कोलकाता हाईकोर्ट का आदेश सियासी दल और सरकारें

सवाल यह है कि हाईकोर्ट के इस फैसले का निहितार्थ क्या है? क्या यह फैसला सियासी दलों द्वारा की जा रही तुष्टिकरण की राजनीति के लिए झटका साबित होगा? क्या राज्यों में सत्तारूढ़ दल कुछ सबक लेंगे? क्या देश में धर्म और संप्रदाय की राजनीति पर इस फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा?

पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी द्वारा मुहर्रम पर दुर्गा प्रतिमा के विसर्जन पर रोक लगाने के फैसले को कोलकाता हाईकोर्ट ने तमाम दलीलों के बाद खारिज कर दिया। यही नहीं कोर्ट ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि आप दो समुदायों के बीच दरार क्यों पैदा कर रहे हैं। दुर्गा पूजा और मुहर्रम पर राज्य में कभी स्थितियां नहीं बिगड़ीं। उन्हें साथ रहने दीजिए। केवल आशंका के आधार पर धार्मिक मामलों पर बंदिशें नहीं लगाई जा सकतीं और सरकार को सभी नागरिकों को बराबरी की नजरों से देखना चाहिए। सवाल यह है कि हाईकोर्ट के इस फैसले का निहितार्थ क्या है? क्या यह फैसला सियासी दलों द्वारा की जा रही तुष्टिकरण की राजनीति के लिए झटका साबित होगा? क्या राज्यों में सत्तारूढ़ दल कुछ सबक लेंगे? क्या देश में धर्म और संप्रदाय की राजनीति पर इस फैसले का दूरगामी असर पड़ेगा? वे कौन सी स्थितियां थीं जिसके कारण हाईकोर्ट को सांप्रदायिक सौहार्द का पाठ ममता सरकार को पढ़ाना जरूरी हो गया?
दरअसल, यह मामला तब गरमाया जब ममता बनर्जी ने घोषणा की कि मुहर्रम के दिन दुर्गा प्रतिमा का विर्सजन नहीं किया जा सकेगा क्योंकि ऐसा करने पर सांप्रदायिक सौहार्द बिगडऩे का खतरा है। इसके विरोध में हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की गई और चीफ जस्टिस की बेंच ने सरकार के फैसले को खारिज कर पुलिस को रुट तय करने के आदेश दिए हैं। इस दौरान कोर्ट के सवाल और जवाब ने राजनीतिक दलों की पोल खोल दी है। फैसले से साफ हो गया है कि सियासी दल अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए दो समुदायों के बीच दीवार खड़ी करने का काम कर रहे हैं। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। देश में दशकों से सियासी दल सांप्रदायिकता की राजनीति कर रहे हैं। वे चुनाव के दौरान धर्म और जाति के नाम पर खुलेआम वोट मांगते हैं। वे धर्मनिरपेक्षता की तमाम अवधारणाओं को दरकिनार कर तुष्टिकरण की नीति पर चल रहे हैं। सबका अपना-अपना वोट बैंक है। ये वोट बैंक केवल हिंदू और मुस्लिम में ही नहीं बल्कि जातिगत आधार पर बंटे हैं। जहां तक सभी नागरिकों को एक नजर से देखने का सवाल है अधिकांश सत्तारूढ़ सरकारें इसका पालन करती नहीं नजर आ रही है। तुष्टिकरण की नीति के कारण देश में अक्सर सांप्रदायिक तनाव की स्थिति पैदा होती है। हाईकोर्ट का ताजा फैसला अन्य राज्य सरकारों और पार्टियों के लिए एक संदेश है। सियासी दलों को इससे सबक लेने की जरूरत है।

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