मंदी की ओर बढ़ रही है भारतीय अर्थव्यवस्था

चालू वित्त वर्ष की जून में खत्म हुई तिमाही के दौरान भारत के जीडीपी में गिरावट दर्ज की गई है। पिछली तिमाही के 6.1 फीसदी के मुकाबले बीते अप्रैल से जून की तिमाही में विकास दर घटकर 5.7 फीसदी पर आ गई है। पिछली तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था की रफ्तार अनुमान से कम रही है, जबकि काला धन पर की गई सरकार की कार्रवाई के बाद इसमें जून के अंत तक मजबूती आने के आसार बताए गए थे।
अभी जारी किए गए विकास दर के आंकड़े चौंकाने वाले हैं क्योंकि इसमें और गिरावट आने का अंदेशा था। नोटबंदी और जीएसटी की वजह से असंगठित क्षेत्र को जबरदस्त धक्का लगा है। लेकिन इस क्षेत्र के आंकड़े लगभग दो या तीन साल बाद आते हैं।
अगर इन आंकड़ों को शामिल किया जाता तो पिछली तिमाही के आंकड़े और भयावह होते। पूरी अर्थव्यवस्था में असंगठित क्षेत्र का हिस्सा 45 फीसदी है और नोटबंदी व जीएटी के कारण इस क्षेत्र पर भारी असर पड़ा है। बाकी 55 फीसदी में वैसे ही गिरावट हुई है। इस लिहाज से विकास दर में आई ये गिरावट और भी ज्यादा होनी चाहिए थी। आर्थिक विकास दर में कमी क्यों आई है? क्योंकि जो भी सुधार का काम किया गया वो संगठित क्षेत्र के लिए किया गया न कि असंगठित क्षेत्र के लिए।
मार्च में रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, कैपेसिटी यूटिलाइजेशन क्षमता प्रयोग में गिरावट आई है। यह 70 फीसदी पर आ गया है। उसकी वजह से निवेश में भी गिरावट आई है। जब निवेश में कमी आती है तो वृद्धि दर में कमी आना स्वाभाविक ही है।
सरकार के दावे के बावजूद आर्थिक विकास दर लुढक़ रही है क्योंकि उद्योगों में मांग नहीं है। एनपीए यानी ऐसी संपत्तियां जोकि घाटे का सौदा हो चुकी हैं, बहुत ज्यादा हैं।
बड़ी कंपनियां उधार लेने में सक्षम नहीं दिख रहीं। इंफ्रास्ट्रक्चर से बढ़त की उम्मीद थी लेकिन वहां भी संभावनाएं कम ही दिख रही हैं। इसके अलावा क्रेडिट ऑफ टेक बहुत कम हो गया है, जुलाई में तो ये नकारात्मक हो गया था। क्रेडिट ऑफ टेक का मतलब है कि उत्पादन में बढ़त नहीं होना और डिमांड में भी कमी। ये सारी चीजें दिखाती हैं कि अर्थव्यवस्था की स्थिति अच्छी नहीं हैं। सरकारी व्यय को बढ़ाया जाना चाहिए जिससे अर्थव्यवस्था में डिमांड बढ़ेगी और उससे विकास दर में वृद्धि होगी। डिमांड को बढ़ाने के लिए सरकार को कुछ ऐसे कदम उठाने होंगे ताकि भले ही राजकोषीय घाटा भले बढ़े लेकिन मांग में बढ़ोत्तरी हो।
सरकार क्रेडिट रेटिंग एजेंसी के डर से अपना खर्च उतना नहीं बढ़ा रही जितना उसे बढ़ाना चाहिए। उसे डर है कि राजकोषीय घाटा कहीं बढ़ न जाए। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र भी उतना निवेश नहीं हो रहा है। निवेश दर में भी पिछले दस सालों के दौरान 10 फीसदी की गिरावट आई है। उसकी कमी पूरा करने के लिए सरकारी व्यय को बढ़ाना जरूरी है। सरकार को मांग बढ़ाने की दिशा में काम करना होगा। लेकिन पिछले तीन साल में इसे बढ़ाया नहीं गया है।
वर्तमान सरकार की नीतियों के मद्ïदेनजर इसे बढ़ाने की उम्मीद तो नहीं है लेकिन आने वाले दो साल में चुनावों के मद्ïदेनजर लगता है कि सरकार सार्वजनिक खर्च में बढ़ोत्तरी कर सकती है।
इस मंदी जैसी स्थिति से निपटने के लिए सरकार को शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचनाओं में निवेश बढ़ाना चाहिए जिससे नौकरियां भी सृजित हों। रेलवे, सडक़ और अन्य आधारभूत संरचनाओं में निवेश कर सरकार ऐसा करने की कोशिश भी कर रही है। पिछले दो तिमाही से हमारी अर्थव्यवस्था में गिरावट आई है। नवंबर-दिसंबर-जनवरी में जितने भी सर्वे आए थे, सबमें इसके संकेत मिलते हैं।
इन सर्वे के मुताबिक असंगठित क्षेत्र में 60 से 80 फीसदी की गिरावट आ गई है। अगर इन आंकड़ों को जोड़ा जाए तो विकास दर एक या दो फीसदी के आसपास ही होना चाहिए। कुल मिलाकर लगता है भारतीय अर्थव्यवस्था मंदी की ओर बढ़ रही है।

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