मेडिकल रिसर्च: अधकचरे ज्ञान की मार्केटिंग दुनिया के लिए खतरा

मेडिकल रिसर्च: अधकचरे ज्ञान की मार्केटिंग दुनिया के लिए खतरायहां प्रश्न यह उठता है कि अगर पुरानी अवधारणा गलत थी तो क्यों सैकड़ों गलत या अधकचरे निष्कर्षों की बुनियाद पर पूरी दुनिया के लोगों को चार दशकों से मौत के मुंह में झोंका जा रहा है? क्यों यूरोप के लोगों और उनके खान-पान पर किये गए अध्ययनों को मानने के लिए भारत सरीखे गरीब मुल्कों के लोगों को मजबूर किया जाता रहा है ? कौन देगा हिसाब उन करोड़ों मौतों का जो गलत अवधारणा के कारण विश्व समुदाय ने झेली हैं? क्या आज सही समय नहीं है कि या तो विश्व स्वास्थ्य संगठन के स्तर पर नियम बनाये जाएं कि चिकित्सा शोध तभी जन-प्रयोग में लाये जाएं जब व्यापक नमूनों को जो विश्व के हर भाग, संस्कृति, आर्थिक वर्ग के आधार पर लिए गए हों और जिन पर दीर्घ काल तक प्रयोग करके के किसी वैश्विक मानक संगठन द्वारा सत्यापित किये गए हों।   

छले महीने की 29 तारीख को प्रस्तुत एक अध्ययन ने चिकित्सा की दुनिया में खलबली मचा दी है। पिछले 40 साल से बनी अवधारणा जिसका पूरे विश्व के डॉक्टरों ने और समाज ने धु्रव-सत्य समझ कर पालन किया वह गलत साबित हुई है। नये अध्ययन के मुताबिक कम वसा खाने से दिल की बीमारियों (सीवीडी) का ही नहीं कई अन्य बीमारियों का खतरा भी ज्यादा होता है साथ हीं ज्यादा कार्बोहाइड्रेट युक्त भोजन भी इस खतरे को बढ़ाता है। अब तक दुनिया के डॉक्टर यह बताते थे कि ज्यादा ‘फैट’ (घी, मक्खन, तेल, सूखे मेवों आदि से मिलने वाले तीन प्रकार के वसा) के सेवन से दिल की बीमारियों का सीधा समानुपातिक रिश्ता है। दक्षिण एशियाई देशों खासकर भारत के खानपान को लेकर हुए इस अध्ययन के भाग में माना गया है कि गरीब वर्ग जो ऊर्जा के लिए अधिक मात्र में अनाज का सहारा लेता है  और जो आर्थिक कारणों से घी-तेल का सेवन नहीं कर पाता वह दिल की बीमारियों के साथ-साथ अन्य बीमारियों को भी जन्म देता है।  
यह व्यापक अध्ययन पांच महाद्वीपों के उच्च, मध्यम और निम्न आय वाले 18 देशों के 135335 लोगों पर कनाडा के हैमिलटन-स्थित मैक मास्टर यूनिवर्सिटी के पापुलेशन हेल्थ रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ताओं की टीम ने ‘प्योर’ ( प्रोस्पेक्टिव अर्बन-रूरल एपिडेमोलोजी) अध्ययन कार्यक्रम के तहत किया गया। इस रिपोर्ट को पिछले माह के अंतिम सप्ताह स्पेन के बार्सिलोना में हुए यूरोपियन सोसाइटी ऑफ कार्डियोलॉजी कांग्रेस में जब प्रस्तुत किया गया तो पूरे विश्व के चिकित्सा वर्ग में चर्चा का एक तूफान सा आ गया है। तमाम देशों से अपील की जा रही है कि वे भोजन को लेकर अपने गाइडलाइन्स को बदलें और डॉक्टरों से भी अपनी चार दशक पुरानी मान्यताओं को तिलांजलि देने को कहा जा रहा है।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार व्यक्ति को ऊर्जा जिन तीन पदार्थों से मिलती है वे हैं-कार्बोहाइड्रेट, फैट और प्रोटीन। दुनिया के तमाम बड़े देशों ने अपने यहां कम वसा और ज्यादा ‘कार्ब’ को प्रोत्साहित करने के लिए कानून बनाये थे। ब्रिटेन के नेशनल हेल्थ सर्विस (एनएचएस) के वेबसाइट पर दिए गये देशवासियों के सन्देश में भी आज भी दिखाई देता है ‘वसा का सेवन किसी भी कीमत पर 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए और उसकी जगह स्टार्च-युक्त कार्बोहाइड्रेट्स (अनाज) का अनुपात अधिक होना चाहिए’। 
उधर इस अध्ययन दल के अगुवा डॉ महशिद देहघन ने इस नए अध्ययन पर बोलते हुए  कहा ‘शरीर के लिए आवश्यक ऊर्जा के लिए 60 प्रतिशत से अधिक कार्बोहाइड्रेट का सेवन दिल ही नहीं कैंसर व डिमेंशिया सरीखे कई घातक बीमारियों को बढ़ाता है। इसे 10 प्रतिशत कम करने के साथ वसा के सेवन (जिसमें सैचुरेटेड वसा जैसे घी और मक्खन भी हैं) बढ़ाया जाना बेहतर विकल्प है’।
इसे भारतीय निम्न व मध्यम वर्गीय खान-पान के अनुरूप इस तरह समझा जा सकता है। आप तीन रोटी खाते है फिर चावल और दाल भी लेते है और फिर आपकी पत्नी या मां एक रोटी और खाने का इसरार करती है। अब उन्हें यह कहना होगा कि रोटी एक ही खाओ पर घी लगी और साथ में सब्जियां, सलाद और सस्ते फल का सेवन बढ़ा दो।
नए अध्ययन के अनुसार दिल की बीमारियों के अलावा डीमेंशिया (भूलने की बीमारी,) कैंसर आदि भी पुरानी अवधारणा जनित खान पान से बढऩे के संकेत मिले हैं। ब्रिटेन के जाने माने हृदय चिकित्सक प्रोफ जेरमी पीअरसन ने इस शोध पर प्रतिक्रिया में कहा कि ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग को जनता के लिए दी गयी अपनी खाद्य सम्बंधित एडवाइजरी में अमूल-चूल परिवर्तन करना होगा। इस अध्ययन के बाद हमें अपने कार्बोहाइड्रेट की मात्र पर न कि वसा की मात्र पर अंकुश लगाना  होगा। लगभग यही विचार ब्रिटेन के ही एक अन्य प्रसिद्घ कार्डियोलॉजिस्ट असीम मल्होत्रा ने व्यक्त करते हुए कहा ‘यह सही वक्त है कि दुनिया अपनी अब तक की अवधारणा में यू-टर्न ले और वसा को ‘अछूत’ समझना बंद करे।
डॉ. देहघन के अनुसार हम यह मानते आये हैं कि कुल वसा और खासकर सैचुरेटेड फैटी एसिड (जो घी मक्खन से मिलता है) को कार्बोहाइड्रेट और अनसैचुरेटेड फैट से विस्थापित करने से एलडीएल कोलेस्ट्रोल कम किया जा सकता है और जिससे दिल की बीमारियां कम होंगी। यह अवधारणा केवल यूरोपीय लोगों के खान पान को देख कर ही बनाई गयी। लेकिन दक्षिण एशिया के लोग गरीबी के कारण एक अलग किस्म का भोजन करते हैं जिसमें वसा की मात्रा कम होती है और यह कमी जानलेवा होती है। साथ ही पुराने अध्ययन में यह बात शामिल नहीं कि अगर वसा एलडीएल कोलेस्ट्रोल बढ़ता है तो साथ ही एचडीएल (अच्छा कोलेस्ट्रोल) भी बढ़ाता है। नतीजतन दोनों का अनुपात समान रहता है। डा. देहघन की टीम के अनुसार एल डी एल कोलेस्ट्रोल (जो कि खान-पान नियमन का मूल आधार है) वसा का दिल की बीमारियों पर क्या प्रभाव होता है , जानने के लिए विश्वसनीय कारक नहीं है। इसकी जगह एपीओबी (अपोलिपोप्रोटीन बी) और एपीओए-1 (अपोलिपोप्रोटीन ए-1) के अनुपात को आधार माना  जाना चाहिए था।

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