तेल पर टैक्स के अलावा सरकार के पास दूसरा रास्ता नहीं

आज की तारीख में पेट्रोलियम और डीजल की कीमत उससे भी आगे निकल गई है जो तीन साल पहले देश में पेट्रोलियम और डीजल की कीमत थी। लेकिन इन तीन सालों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत आधी हो गई है। जून, 2014 में कच्चे तेल की कीमत लगभग 115 डॉलर प्रति बैरल हुआ करती थी, जो आज की तारीख में गिर कर 50 डॉलर के आसपास पहुंच गई है। भारत अपना 80 फीसदी कच्चा तेल विदेश से आयात करता है। भारत पैसों के हिसाब से जितनी चीजों का आयात करता है उसमें 33 फीसदी हिस्सा कच्चे तेल का ही है। कच्चे तेल को तैयार करके जब पंपों पर बेचा जाता है, उसमें लागत के अलावा एक्साइज ड्यूटी और कस्टम ड्यूटी जुड़ जाती है। एक्साइज और कस्टम ड्यूटी भारत सरकार का वित्त मंत्रालय बढ़ाता है, लगाता है और ये पूरा का पूरा पैसा सरकार की झोली में जाता है। तो इस लिहाज से देखें तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत गिरने से जो भी फायदा हुआ है इसका 75 से 80 फीसदी फायदा सरकार अपने पास रख रही है, केवल 20 से 25 फीसदी लाभ उपभोक्ताओं को मिला है। एक उपभोक्ता के लिहाज से देखें तो प्रति लीटर जो पैसा हम आप प्रति लीटर दे रहे हैं, उसका करीब आधा पैसा सरकार के पास पहुंच रहा है। अलग-अलग राज्यों में अलग अलग कर जरूर है लेकिन उपभोक्ता जो पैसा चुकाते हैं और उसका आधा हिस्सा सरकार के पास पहुंचता है। सरकार को फायदा हो रहा है लेकिन इसका बोझ आम आदमी की जेब पर पड़ रहा है। अर्थशास्त्रियों के मोटा मोटी अनुमान है कि पिछले तीन साल में कम से कम पांच लाख करोड़ रुपये सरकार के पास इस तरह जमा हुआ है। आज आप पाकिस्तान में देखें, बांग्लादेश, श्रीलंका में देखें, हर देश में पेट्रोल और डीजल का दाम भारत से कम है,लेकिन भारत में ये दाम कम नहीं हो रहा है क्योंकि केंद्र सरकार एक्साइज और कस्टम ड्यूटी कम नहीं कर रही है। आम आदमी की जेब पर केवल पेट्रोल और डीजल का खर्चा नहीं बढ़ता है, हर चीज महंगी होती है। हर चीज जो एक जगह से दूसरी जगह जाती है, वह महंगी होगी ही क्योंकि उसको लाने-ले जाने का खर्च बढ़ जाता हैष मुद्रा स्फीति बढ़ रही है। थोक मूल्य सूचकांक में बढ़ोत्तरी होती है। बीते तीन साल में जो महंगाई कम नहीं हो रही है उसकी एक वजह तो पेट्रोलियम और डीजल की कीमतों का कम नहीं होना भी है। पेट्रोलियम और डीजल की कीमतें कम नहीं करके सरकार अपनी तिजोरी भर रही है। क्योंकि इंडियन ऑयल हो या भारत पेट्रोलियम, ये सब सरकार की कंपनियां हैं। हालांकि तेल की कीमतें कम नहीं होने स कुछ निजी कंपनियों को भी फायदा हो रहा है, लेकिन उनका हिस्सा अभी कम ही है। सरकार पेट्रोलियम पर ड्यूटी कम क्यों नहीं कर रही है, इसका जवाब तो प्रधानमंत्री और वित्तमंत्री ही दे सकते हैं। लेकिन जो तस्वीर सामने है, उससे इसकी वजह का पता तो चलता है। भारत सरकार के आंकड़ों के मुताबिक ही कुल सकल घरेलू उत्पाद में गिरावट देखने को मिल रही है। अर्थव्यवस्था की स्थिति बहुत खराब है। निजी क्षेत्रों में निवेश नहीं हो रहा है। लोगों को नौकरियां नहीं मिल रही हैं। बैंकों का बहुत सारा पैसा डूबा हुआ है। इन सबके बीच सरकार ने नोटबंदी का फैसला ले लिया। उससे सबकुछ अनिश्चित सा हो गया। सरकार के पास आमदनी का कोई दूसरा रास्ता नहीं है। राजस्व जुटाने के लिए मौजूदा सरकार के पैसा पेट्रोलियम पर टैक्स वसूलने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं है। और यही वजह है कि मौजूदा सरकार पेट्रोलियम तेलों पर टैक्स को कम नहीं कर रही है और ना ही उसकी ऐसा करने की कोई राजनैतिक इच्छाशक्ति नजर आती है, लेकिन भारत के पेट्रोलियम मंत्री ये ट्वीट करते हैं कि दुनिया के कई देशों में भारत से महंगा पेट्रोल-डीजल मिलता है, लेकिन मंत्रीजी ये नहीं बताते हैं कि वे विकसित देशों की तुलना भारत जैसे विकासशील देश से कर रहे हैं। जापान जैसे देश में आम आदमी की आमदनी भी भारत के प्रति व्यक्ति आय की तुलना में दस गुना ज्यादा होती है। दरअसल ऐसी तुलनाएं भ्रम फैलाने का काम करती हैं ताकि आम आदमी असलियत से दूर रहे।

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