फिर भी थानों पर दर्ज नहीं हो रहीं एफआईआर

दरअसल सरकार भले ही बदल गई हो किंतु पुलिस की मानसिकता नहीं बदली है। पुलिस अपराध के आंकड़ों को दुरुस्त रखने के लिए अपने इलाके की कानून-व्यवस्था सुधारने के बजाय इस बात पर ध्यान देती है कि चोरी, लूट, राहजनी, बलात्कार जैसे मामलों को दर्ज करने में कतराती है। इससे अपराधी का मनोबल तो बढ़ता ही है साथ ही पीडि़त व्यक्ति का पुलिस के ऊपर से भरोसा भी उठ जाता है और थानों को मंदिर जैसा बनाने की बात दिवास्वप्न ही लगती है।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उनकी सरकार की नीयत भले ही साफ हो लेकिन अफसर उसके अनुरूप काम नहीं कर रहे हैं। बार बार कहा जाता है कि पिछली सरकार में थानों पर पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज नहीं होती थी, इसलिए अपराध के आंकड़े कम थे। मौजूदा सरकार में हर पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज करने के आदेश हैं और थाने पर पहुंचने वाले हर पीडि़त की एफआईआर दर्ज हो रही है। इसलिए अपराध के आंकड़े भी बढ़ जाते हैं। सरकार के इस दावे के बीच तमाम बार यह देखने को मिलता है कि अमुक थाने में पीडि़त की रिपोर्ट दर्ज नहीं की गई और उसे थाने से टरका दिया गया। ताजा मामला अलीगढ़ जिले का है। जहां सामूहिक बलात्कार जैसे गंभीर अपराध की रिपोर्ट पुलिस ने दर्ज नहीं की। तीन दिन तक पीडि़त महिला और उसका पति थाने के चक्कर काटता रहा किंतु थाना पुलिस ने उसकी एक न सुनी। हारकर महिला अफसरों के पास पहुंची। पीडि़त महिला ने एक आरोपी का काटा हुआ कान वहां के एसएसपी को दिखाया तब पुलिस को यकीन हुआ कि वास्तव में महिला के साथ अपराध हुआ है और तब एसएसपी ने एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए। महिला घर में सो रही थी, पति घर के बाहर सो रहा था। पड़ोस के चार लोग उसके घर में घुसे और जबरन महिला के साथ बलात्कार किया। इस दौरान महिला चीखी-चिल्लाई, पति आया तो आरोपियों ने पीटा। बलात्कार के दौरान महिला ने एक आरोपी का कान दांत से काट लिया था। कटा हुआ कान महिला के पास था। साफ है कि यदि महिला के पास आरोपी का कटा हुआ कान न होता तो पुलिस यकीन नहीं करती कि उसके साथ अपराध हुआ है और एफआईआर भी दर्ज नहीं होती। अलीगढ़ की यह घटना तो बानगी भर है। वास्तव में आए दिन ऐसा हो रहा है कि थानों पर पीडि़त पहुंच रहे हैं और पुलिस उनकी एफआईआर दर्ज करने में न केवल आनाकानी करती है बल्कि एफआईआर दर्ज न कर पीडि़त को थाने से भगा देती है। दरअसल सरकार भले ही बदल गई हो किंतु पुलिस की मानसिकता नहीं बदली है। पुलिस अपराध के आंकड़ों को दुरुस्त रखने के लिए अपने इलाके की कानून-व्यवस्था सुधारने के बजाय इस बात पर ध्यान देती है कि चोरी, लूट, राहजनी, बलात्कार जैसे मामलों को दर्ज करने में कतराती है। इससे अपराधी का मनोबल तो बढ़ता ही है साथ ही पीडि़त व्यक्ति का पुलिस के ऊपर से भरोसा भी उठ जाता है और थानों को मंदिर जैसा बनाने की बात दिवास्वप्न ही लगती है।

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