फीडबैक का नतीजा रहा। स्वयं को किसान का बेटा कहने वाले शिवराज के 13 वर्षों के शासन में, खुद मध्य प्रदेश सरकार द्वारा विधानसभा में जारी आंकड़ों के अनुसार 15129 किसान आत्महत्या कर चुके हैं। एक तरफ सरकार दावा कर रही है कि राज्य में चार सालों में कृषि विकास दर 20प्रतिशत बढ़ी है तो दूसरी तरफ उसके पास इस प्रश्न का कोई जवाब नहीं है कि प्रदेश का किसान असंतुष्ट क्यों है ? कभी प्याज तो कभी टमाटर सडक़ पर फेंकने के लिए मजबूर क्यों है किसान ? कैग की एक रिपोर्ट के अनुसार कृषि की खेती के सामान खरीदी में प्रदेश में 261 करोड़ रुपए की धांधली हुई है।
स्वास्थ्य सेवाओं की बात की जाए तो उनमें भी गिरावट आई है। शिशु-मृत्यु दर और कुपोषण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। शिक्षा के क्षेत्र में ढेर सारे इंजीनियरिंग कॉलेज खोले जाने के बावजूद उनमें से न तो अच्छे इंजीनियर निकल रहे हैं न ही इन कालेजों से निकलने वाले युवाओं को नौकरी मिल पा रही है जिसके कारण बेरोजगारी की समस्या बढ़ती जा रही है। प्रदेश में अवैध खनन ने भी सरकार की साख ही नहीं राज्य के राजस्व पर भी गहरा वार किया है।
अगर सरकार की नाकामयाबियों के कारणों को टटोला जाए तो बात प्रदेश की नौकरशाही पर आकर रुक जाती है। आरएसएस की बैठक में भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय तक ने नौकरशाही के हावी होने का मद्दा उठाया था। प्रदेश की बेलगाम और भ्रष्टाचार में डूबी ब्यूरोक्रेसी के कारण प्रदेश में न तो गुड गवर्नेंस हो पा रही है न ही सरकार द्वारा घोषित योजनाओं का क्रियान्वयन हो पा रहा है।
तो देखना दिलचस्प होगा कि जिस भाजपा सरकार को प्रदेश की जनता ने लगातार तीन बार सिर आँखों पर बैठाया वो शिवराज के प्रशासन और नौकरशाहों पर उनकी ढीली होती पकड़ के कारण विपक्ष में बैठने का आदेश सुनाएगी या फिर काग्रेस की आपसी फूट एवं किसी और बेहतर विकल्प के अभाव में भाजपा को एक मौका और देगी।

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