तिलिस्मी फाइलों में उलझे पंडित जी

राजधानी के विकास का जिम्मा संभाल रहे पंडित जी पतरा की जगह फाइलों के बोझ से परेशान हैं। मामला फाइलों तक होता तो भी बर्दाश्त कर लेते। समस्या इससे भी बड़ी है। अवैध निर्माण की शिकायतों और मातहतों के बहानों ने उनका जीना मुहाल कर दिया है। फाइलों को पढ़ते-पढ़ते पंडित जी की आंखों का ऐसा कचूमर निकला है कि हर छह महीने में चश्मे का पावर एक दो प्वांइट बढ़ जाता है। फाइलें भी कम तिलिस्मी नहीं हैं। सारी प्रतिभा दिखाने के बाद ही पंडित जी उनका राज समझ पाते हैं। एक से पर्दा उठता नहीं है कि दूसरी फाइल नमूदार हो जाती है। हाल यह है कि सपने में भी पंडित जी को फाइलें ही दिखाई देती हैं। अब पंडित जी खुद को कोसते हुए दिन काट रहे हैं। उन्हें पुराने दिन याद आते हैं। वे याद करते हैं, एक समय था जब वे इसी जिले की कानून व्यवस्था को सुधारने के लिए समझावन लाल को लेकर कभी-कभी सडक़ पर निकल जाया करते थे। उनको देखकर अच्छे-अच्छे अपने बिलों में दुबक जाते थे। आज भी पंडित जी के कानों में एडीएम साहब जैसे शब्द मिश्री घोल देते हैं। यह शब्द सुनते ही वे गदगद हो जाते हैं। हो क्यों न पुराने दिनों की याद जो ताजा हो जाती है।

नेताजी की संतुलन कला का जवाब नहीं

कुछ भी हो अपने नेताजी को संतुलन साधने में महारत हासिल है। अब तो विरोधी भी उनकी इस कला का लोहा मानते हैं। बेटे और भाई को एक साथ साध गए जी। लोगों से साफ कह दिया, नई पार्टी के चक्कर में नहीं पड़ रहा हूं। हम तो साइकिल पर सवार थे, साइकिल पर ही सवार रहेंगे। बेटे के फैसलों से हमें परेशानी है, बाकी तो आशीर्वाद पूरा है। बेटा फलता-फूलता रहे, यही अपनी इच्छा है। बेटे तक बात पहुंच गई। पहुंचनी ही थी। अरे भाई बेटा पहले से जानता है, पिताजी कुछ भी करें खिलाफत नहीं करेंगे। आशीर्वाद पूरा देंगे। इसमें किसी प्रकार की कोई मिलावट नहीं करेंगे। सो खुशी से जिंदाबाद के नारे तक लगा दिए। सुना है कि इस संतुलन साधने की कला से नेताजी के भाई साहब परेशान हैं। उनको समझ नहीं आ रहा है, वे जाएं तो जाएं कहां। घर में अगर कोई नहीं पूछेगा तो बाहर कौन पूछेगा जी। नेताजी के इस दांव से विपक्ष भी चित हो गया है।

कुछ भी हो अपने नेताजी को संतुलन साधने में महारत हासिल है। अब तो विरोधी भी उनकी इस कला का लोहा मानते हैं। बेटे और भाई को एक साथ साध गए जी। लोगों से साफ कह दिया, नई पार्टी के चक्कर में नहीं पड़ रहा हूं। हम तो साइकिल पर सवार थे, साइकिल पर ही सवार रहेंगे। बेटे के फैसलों से हमें परेशानी है, बाकी तो आशीर्वाद पूरा है। बेटा फलता-फूलता रहे, यही अपनी इच्छा है। बेटे तक बात पहुंच गई। पहुंचनी ही थी। अरे भाई बेटा पहले से जानता है, पिताजी कुछ भी करें खिलाफत नहीं करेंगे। आशीर्वाद पूरा देंगे। इसमें किसी प्रकार की कोई मिलावट नहीं करेंगे। सो खुशी से जिंदाबाद के नारे तक लगा दिए। सुना है कि इस संतुलन साधने की कला से नेताजी के भाई साहब परेशान हैं। उनको समझ नहीं आ रहा है, वे जाएं तो जाएं कहां। घर में अगर कोई नहीं पूछेगा तो बाहर कौन पूछेगा जी। नेताजी के इस दांव से विपक्ष भी चित हो गया है।

अपनों ने छीना बाबाजी का चैन

बाबा जी ने जब से गद्दी संभाली है, उनका सुख, चैन, पूजा-पाठ सब बाधित हो गया है। विरोधी तो विराधी ही है। परेशान करना उनकी आदत है। दस्तूर भी है लेकिन बाबाजी को उनकी कोई चिंता नहीं है। वे तो अपनों से परेशान हैं। मातहत से लेकर सहयोगी तक आए दिन कोई न कोई बखेड़ा खड़ा करते रहते हैं। कभी वर्दीधारी लड़कियों को पीट देते हैं तो कभी उनके पार्टी के सहयोगी अफसरों पर पिल पड़ते हैं। एक मामला सुलझता नहीं है कि दूसरी समस्या खड़ी कर देते हैं। बाबाजी इन समस्याओं को सुलझाने में एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ लगाते फिर रहे हैं। आदेश पर आदेश दे रहे हैं लेकिन किसी के कान में जूं नहीं रेंग रही है। बाबा जी की किरकिरी होती है तो होती रहे। आखिर हम भी कुछ चीज है। सत्ता में है कोई विपक्ष में नहीं कि मुंह बंदकर और हाथ बांधकर बैठे रहें।

अपनी तो सेङ्क्षटग है जी

सेहत का महकमा बड़े काम का है जी। यहां साहबी मिले और मलाई खाने से चूक गए तो फिर साहबी बेकार है जी। मलाई भी यहां कब किधर से टपक जाए पता नहीं चलता। लेकिन साहब लोगों को जब मलाई की तलब लगती है तो निरीक्षण पर निकल पड़ते हैं। यह वर्षों पुराना और जांचा-परखा नुस्खा है। मजाल कोई इस निरीक्षण के चक्रव्यूह को तोड़ दे। इसी चक्रव्यूह में कई फंस चुके हैं लेकिन जैसे फंसते है वैसे निकल भी आते हैं। खामियां दिखाकर कई अस्पतालों को सीलबंद कर दिया जाता है। बेचारा खामियों को दूर कर नहीं सकता सो सेटिंग से काम चलाता है। साहब लोग भी यही चाहते हैं। समझदार को इशारा काफी होता है। अब जितनी बड़ी खामियां निकलेगी सेटिंग भी उतनी ही बड़ी होती है। लेकिन साहब लोग भी समझदार हैं। जितनी बड़ी मुर्गी होती है उतना ही दाम लगाते हैं। बात सेट हुई नहीं कि फिर सेटिंग वाला भी खुश और साहब लोग भी खुश। अपना क्या है लोगों की सेवा करने के लिए अस्पताल खोला है सो थोड़ी सी सेटिंग के लिए तो बंद नहीं कर देंगे। सो दस्तूर कायम है जी।

हिमालय में धुनी रमाएंगे दिव्य पुडिय़ा वाले साहब

शहर को चमकाने का जिम्मा संभाल रहे दिव्य पुडिय़ा वाले साहब के ज्ञान चक्षु अचानक खुल गए हैं। दाढ़ी वाले वजीर को उनकी दिव्य पुडिय़ा का राज और उनके मायाजाल का पता चल चुका है। वजीर साहब उनको देखते ही अपनी दाढ़ी चलता करने वाले अंदाज में खुजलाने लगते हैं। वजीर साहब के इस अंदाज से दिव्य पुडि़य़ा वाले साहब को भी अंदाजा लग गया है कि अब उनका दाना-पानी यहां से जल्दी ही उठने वाला है। अब कोई चाल-चालाकी नहीं चलने वाली है। दाढ़ी वाले वजीर भी घाट-घाट का पानी पीकर यहां तक पहुंचे हैं। सो दिव्य पुडिय़ा का बढ़ा डोज भी मामले को संभाल नहीं पा रहा है। मामला बिगड़े इससे पहले साहब तीन साल का अनुष्ठïान पूरा करने में जोर-शोर से लग गए हैं। सुना है अनुष्ठïान पूरा करने की उन्हें इतनी जल्दी है कि वे अभी से अपना आसन लपेटने लगे हैं। उनके भक्तों का कहना है कि अब दिव्य पुडिय़ा वाले साहब हिमालय की पहाडिय़ों में धुनी रमाने की सोच रहे हैं। सो अब वहीं आशीर्वाद लेने आइएगा।

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