विश्वविद्यालयों के अंधेरे कमरे

अभी हाल ही में काशी हिंदू विश्वविद्यालय के नवीन महिला छात्रावास की छात्राओं को एक अजीब सी स्थिति का सामना करना पड़ा। जब उन्होंने अपनी वॉर्डन से अपने साथ हो रही छेडख़ानी और अन्य सुरक्षा संबंधी दिक्कतों को लेकर शिकायत की, तो सोशल मीडिया के रिपोर्ट के अनुसार वॉर्डन ने उनसे कहा कि ‘आखिर खिड़कियां ही क्यों खोलती हो तुम लोग’!
यह कोई आश्चर्यजनक सलाह या प्रतिक्रिया नहीं कही जा सकती क्योंकि हम अक्सर डरे हुए होते हैं अपनी जिम्मेदारियों और सुरक्षा के प्रश्नों को लेकर। पर मुद्दा कहीं और है, मुद्ïदा इस डर में जी रहे विश्वविद्यालयों और समाज का है, इस डर के परिणाम का है। आखिरकार यह डर कहां जाकर विनाश करेगा या ऐसे ही जीना उचित है, जहां हम ज्ञान परिसरों में खिड़कियों के निर्बाध खुले रहने का उपक्रम कर सकने तक में असमर्थ हैं, तो फिर राज्य और उसके शैक्षणिक इकाइयों का हश्र क्या होगा?
बीएचयू कैंपस में बुनियादी सुरक्षा संबंधी कई लंबित मांगों को लेकर कुछ छात्राओं ने अपना सिर मुंड़वा लिया और यह अवसर इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि इस देश के प्रधानमंत्री दुर्गा पूजा के अवसर पर देवी को अपनी भक्ति अर्पित करने उसी शहर में थे, जहां सडक़ों पर छात्राओं को अपनी बुनियादी मान-मर्यादा के लिए जद्ïदोजहद करना पड़ रहा था।
तो क्या देवी दुर्गा के शक्ति केंद्र से सडक़ पर लड़ती छात्राओं के बीच राज्य के लिए दूरी इतनी बढ़ गयी थी? वहीं, बीएचयू के कुलपति का भी कथित बयान बहुत रोचक है, जिसमें वह छात्राओं की उपस्थिति को ही शैक्षणिक परिवेश के लिए विचलन का कारण मान रहे हैं। पर, इस सब में कुछ नया नहीं है। यह वही प्रतिक्रियाएं हैं, जो सोशल कनफ्लिक्ट रेजोलुशन (सामाजिक संघर्ष वियोजन) की मूल कमियों को बार-बार सामने लाती हैं, हम यह तय ही नहीं कर पा रहे कि स्त्री शक्ति को हम शास्त्र के गौरव के इतर लोकेट कहां करें। साथ ही, मुद्दा कहीं और भी है।
यह जरूरी है कि परिप्रेक्ष्य को समझ लिया जाये, जिसमें छात्राओं का यह आक्रोश और प्रदर्शन भारतीय संदर्भ के कई विडंबनाओं को मुखर तौर पर सामने ला रहा है, जहां हम जिस सभ्यतायी मूलक परंपरा में विरोधाभासों के समावेश, विचारों के खुलेपन और मिश्रण को गर्व से अपनी ताकत समझते हैं, जहां कला और स्थापत्य में अजंता एलोरा हमारे धरोहर गिने जाते हैं, वहीं हम देश की आधी आबादी को अंधेरे बंद कमरों की ताकीद देने का हौसला रखते हैं, इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है?
सामान्यत: भारतीय परंपरा में पितृसत्ता के जहां अनेकों दोष हैं, वहीं स्त्रियों की सुरक्षा और मान का जिम्मा भी समाज का सामूहिक तौर पर रहा है, साथ ही देवताओं के रमने की बात भी स्त्रियों के पूजे जाने पर निर्भर करते मंतव्य सामने आते रहे हैं।
वहीं आज ऐसी कौन सी विवशता व मानसिकता जोर पकड़ रही है कि स्त्रियों को जड़ और प्राणहीन बना कर ही यह सभ्यता पनप पायेगी? क्या ऐसा संभव है? यह महज पश्चिमी आधुनिकतावाद और वंशानुगत संस्कारवाद का द्वंद्व है या सडऩ कहीं गहरे उतर चुकी है?
गांधी के ग्राम मूलक सभ्यता का पोषक यह समाज क्या अपनी शिक्षा व्यवस्था को ज्ञान की चारों ओर से खुली खिड़कियों में लोकेट करेगा या बंद की जाती खिड़कियों में? इस समाज को समय रहते यह तय कर लेना होगा, वर्ना भारती-गार्गी की परंपरा का दंभ भरता यह दार्शनिकों का संवाद-मूलक देश क्या अपनी भारती को शंकराचार्य से काम मूलक ज्ञान-प्रश्न पूछने की सोच भी रख पायेगा?
आज की परिस्थिति और स्त्रियों की शिक्षा जैसे मूल अधिकार को लेकर आंखें चुराने वाला यह राज्य क्या अपनी ज्ञान संबंधी चेतना और अवधारणाओं को लेकर इतना खोखला और लाचार हो चुका है कि कई याज्ञवल्क्यों को गार्गी का सिर फोडऩे की खुली छूट देकर अपने देश का महात्म्य विश्व पटल पर अंधेरे बंद कमरों के जरिये दिखायेगा?
प्रश्न यहां गांधी, दर्शन की स्वस्थ, खुली, संवाद मूलक परंपरा के विनाश के खतरे का है, यह महज एक विश्वविद्यालय के कुछ जागरूक शिक्षित लड़कियों के अपनी अधिकार की लड़ाई तक ही सीमित मसले का नहीं है। प्रश्न यहां ज्ञान के उस परिवेश को लेकर सोच की किस्म और मानसिकता के निर्धारण का है, जिस पर दारोमदार एक स्वस्थ समाज के निर्माण का है।
आखिर ज्ञान के इन परिसरों में यदि स्त्रियां सशक्त और स्वस्थ नहीं रह पा रही हैं, तो फिर बेटी को पढ़ाने से पहले राज्य का कर्तव्य बेटियों को न सिर्फ भ्रूण-हत्या से बचाने का है, बल्कि ज्ञान के भू्रण की असामयिक मृत्यु का बोझ ढोती उस आधी आबादी के मानसिक विक्षिप्त होने के खतरे में भी है। फिर पढऩे और बढऩे का काम किसी स्वस्थ मन से ही तो संभव हो सकता है। या फिर यह देश और समाज लंगड़ी कबड्ïडी के बल पर ही एक सशक्त राष्ट्र निर्माण कर लेगा?

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