दशहरे पर मोदी का धनुष टूटना कहीं कोई बड़ा संकेत तो नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दिल्ली के लालकिला मैदान में दशहरा पर्व पर रावण के पुतले का दहन करने के लिए जैसे ही धनुष की प्रत्यंचा पर तीर रखकर चलाने की कोशिश की तो धनुष टूट गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुस्कराते हुए तुरंत तीर का भाले के रूप में प्रयोग किया और उसे रावण के पुतले की तरफ फेंक दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लाल किला पहुंचने से पहले ही दशहरा के रावण का पुतला गिर गया था। लालकिला की यह रामलीला तथा रावण दहन देश-विदेश में मशहूर है। प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति और पूर्व प्रधानमंत्री की मौजूदगी से पूर्व आयोजक और सुरक्षा एजेंसियां सघन जांच करती हैं। इसमें गलती या लापरवाही की गुंजाइश नहीं है। ऐसे में इन दोनों घटनाओं को प्रधानमंत्री मोदी के लिए अशुभ संकेत माना जा रहा है।
दिनों दिन खराब होती अर्थव्यस्था की सही हालत बयान करने के लिए कई आंकड़े इन दिनों हमारे सामने आ चुके हैं। जीडीपी की रफ्तार इस वित्त वर्ष में घटकर 5.7 फीसदी रह गई है और ऐसा केवल मोदी सरकार बनने के बाद गणना का फार्मूला बदलने के कारण हुआ है जो मोदी सरकार के तीन साल के कार्यकाल में सबसे निचले स्तर पर है। यह आंकड़ा भी मापने के तरीके को बदलने की वजह से है जबकि पुराने फार्मूले के हिसाब से वास्तविक दर 3 प्रतिशत के आसपास पहुंच चुकी है। ब्लूमबर्ग द्वारा जारी टीमलीज सर्विसेज लिमिटेड की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में रोजगार की दर 12 साल के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गयी है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि आने वाले दिनों में स्थिति और खराब होगी। रिपोर्ट में संभावना जताई गई है कि पिछले साल की तुलना में भारत के निर्माण क्षेत्र के रोजगार में 30-40 प्रतिशत की कमी आएगी।
सबसे चिंता की बात यह है कि इनमें पढ़े-लिखे युवाओं की तादाद ही सबसे ज्यादा है। बेरोजगारों में 25 फीसदी 20 से 24 आयुवर्ग के हैं, जबकि 25 से 29 वर्ष की उम्र वाले युवकों की तादाद 19 फीसदी है। 20 साल से ज्यादा उम्र के 15.30 करोड़ युवाओं को नौकरी की तलाश है। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बढ़ता बेरोजगारी का यह आंकड़ा सरकार के लिए गहरी चिंता का विषय है। वर्ष 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार महिला बेरोजगारी भी लगातार बढ़ी है। बेरोजगारों में 10वीं या 12वीं तक पढ़े युवाओं की तादाद 20 फीसदी है। यह तादाद लगभग 4 करोड़ है। तकनीकी शिक्षा हासिल करने वाले 22 फीसदी युवा बेरोजागारों की कतार में हैं। नोटबंदी ने कालेधन और आतंकवाद को कितना प्रभावित किया यह तो फिलहाल पता नहीं चल पाया है परंतु सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की रिपोर्ट के अनुसार नोटबंदी के कारण भारत में 15 लाख लोग बेरोजगार हुए हैं एवं 60 लाख लोग दो वक्त की रोटी के लिए मोहताज हो गए हैं।
सेन्टर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के सर्वे के मुताबिक, एक कमाऊ व्यक्ति पर घर के चार लोग आश्रित हैं, तो इस लिहाज से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक फैसले ने 60 लाख से ज्यादा लोगों के मुंह से निवाला छिन गया है। भारतीय जनता पार्टी के अपने संगठन भारतीय मजदूर संघ ने बयान जारी कर कहा था कि नोटबंदी से 20 लाख नौकरियां गई हैं। खुद जून माह में श्रम मंत्री द्वारा जारी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ था कि भारत में बेरोजगारी के दर लगातार बढ़ रही है और रोजगार घट रहे हैं। पिछले सालों के मुकाबले रोजगार की दर 40 प्रतिशत से ज्यादा कम हुई है और ऊपर से पेट्रोल और डीजल पर महंगाई के अलावा शिक्षा और स्वच्छता उपकर के नाम पर कर की वसूली की जा रही है और स्थायी रोजगार लगातार कम हो रहे हैं। एक अनुमान के अनुसार अगले एक-दो वर्षों में आई.टी. क्षेत्र में 8-10 लाख नौकरियां कम हो जायेंगी।
उल्टा नौकरशाह से सरकार में नए-नए मंत्री बने अल्फोंस ने जनता को धमकाने वाले अंदाज में समझाया है कि यदि मोटरसाइकिल, कार, ट्रैक्टर और ट्रक चलाना है तो टैक्स भरना पड़ेगा। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने भी व्यापारियों को इसी अंदाज में समझाया कि विकास के लिए पैसा चाहिए, इसलिए टैक्स भरना पड़ेगा। नोटबंदी और जीएसटी के कारण 35 प्रतिशत लघु और मझोले कारोबारियों का व्यापार प्रभावित हुआ है। अब तो मोदी सरकार के समर्थक एवं आर्थिक विशेषज्ञ भी यह मानने लगे हैं कि नोटबंदी और जीएसटी के खराब प्रबंधन के कारण व्यापार और रोजगार प्रभावित हो रहा है।
वाजपेयी सरकार में मंत्री रह चुके अरुण शौरी के बाद संघ के थिंकटैंक माने जाने वाले एस. गुरुमूर्ति और अब पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की खरी-खरी सरकार की नींद हराम कर रही है। खुद संघ प्रमुख मोहन भागवत ने दशहरा के मौके पर सरकार को नसीहत देते हुए जनता के मुद्ïदों पर गौर करने की सलाह दी है। विपक्ष तो लगातार कहता आया है लेकिन कमजोर विपक्ष की आवाज दबकर रह गई। अब जबकि भाजपा और उसके सहयोगी संगठनों के दिग्गज भी सवाल उठा रहे हैं तो सरकार को अपनी नीतियों पर पुनर्विचार करना चाहिए। लेकिन ऐसा लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अरुण जेटली से अधिक विश्वसनीय सहयोगी नहीं मिल रहा है जिस पर विश्वास कर वह उसे वित्त मंत्री बना सकें। जेटली अच्छे वकील हो सकते हैं लेकिन वह अच्छे वित्त मंत्री साबित नहीं हुए हैं और आज बेरोजगारी, महंगाई, टैक्स बढ़ोतरी, उपकर इन्हीं की नीतियों के कारण बढ़े हैं। अगर यही हालत रही तो निश्चित रूप से सरकार की साख खराब होगी और कमजोर विपक्ष के बावजूद 2019 में भाजपा के सत्ता का सपना टूट सकता है। जनता में नाराजगी है लेकिन भाजपा भ्रम में है और भ्रम में 2004 में भी थी जब सभी अखबारों और चैनलों के सर्वे भाजपा की सरकार बना रहे थे लेकिन भाजपा को 10 वर्षों तक सत्ता पाने को लिए इंतजार करना पड़ा था।

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