भगत आप थे असली बाहुबली

भगत सिंह 28 सितम्बर को पैदा हुए थे वो भगत सिंह, जो एक व्यक्ति नहीं बल्कि विचार हैं जिसने ल्यालपुर से लेकर शहीद-ए-आजम बनने तक अपने आपको जिया है। शायद इसीलिए मैं किसी राष्ट्र्रभक्ति की अतिरेकिता या भावुकता की वजह से भगतसिंह के व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कभी नहीं करता। उस लडक़े से बड़ा पाठक कौन हो सकता है जिसने कार्ल माक्र्स, गोर्की, चाल्र्स डिकेन्स, रविन्द्र नाथ टैगोर, तुर्गनेव, और अप्टान सिन्क्लेयर जैसे लेखकों को सिर्फ 23 वर्ष 6 माह और 16 दिन की जिंदगी में अपने संगठन के कामों से वक्त निकाल कर पढ़ा हो। भगत सिंह से ज्यादा उम्र हो गयी है मेरी लेकिन आज तक उनको पूरा समझ नहीं पाया हूं लेकिन उस लडक़े ने ना केवल खुद को समझा बल्कि पूरे देश को भी समझा दिया की वो क्या है। सही मायनों में संसार में ऐसे कम उम्र के बुद्धिजीवी बिरले ही पैदा हुए हैं। यहां पर एक बात और काबिल-ए-गौर है कि 17 वर्ष की उम्र में भगतसिंह को एक राष्ट्रीय प्रतियोगिता में ‘पंजाब में भाषा और लिपि की समस्या’ विषय पर ‘मतवाला’ नाम के कलकत्ता से छपने वाली पत्रिका के लेख पर 50 रुपए का प्रथम पुरस्कार मिला था। लेकिन ये तथ्य भी लगातार अप्रचारित रहा। भारत की यशस्वी सरकार नहीं तो कम से कम भारत के महान लेखकों को ही उस 24 साल के लडक़े के नाम से साहित्य का कोई पुरस्कार शुरू करना चाहिए था।
अदालती कार्यवाहियों के उस दौर की भगत सिंह की ये शुरुआती लाइन देखिये, जिसमें वो कहते हैं कि ‘माई लार्ड हम न वकील हैं, न अंग्रेजी विशेषज्ञ और न हमारे पास डिग्रियां हैं। इसलिए हमसे शानदार भाषणों की आशा न की जाये। हमारी विनती है कि हमारे बयान की भाषा सम्बन्धी त्रुटियों पर ध्यान न देते हुए, उसके वास्तविक अर्थ को समझने का प्रयत्न किया जाये। दूसरे तमाम मुद्ïदों को हम अपने वकील पर छोड़ते हुए मै स्वयं इस मुद्दे पर अपने विचार प्रकट करूंगा। यह मुद्दा इस मुकद्दमे में बहुत महत्वपूर्ण है। मुद्दा यह है कि हमारी नीयत क्या थी और हम किस हद तक अपराधी हैं। सिर्फ इस शुरूआती बयान को पढि़ए और सोचिये कि इतनी कम उम्र का लडक़ा ऐसी बेबाकी से कैसे अपनी बातों को कह दे रहा है!
और इस लाइन को क्या कहेंगे आप ‘माई लार्ड इस दशा में मुझे यह कहने की आज्ञा दी जाये कि जो हुकूमत इन कमीनी हरकतों में आश्रय खोजती है, जो हुकूमत व्यक्ति के कुदरती अधिकार छीनती है, उसे जीवित रहने का कोई अधिकार नहीं है।’
बयान के एक हिस्से में भगत बोलते हैं कि ‘इंकलाब जिंदाबाद और साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’ के सम्बन्ध में हमने जो व्याख्या अपने बयान में दी, उसे उड़ा दिया गया है हालांकि यह हमारे उद्देेश्य का खास भाग है।’ इसे पढ़ के समझना मुश्किल नहीं है कि भगत सिंह तैयारी से गए थे, पढ़ के गए थे और लोगों को जगाने गए थे।
अतुलनीय शौर्य, जबरदस्त आत्मविश्वास और सर्वश्रेष्ठ राष्ट्रभक्ति। पूरा बयान पढ़ते-पढ़ते तो आप सोच में ही पड़ जायेंगे कि हम अब तक क्या कर रहे है ऐसी उद्देश्यहीन जिन्दगी जी के? जिन्दगी तो उस लडक़े ने जी और वो भी पूरे शान के साथ। वास्तव में भगत सिंह ‘संभावनाओं के जननायक थे।’ हालांकि भगत, हमें दु:ख है कि हमने नेताजी शब्द के साथ तो सुभाष चन्द्र बोस जी का नाम जोड़ दिया लेकिन सरदार शब्द के साथ हम आपके नाम को जोड़ नहीं पाए, ये हमारी असफलता है।
एक और बात भगत सिंह बहुत धीमे स्वर में बोलते थे। यही उनका तरीका था। यही शायद उनकी शक्ति भी थी। जुलाई 1930 का अंतिम रविवार था,जब भगत सिंह उनके साथियों से मिलने लाहौर जेल से बोस्त्रल जेल गए थे। वह, इस तर्क पर यह सुविधा हासिल करने पर कामयाब हुए थे की उन्हें दूसरे अभियुक्तों के साथ बचाव के तरीकों पर बातचीत करनी है। सभी साथी मजाक-मजाक में एक दूसरे को सजा सुना रहे थे, लेकिन किसी ने भगत सिंह और राजगुरु को सजा नहीं सुनाई,क्यूंकि सभी जानते थे की उन दोनों की सजा क्या थी। तब भगत सिंह ने यह बात भी कही थी कि ‘हमे गर्दन से फांसी के फंदे से तब तक लटकाया जायेगा,जब तक हम मर ना जाएं। यह है असलियत और मैं इसे जानता हूं। तुम भी जानते हो।’ आज की युवा पीढ़ी जो आंदोलनों को देखते हुए ही नाक-भौं सिकोडऩे लगती है उसको भगत सिंह के इस बयान से कुछ सीखना चाहिए।
क्रान्तिकारी आन्दोलन की पहली शर्त ये होती है की प्राण उत्सर्ग के लिए तैयार रहे। ये आन्दोलन आपको बचने के लिए नहीं बल्कि लोगों को जगाने के लिए प्रेरित करता है शायद यही वजह भी थी जिससे भगत नें उस योजना को सहमति नहीं दी जिसकी अगुवाई चंदशेखर आजाद कर रहे थे और इस योजना के अंतर्गत अदालत जाते वक्त बस से भगत सिंह को उतार के छुड़ाना था वो भी जेल के सामने।
भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु को जिस जगह फांसी पर चढ़ाया गया था, वह आज पूरी तहर धूल में मिल चुका है। आज के दिन वहां एक यातायात का गोलचक्कर है। यहां पर एक और बात बताना चाहूंगा जो बेहद मौजूं है। अहमद रजा कसूरी के पिता को इसी जगह गोली मारी गई थी, जिसका आदेश भुट्टो ने दिया था। कसूरी के दादा उन लोगों में एक थे जिन्होने तीनों क्रान्तिकारियों, यानी भगत सिंह, सुखदेव तथा राजगुरु के शरीर की शिनाख्त की थी। जब गोलियां चलाई जा रही थी, तब कसूरी के पिता नजदीक में उसी जगह बैठे थे, जहां कभी फांसी का तख्ता हुआ करता था, वह भी बुरी तरह से घायल हुए। लोगों का मानना है कि इस गोलचक्कर पर, जहां तीनों शहीदों को फांसी पर लटकाया गया वहीं बदले की देवी ने कसूरी परिवार को तबाह कर दिया।
अपने अंतिम पत्र की अंतिम लाइन में भगत ने ये बोला की ‘मेरे मन में कभी कोई लालच फांसी से बचे रहने का नहीं आया। मुझसे अधिक सौभाग्यशाली कौन होगा ! अब तो बड़ी बेताबी से अंतिम परीक्षा का इंतजार है। कामना है कि यह और नजदीक हो जाए।’ ये पढ़ते ही मेरा मन सोचने लगा कि असली बाहुबली तो आप थे भगत लेकिन आपको आज तक लोगों ने ये संज्ञा क्यों नहीं दी? कैसे तमाम अपराधी और नेता लोग ‘बाहुबली’ होते चले गए? आप ही थे असली बाहुबली भगत और अब मैं हमेशा से आज के बाद कहीं भी हुए इस शब्द के गलत प्रयोग पर आवाज उठाऊंगा, क्योंकि इस शब्द के असली अधिकारी भगत आप और आपके साथी ही हैं।
इसलिए आपके महान जन्म दिन के दिन सिर्फ क्रांतिकारी भगत सिंह को ही नहीं बल्कि असंख्य लेखों में दर्ज आपके जन-पक्षी और जनान्दोलन-पक्षी होने के पहलू को भी समझेंगे। अंग्रेजों के आतंकवादी, भारत सरकार की अनदेखी के शिकार और मेरे सबसे अच्छे दोस्त भगत सिंह को मेरा सलाम…

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