अमेरिका की घटना दूसरे मुल्कों के लिए बड़ा सबक

अमेरीका में एक सनकी ने करीब 60 लोगों को गोली से उड़ा दिया और खुद की इहलीला भी समाप्त कर ली। पुलिस ने उसके घर और होटल से करीब एक दर्जन स्वचालित हथियार बरामद किए हैं। मरने और मारने वाले स्टीफन का कोई अपराधिक इतिहास भी नहीं रहा। पूरा अमरीका दिल दहलाने देने वाली इस घटना से हतप्रभ है कि आखिर 64 वर्षीय स्टीफन पैडॉक ने ऐसा कदम क्यों उठाया है। अमरीकी समाज इस घटना से अन्दर तक हिला हुआ है। आखिर अमरीका में ये सब कैसे हो रहा है। अमरीका में विगत 17 सालों में इसी तरह की पांच बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं। मसलन किसी की प्रेमिका रूठ गई तो उठाई बंदूक और आम लोगों को भून डाला। कोई छात्र अपने शिक्षक से नाराज है तो घर से बंदूक लाया और अंधाधुन्ध फायरिंग कर दी। इसी तरह किसी का किसी से किसी बात पर झगड़ा हो गया तो सरेआम गोलियां बरसा दीं।
यह सच्चाई है, उस अमरीकी समाज की जो खुद पर इतराने से बाज नहीं आता। जिसके नाज-नखरे पूरी दुनिया झेलती है। जिसने कभी आत्मचिंतन करने की कोशिश नहीं कि आखिर उनके देश में यह सब क्यों हो रहा है, जिसे पूरी दुनिया सपनों का देश मानती है। दरअसल अमरीकी समाज सपनों में ही जी रहा है। पूरी दुनिया की सभ्यता-संस्कृति को हेय समझता है। अपने को ही विशिष्ट समझता है। भौतिकवादी तरक्की को ही असली तरक्की समझ बैठा है। हालात यह हो गए हैं कि इस समाज का हरेक व्यक्ति इंसान न होकर भौतिक सामान बन गया है। हर चीज की कीमत डॉलर में तय होती है। मानवीय संबंधों की भी। परिवार नाम की संस्था को ढकोसला समझ कर हाशिये पर धकेला जा रहा है। पति-पत्नी के संबंध आत्मिक न रहकर भौतिक होते जा रहे हैं। व्यक्तिगत आजादी के नाम पर बच्चों और किशोरों को उन्मुक्तता की खुली छूट दी जा रही है। बाकायदा कानून बनाकर उन्हें ऐसा करने का विधिवत मौका दिया जा रहा है। परिजनों के पास गलती करने पर बच्चों को डांटने का अधिकार भी नहीं रह गया है। बच्चा शिकायत कर पुलिस से गिरफ्तार करा देगा। अन्यथा बच्चे को परिजनों से छीन कर सरकारी अनाथ आश्रम के सुपुर्द कर दिया जाएगा।
लिविंग टुगेदर जैसी बुराई भी ऐसे ही पश्चिमी समाजों की देन है। संतानोत्पत्ति को बाधा और बोझ समझा जा रहा है। तलाक के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं। इसमें बच्चे पिस रहे हैं। तलाक से बच्चों पर क्या असर पड़ेगा इसकी चिंता न समाज को है और न ही अमरीकी सरकार को। बच्चों को महज एक प्रोडक्ट मान लिया गया है। अमरीकी समाज में डेटिंग और मद्यपान करने को आधुनिकता का नाम दिया जाता है। किशोर उम्र तक जो इन कुकृत्यों में लिप्त नहीं होता, उसे पिछड़ा हुआ माना जाता है। विवाह जैसे पवित्र बंधन की परिभाषा किस स्तर तक गिरती जा रही है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि समलैंगिकता जैसी कुसंस्कृति का वाहक भी अमरीका ही है। निजी आजादी के नाम पर इसी तरह की आजादी की मांग अब दुनिया के दूसरे देशों में भी उठने लगी है। दाम्पत्य जीवन को बोझ और व्यर्थ का बंधन माना जा रहा है। अमरीका सहित कई देशों में समलैंगिकों के विवाह के कानून बन गए हैं।
अमरीकी सरकार और समाज के नैतिक पतन की इंतहा यह है कि सबको कानूनी तौर पर मारजुअना जैसे मादक पदार्थ का सेवन करने की छूट है। लगभग पूरा अमरीकी समाज किसी ने किसी तरह के नशे की गिरफ्त में है। रही-सही कसर हथियारों की छूट ने पूरी कर दी। सबको हथियार रखने की आजादी है। घर-घर में हथियार मिल जाएंगे। इनकी संख्या पर भी कोई पाबंदी नहीं है। कोई कितने भी हथियार रख सकता है। जब कभी अमरीका में बंदूक संस्कृति के खिलाफ आवाज मुखर की जाती है, हथियार लॉबी सामने खड़ी हो जाती है। अमरीका ने हथियार और डॉलर की ताकत के बूते विश्व में धौंसपट्टी जमा रखी है। डॉलर के लालच में भौतिकवाद को अति तक पहुंचाने के लिए हथियारों की यही गंदगी अमरीका दूसरे देशों में भी बिखेर रहा है। अमरीका हथियारों का प्रमुख निर्यातक देश है। इसी का परिणाम अमरीका भुगत भी रहा है।
अमरीकी समाज आजादी और खुलेपन के नाम पर जिस दौर से गुजर रहा है, उसमें मानसिक तनाव, कचोटता अकेलापन, नशे से लगाव और हिंसा तेजी से बढ़ रही है। अमरीकी समाज आज दोराहे पर खड़ा है, उसे समझ ही नहीं आ रहा कि आखिर तरक्की और आजादी के पैमाने क्या हैं। खोखला होते जा रहे समाज की इस हालत के लिए कोई और नहीं बल्कि खुद अमरीकी समाज ही जिम्मेदार है। जिसमें मानवीय संबंधों, पारिवारिक संस्थाओं, सामाजिक सौहार्द-भाईचारे की भावना का लगातार पतन हो रहा है।
अमरीका में जो कुछ घटित हो रहा है, वह भारत और दूसरे मुल्कों के लिए एक सबक भी है। सबक यह कि आर्थिक समृद्धि और उन्मुक्तता ही जीने का तरीका नहीं है। मानवीय मूल्यों का तिरस्कार करने से समाज उसी अंधेरे गर्त में गिरेगा, जैसा अमरीका गिर रहा है। अमरीका में हिंसा की इस घटना के बाद भी ऐसी पुनरावृत्ति नहीं होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। चंद दिनों बाद फिर कोई सिरफिरा बंदूक लेकर आएगा और अपनी भड़ास गोलियां बरसा कर आम लोगों पर निकालेगा। शूटआउट की ऐसी जघन्य वारदातें अमरीकी समाज के आदर्श समाज होने का मुलम्मा खींचने के लिए काफी हैं। ऐसे हत्याकांड उस कथित अत्याधुनिक समाज के चेहरे पर लगे घावों में कुलबुलाते कीड़ों को दर्शाते हैं, जिन्हें आधुनिकता के लेप से ढका गया है।

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