जल्द मौत के मुंह में ले जा रहा है अकेलापन और अवसाद

परिवार और दोस्तों के बिना जीवन कितना असहाय और कठिन हो जाता है इसकी बानगी दिल्ली के इंडियन एग्रीकल्चरल रिसर्च इंस्टिट्यूट, पूसा से रिटायर साइंटिस्ट यशवीर सूद की मौत से मिलती है। यशवीर सूद काफी पढ़े-लिखे थे और पूसा में ही न्यूक्लियर के प्रिंसिपल वैज्ञानिक थे लेकिन वे एकाकी जीवन जी रहे थे और दोस्तों, रिश्तेदारों से मिलना तो उन्होंने वर्षों पहले ही छोड़ दिया था। बताया जाता है कि वह यहां अपनी बड़ी बहन और छोटे भाई को साथ रहते थे लेकिन एकाकी जीवन जीते-जीते सभी मानसिक रोगों का शिकार हो गये। भाई और बहन तो सशरीर सूद पर ही निर्भर थे। रिटायरमेंट से पहले ही मानसिक रोग ने उन्हें घेर लिया था। शायद यही कारण है कि 2015 में रिटायर होने के बाद न उन्होंने कभी पेंशन ली और न ही कोई फंड निकाला था। मानसिक रोगी भाई-बहन के साथ एकाकी जीवन जीते-जीते उन्हें एहसास ही नहीं हुआ कि कब वह मानसिक रोग का शिकार हो गये। रुपया-पेंशन सब कुछ होने के बावजूद वह उसका उपयोग नहीं कर पा रहे थे और तीनों भाई-बहन एक छोटे से कमरे में दयनीय जीवन जी रहे थे। उनकी मौत 8-10 दिनों पहले हो चुकी थी लेकिन भाई-बहन उनके सड़े-गले शव के साथ रह रहे थे।
आसपास के पड़ोसियों को जब घर से तेज बदबू आई तो उन्होंने पुलिस को फोन किया। तब जाकर पता चला कि उनकी मौत तकरीबन एक सप्ताह पहले हो चुकी है। इस घटना का जिक्र समाज में बढ़ रहे तनाव और एकाकीपन के लिए करना जरूरी है। जिंदगी की भागदौड़ में आज आदमी के पास इतना भी समय नहीं कि वह अपने पड़ोसी या रिश्तेदारों का हाल भी जान सके। हमारे यहां मानसिक रोगियों की तादाद लगातार बढ़ती जा रही है लेकिन सामाजिक तानेबाने में लोग इसे मानसिक बीमारी न मानकर इसे व्यक्ति का व्यवहार मानकर किनारा कर लेते हैं और हाल ही में राजधानी दिल्ली, एनसीआर और मुम्बई में ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जिनसे पता चलता है कि मानसिक रोग और तनाव को लोग अनदेखा करते हैं जिसकी वजह से ऐसी घटनाएं सामने आती हैं।
राष्टï्रीय अपराध अनुसंधान संस्थान के आंकड़ों से पता चलता है कि एक साल में भारत में पैरालिसिस और मानसिक रोगों से प्रभावित 8409 लोगों ने आत्महत्या की। सबसे ज्यादा आत्महत्याएं महाराष्टï्र(1412) में हुईं। देश में वर्ष 2001 से 2015 के बीच कुल 126166 लोगों ने मानसिक-स्नायु रोगों से पीडि़त होकर आत्महत्या की है। पश्चिम बंगाल में 13932, मध्य प्रदेश में 7029, उत्तर प्रदेश में 2210, तमिलनाडु में 8437, महाराष्टï्र में 19601, कर्नाटक में 9554 आत्महत्याएं मानसिक तनाव को कारण हुईं हैं। भारत में 16.92 करोड़ लोग मानसिक, स्नायु विकारों और गंभीर नशे की गिरफ्त में हैं, जबकि जनगणना-2011 के मुताबिक मानसिक रोगों से केवल 22 लाख लोग प्रभावित हैं। यह आंकड़ा भ्रामक है क्योंकि यह केवल परिवार के मुखिया या सदस्य से पूछताछ के आधार पर तैयार किया गया है। परिवार का कोई भी सदस्य परिवार से बाहर किसी को यह बताना नहीं चाहता कि कोई मानसिक विकार है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2020 तक अवसाद/तनाव विश्व में दूसरा सबसे बड़ा रोग होगा। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा एकत्रित किए गए आंकड़ों के अनुसार, मानसिक रोगियों की बढ़ती संख्या भारत ही नहीं, विश्व भर में चिंता का बड़ा विषय है।
लोकसभा में स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा दिए गए एक जवाब के मुताबिक मानसिक रोगों पर एक सर्वेक्षण किया गया है। यह सर्वेक्षण 1 जून 2015 से 5 अप्रैल 2016 तक चला और इसमें कुल 27,000 प्रतिभागी इसमें शामिल हुए। दिसम्बर 2015 में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय द्वारा लोकसभा में दिए गए एक उत्तर के अनुसार, देश में कुल 3,800 साइकियाट्रिस्ट, 898 क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, 850 साइकियाट्रिक सोशल वर्कर और 1500 साइकियाट्रिकनर्स हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक यह संख्या राष्टï्रमंडल देशों के प्रति एक लाख की आबादी पर 5.6 मनोचिकित्सक से 18 गुना कम है। इस आंकड़े के हिसाब से भारत में 66,200 मनोचिकित्सकों की कमी है। इसी तरह वैश्विक औसत के आधार पर 100,000 लोगों पर मनोरोगियों की देखभाल के लिए 21.7 नर्सों की जरूरत के हिसाब से भारत को 269750 नर्सों की जरूरत है।
राज्यसभा में 8 अगस्त 2016 को मानसिक स्वास्थ्य देखभाल विधेयक, 2013 ध्वनिमत से पारित किया गया था। नए विधेयक के मुताबिक अब केंद्र मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र से जुड़े केंद्रों के लिए 30 करोड़ रुपये की बजाए प्रति केंद्र 33.70 करोड़ रुपये जारी करेगा। सबसे बड़ी बात यह है कि मानसिक रोगियों की देखभाल के लिए कानून तो बना दिया गया है लेकिन इस कानून के तहत ज्यादातर सडक़ों पर आवारा घूमने वाले मानसिक रोगियों तक ही विभागीय नजर रहती है। घरों में, परिवारों में और समाज में बढ़ रहे अवसाद को रोकने के लिए भूमि कोई ठोस उपाय नहीं किये जा रहे हैं।
अकेलापन व्यक्ति को मानसिक ही नहीं बल्कि शारीरिक रूप से भी बीमार बना सकता है। विशेष तौर पर बुजुर्गों में अकेलेपन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। शिकागो युनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार सबसे मिलने जुलने और साथ रहने वाले लोग अकेलेपन के शिकार लोगों की तुलना में 50 फीसदी तक अधिक जीते हैं। अकेलापन शरीर को ठीक उतना ही नुकसान पहुंचाता है जितना दिन में 15 सिगरेट पीने से शरीर को होता है। इस शोध में शोधकर्ताओं ने 3,08,849 लोगों पर 148 बार अध्ययन किया है।
अकेलेपन के शिकार लोगों की संख्या पूरी दुनिया में तेजी से बढ़ रही है। अकेले होने का मतलब शारीरिक रूप से अकेले होना नहीं है बल्कि लोगों के साथ जुड़ाव महसूस ना होना या परवाह ना किया जाना भी एक अकेलापन है। सामाजिक तानेबाने के टूटने और एकाकी परिवारों के चलन और खानपान में आया बदलाव भी मानसिक बीमारी की एक बड़ी वजह है।

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