रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के आगे ये हैं चुनौतियां

यह पहले से लिया गया फैसला हो या फैसले के खतरे झेलने पड़ें लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विश्लेषकों को चौंका देते हैं। निर्मला सीतारमण को रक्षामंत्री के रूप में चुना जाना भी ऐसा ही फैसला रहा।
मीडिया सीतारमण को रक्षामंत्री बनाए जाने पर खासा उत्साहित रहा है। एक वजह यह भी थी कि वह भारत की पहली पूर्णकालिक महिला रक्षा मंत्री हैं। उनके चुने जाने पर भी आलोचना की जाने लगी कि उन्हें रक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा मामले में कोई अनुभव नहीं है। हालांकि, यह बहुत कम कहा गया कि उनकी नियुक्ति बेहद चुनौतीपूर्ण और अनिश्चित समय में हुई है।
स्पष्ट रूप से कहूं कि इस तथ्य में कुछ नयापन हो सकता है कि वह देश की पहली पूर्णकालिक रक्षा मंत्री हैं, लेकिन उनके लिंग के आधार पर यह कहना कि वह इस पद के लायक नहीं हैं, यह सही नहीं है। जो उनकी नियुक्ति को विशेषज्ञता के आधार पर गलत बता रहे हैं। क्या वह यह बता पाएंगे कि रक्षा और सुरक्षा मामलों को लेकर मुलायम सिंह यादव की क्या विशेषज्ञता थी।
इससे समझा जा सकता है कि एक रक्षा मंत्री को अपना प्रदर्शन दिखाने के लिए बेहद काबिल होना जरूरी नहीं है। सरकार में यक़ीनन निर्मला सीतारमण को बड़ी चुनौतीपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है और यह उन पर प्रधानमंत्री का भरोसा दिखाता है। सीतारमण को न केवल बहुत जटिल मंत्रालय दिया गया है, बल्कि उन पर देश की सुरक्षा का जिम्मा है। उनको लंबे समय से चली आ रही समस्याओं से तेजी से निपटना होगा और रक्षा मंत्रालय से जुड़ी दूसरी समस्याओं से निपटना होगा ताकि सशस्त्र बल उन चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार रह सकें।
रक्षा मंत्री के लिए जो सबसे मुश्किल काम इंतजार कर रहा है वो है उच्च रक्षा प्रबंधन में व्यापक सुधार। सभी सैन्य बलों के एकसाथ काम के लिए चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) का पद लाने पर तीनों सेनाओं का कड़ा विरोध था। पूरे विश्व में सशस्त्र बलों ने आधुनिक युद्ध की जटिलताओं को संभालने के लिए एक ज्वाइंट डिफेंस स्टाफ की अवधारणा को अपनाया है। लेकिन भारत में उच्च रक्षा प्रबंधन का ढांचा 20वीं सदी के मध्य का है।
सीडीएस अन्य सेनाओं के प्रमुखों के पदों को बेमानी नहीं बनाएगा, लेकिन वे साथ काम कर सकते हैं जो आज की युद्ध स्थिति पैदा होने पर बेहद महत्वपूर्ण होगा।
इसी तरह से रक्षा मंत्रालय को पूरी तरह से बदलने की आवश्यकता है जो केवल बाबुओं द्वारा चलाया जा रहा है। आज रक्षा मंत्रालय भारत की रक्षा तैयारियों के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट है। जब तक रक्षा मंत्रालय के ढांचे और उसकी कार्यप्रणाली में बदलाव नहीं किया जाएगा तब तक रक्षा बलों की क्षमता में सुधार पाइपलाइन में ही रहेगा।
रक्षा मंत्री के लिए दूसरी बड़ी चुनौती रक्षा आधुनिकीकरण है। यह दो स्तर पर होना चाहिए, पहला संगठनात्मक और दूसरा परिचालन के स्तर पर। विभिन्न सेवाओं के संगठनात्मक ढांचे को फिर से देखने की जरूरत है। हाल में कुछ सुधारों को शेकटकर कमिटी की रिपोर्ट पर लागू किया गया है लेकिन यह सुधार मामूली हैं। कठिन सुधारों की सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है।
नए रक्षा मंत्री को ट्रेनिंग के तरीकों को भी नया रूप देने की जरूरत है। भारतीय रक्षा बलों ने रक्षा क्षेत्र में विकास के साथ तालमेल रखने की कोशिश की है और जवानों को उसी तरीके से ट्रेनिंग दे रही है, लेकिन चौथी पीढ़ी के युद्ध की बारीकी को अच्छे तरीके से सिखाया जाना चाहिए। केवल राष्ट्रो से लडऩे की जगह भारतीय सेना को आवश्यकता है कि वह गैर-राष्ट्रीय सेनाओं से लडऩे में महारत हासिल करे।
हालांकि, भारत के पास गैर-राष्ट्रीय दुश्मनों से लड़ाई का अनुभव है, लेकिन हिजबुल्ला, तालिबान और कथित इस्लामिक स्टेट जैसे सैन्य समूहों को लंबे समय तक नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। लश्कर-ए-तैयबा जैसे समूह अपने आप या पाकिस्तान के साथ मिलकर ऐसा कर सकते हैं।
परिचालन स्तर पर हथियारों और उपकरण में भारी कमी है। बहुत से उपकरण अप्रचलित और पुराने हैं। लगातार सरकार द्वारा सुरक्षाबलों की उपेक्षा के कारण यह नतीजा है कि भारत की रक्षा तैयारियों में काफी छेद है।
ऐसा तब है जब भारत पर दो युद्ध की काली छाया मंडरा रही है। हालांकि, सुरक्षा बलों का जज्बा और ट्रेनिंग काफी अच्छी है लेकिन सेना को लडऩे के लिए हथियार चाहिए होते हैं। लेकिन एक दुखद तथ्य यह है कि भारतीय सुरक्षा बलों को हथियारों की बहुत जरूरत है। हालांकि, मोदी सरकार इन दिक्कतों को दूर करने में काफी कोशिशें कर रही है लेकिन इसमें और भी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। वरना, हमको 1962 जैसी स्थिति का सामना करना होगा जहां हमने युद्ध लडऩे के लिए खराब हथियारों का इस्तेमाल किया और अपमानजनक हार का सामना किया।
सीतारमण को पहले के रक्षा मंत्री से भी लडऩा होगा जो वित्त मंत्री भी हैं क्योंकि उन्हें नए साजो सामान और हथियार के लिए पैसों की जरूरत होगी। भारत की वर्तमान जीडीपी की तुलना अगर 1962 से करें तो तब के मुकाबले आज रक्षा बजट बेहद कम है।
ऐसे समय में जब भारत का सामरिक परिदृश्य बहुत तेजी से बदल रहा है और वह बहुत तेजी से बदलावों का सामना कर रहा है तब यह रक्षा बजट काफी नहीं है क्योंकि इसके कारण सुरक्षाबल बिना राइफल्स, गोला-बारूद, तोपखाने, हवाई रक्षा, एपीसी, हेलीकॉप्टर, लड़ाकू विमान, परिवहन विमान, पनडुब्बियों, गश्ती जहाजों के हो जाएंगे और इसकी सूची काफी लंबी है। इसमें से अधिकतर हथियार आयात करने होंगे और इसको इस्तेमाल करने में 5-10 साल लगेंगे। इसलिए इसमें देरी बिलकुल नहीं करनी चाहिए। हथियारों की खरीद और इस्तेमाल में 5 से 10 साल का समय लग जाता है। हथियारों की खरीद के साथ-साथ रक्षा मंत्री को अपने वाणिज्य मंत्रालय का अनुभव भी इस्तेमाल करना चाहिए। उन्हें मेक इन इंडिया प्रोग्राम के तहत रक्षा निर्माण को बढ़ावा देना चाहिए क्योंकि देश के रक्षा आयुध कारखानों में बदलाव की आवश्यकता बहुत अधिक है।
साफ तौर पर यह बेहद लंबी सूची है और कोई भी अनुभवी और वरिष्ठ राजनीतिज्ञ बता सकता है कि यह चुनौतीपूर्ण है लेकिन अगर निर्मला सीतारमण इनमें से कुछ मुद्दों पर कार्रवाई शुरू करेंगी तो वह एक अच्छा काम कर जाएंगी।

Pin It